वे जीते तो झूम उठा ‘पत्रकार’
   दिनांक 18-फ़रवरी-2020

दिल्ली के चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत पर स्टूडियो में जो नाच रहे थे उन्हें अब पत्रकार नहीं कह सकते
 
a_1  H x W: 0 x
 
दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए। जनता ने जिसे चाहा उसकी जीत हुई। लेकिन इसी बहाने भारतीय मीडिया के एक वर्ग ने अपनी निष्पक्षता की केंचुल कुछ और उतार दी। भ्रम तो पहले भी नहीं था, लेकिन बची-खुची शंकाएं भी दूर हो रही हैं। वरना इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा कि किसी पार्टी की जीत पर किसी चैनल के स्टूडियो में संपादक और पत्रकार थिरक उठें। यूं तो बहाना बनाया जा रहा है कि यह खुशी ‘एग्जिट पोल’ सही साबित होने की थी, लेकिन ‘एग्जिट पोल’ तो लोकसभा चुनाव में भी सही साबित हुआ था। तब इसी चैनल के स्टूडियो में आंसू बहाए गए थे। पहले और बाद में भी कई बार अनुमान सही निकले, लेकिन खुशियों का जैसा गुबार दिल्ली की जीत पर फूटा वैसा कभी नहीं हुआ। इंडिया टुडे समूह पिछले कई साल से पूरी निष्ठा के साथ आम आदमी पार्टी का प्रचार कर रहा है। इस चुनाव में भी यह समूह वास्तव में आम आदमी पार्टी की प्रचार इकाई की तरह काम कर रहा था। ऐसे में जीत की यह खुशी स्वाभाविक थी।
 
आजतक ही वह इकलौता चैनल है, जिसके अनुसार, भाजपा के घोषणापत्र में कहा गया है, ‘‘पार्टी सत्ता में आएगी तो मस्जिदें तोड़ी जाएंगी और मुसलमानों को पीटा जाएगा।’’ झूठ और दुष्प्रचार का जैसा प्रलाप इस चैनल ने किया उसका लोगों पर कुछ न कुछ असर तो जरूर पड़ा ही होगा। इंडिया टुडे समूह ने ही शाहीन बाग में लंगर चला रहे एक सिख को हीरो बनाने में पूरी ताकत झोंक दी। बताया गया कि उसने अपना घर बेच दिया ताकि प्रदर्शनकारियों को खाना खिला सके। जबकि सोशल मीडिया पर लोगों ने यह पोल खोल दी थी कि वह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का नेता और खालिस्तान समर्थक है। इंटरनेट पर उसके भड़काऊ भाषणों के ढेरों वीडियो पड़े हैं। ऐसा नहीं है कि इंडिया टुडे को यह जानकारी नहीं रही होगी।
 
मीडिया ने इसे प्रमुखता नहीं दिया कि शाहीन बाग के जाम में रोज कितनी एंबुलेंस फंस रही हैं और उनमें कितनों की जान जा रही है। लेकिन आजतक चैनल ने बताया कि एक शवयात्रा को जाने की अनुमति देकर शाहीन बाग के लोगों ने मानवता की मिसाल कायम की। टाइम्स आॅफ इंडिया और नवभारत टाइम्स में आपको शाहीन बाग से जुड़ी मानवीय रिपोर्टिंग खूब मिलेगी। लेकिन आंदोलन में 4 महीने की बच्ची की मौत और इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी को ज्यादा तूल नहीं दिया गया। टाइम्स समूह के ये दोनों अखबार खुलकर अपना राजनीतिक एजेंडा चला रहे हैं। मुनव्वर राणा की बेटी ने अलीगढ़ में कहा कि हम पहले मुसलमान हैं उसके बाद कुछ और। एकाध स्थानीय अखबार में खबर छपी। सोशल मीडिया के कारण लोगों को पता चल पाया। लेकिन उनके बयान पर अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम ने जो प्रतिक्रिया दी उसे मीडिया ने विवादित बना दिया। उन्होंने केवल यह कहा था कि जिन्हें भारतीय होने में शर्म है वे पाकिस्तान चले जाएं। लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि अब इसमें क्या आपत्तिजनक है?
 
दिल्ली के गार्गी कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान छात्राओं से बदसलूकी की खबर में भी वामपंथी मीडिया ने अपना हिंदू विरोधी तड़का लगाने की भरपूर कोशिश की। बड़ी चालाकी से उड़ाया गया कि हमलावर नागरिकता कानून के समर्थक थे और वे ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे थे। इस अफवाह को टाइम्स समूह और न्यूज18 समेत कई संस्थानों ने प्रमुखता दी। क्या यह सामान्य है कि किसी भी आपराधिक घटना को चटपटा बनाने के लिए मीडिया कभी भगवान राम, तो कभी गाय तो कभी नागरिकता कानून का इस्तेमाल कर लेता है? यह कोई पहली बार नहीं हुआ है।
 
अनुच्छेद 370 हटाने पर देश तोड़ने की धमकी देने वाले उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती जैसे नेताओं के खिलाफ कड़ाई जारी है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उन्हें कोई राहत नहीं दी। लेकिन मीडिया के एक वर्ग की पूरी सहानुभूति उनके साथ है। यहां तक कि उनको लेकर प्रधानमंत्री के संसद में दिए बयान को भी गलत साबित करने की कोशिश की गई। राष्ट्रीय सुरक्षा के इस मामले पर मीडिया का यह रवैया विचित्र है।
 
भारतीय मीडिया ही नहीं, भारत से जुड़ी खबरों पर विदेशी मीडिया का रवैया भी हैरान करने वाला है। ईरान के प्रेस टीवी ने फर्जी खबर दी कि ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि मुसलमानों को गोली मार देनी चाहिए।’ ऐसी खबरें देने वाले संवाददाता कोई बाहरी नहीं होते। ज्यादातर भारतीय मूल के होते हैं जो भारत में ही रह रहे होते हैं। एक षड्यंत्र के तहत देश को बदनाम करने की नीयत से ऐसे समाचार फैलाए जा रहे हैं। सरकारी एजेंसियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।