राकेश मारिया का खुलासा कांग्रेस पर भी सवाल उठाता है
   दिनांक 19-फ़रवरी-2020
मुंबई के पूर्व कमिश्नर राकेश मारिया की आत्मकथा लेट मी से इट नाउ (Let Me Say It Now) ने 26/11 को हुए मुंबई हमले के बहुत से राज खोले हैं। ये बात दीगर है कि पुलवामा हमले की बरसी पर राहुल गांधी के बयान से एक बार फिर पाकिस्तान और वहां बैठे जिहादी खुश हुए. दुनिया में भारत को नीचा दिखाने वाले इस बयान से कांग्रेस का एजेंडा उजागर हुआ

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राहुल गांधी अपने ऊटपटांगबयानों के लिए जाने जाते हैं. हाल ही में राहुल गांधी ने मोदी सरकार से सवाल पूछा है कि पुलवामा हमले में किसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ. इस सवाल के पीछे वोटों का गणित है भले ही उसकी कितनी भी बड़ी कीमत देश को चुकानी पड़े. ये सवाल पूछकर राहुल गांधी सीमा पार बैठे आईएसआई के खुरापाती अफसरों, और देश में बैठे सिमी जैसे आतंकी संगठनों और आईएसआई के लिए ठेके पर काम करने वाले उन लोगों की आवाज बुलंद कर रहे हैं जो कि दुष्प्रचार में लगे हैं कि पुलवामा हमला स्वयं मोदी सरकार ने करवाया था ताकि पाकिस्तान पर हमला करके वोट हासिल किए जा सकें.
पाकिस्तान खुश है. एक कड़ी दिखती है, एक सिलसिला सामने आता है जो खतरनाक अंदेशे पैदा करता है. जब यूपीए सरकार के समय मुंबई पर भयंकर जिहादी आतंकी हमला हुआ तो कसाब और उसके साथी हाथों में केसरिया कलावा पहनकर आए थे. जब टीवी चैनलों पर उस दिन जब तस्वीरें आनी शुरू हुई तो छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलियां बरसाते कसाब की कलाई में कलावा भी साफ़-साफ़ देखा जा सकता था, और कुछ न्यूज़ चैनल ने रिपोर्ट भी किया कि आतंकी हाथ में मौली बांधे हुए हैं. यानी पाकिस्तान की मंशा थी कि मुंबई पर ये आत्मघाती हमला किया जाए, उसके जिहादी टट्टू ज्यादा से ज्यादा लाशें गिराकर मारे जाएं और फिर उन्हें हिंदू साबित करके हिंदू आतंकवाद का फितूर खड़ा किया जाए. पाकिस्तान शायद अपनी साजिश में सफल हो भी जाता यदि मुंबई पुलिस के बहादुर तुकाराम ओम्बले अपना बलिदान देकर कसाब को ज़िंदा न पकड़ लेते. कसाब पकड़ा गया , कराची से आतंकियों को किये जा रहे फोन भी ट्रेस हो गए. लेकिन इकोसिस्टम तब भी लगा रहा. एक किताब प्रकाशित की गई “26/11 आरएसएस की साजिश”. किताब के लेखक थे अजीज बर्नी. इस किताब में बिना ठोस बात, हवाई किले बनाकर यह साबित करने का प्रयास किया गया था कि 26/11 का आतंकी हमले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत की सुरक्षा एजेंसियों जैसे रॉ और आईबी ने अंजाम दिया था, जिसमें उन्होंने इजराइल की प्रसिद्ध खुफिया संस्था मोसाद की मदद ली थी. किताब की 25 हजार प्रतियां हिंदी में और इतनी ही अंग्रेजी में छापी गईं. जिन लोगों का लेखन और प्रकाशन से संबंध है वो जानते हैं कि प्रथम प्रकाशन के लिए ये कितनी बड़ी संख्या है. इस किताब का लोकार्पण करने के लिए पहुंचे कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, जो उस वक्त राहुल के राजनीतिक गुरु कहलाते थे. इस किताब पर संघ के एक कार्यकर्ता ने दिग्विजय और लेखक अज़ीज़ बर्नी को कानूनी नोटिस भेजा. पहले तो बर्नी अकड़े रहे लेकिन जब समझ आया कि देश के खिलाफ युद्ध, दुष्प्रचार और सेना की छवि खराब करने का मामला बनने जा रहा है, जिसमें गंभीर सजा का प्रावधान है, तो तुरंत माफ़ी मांग ली और बाज़ार में से किताब वापिस लेने को तैयार हो गए. सहारा समूह ने भी बर्नी की इस हरकत को बर्दाश्त नहीं किया और संपादक के पद से बर्नी को हटा दिया गया.
लेकिन कांग्रेस ने बर्नी को पुरस्कृत किया. कपिल सिब्बल उस समय मानव संसाधन मंत्री थे. उन्होंने बर्नी को उबारा और उसे मानव संसाधन मंत्रालय में अल्पसंख्यक मामलों का सलाहकार नियुक्त किया गया. इसी बीच मीडिया में कुछ लोगों द्वारा सेना में “हिंदू कट्टरवाद की पहुंच” जैसे लेख प्रकाशित किये गए. एक और ख़ास बात ये रही कि कांग्रेस (यूपीए) के गृहमंत्री पी चिदंबरम संसद में बयान देखकर “हिंदू आतंकवाद” का हौवा खड़ा किया. असीमानंद और उनके साथियों को गिरफ्तार किया गया जिन्हें बाद में अदालत ने छोड़ दिया. असीमानंद ने अदालत को बताया था कि उन्हें आतंकवाद का अपराध कबूलने और संघ के शीर्ष नेतृत्व का झूठा नाम लेने के लिए यातनाएं दी जा रही हैं.
जब पुलवामा हमला हुआ तो राहुल गांधी पाकिस्तानी मीडिया के हीरो बन गए क्योंकि वो और उनके दूसरे “सेकुलर” साथी इस हमले को घुमा-फिराकर भारत सरकार पर मढने की साजिश कर रहे थे. केजरीवाल का भी उस समय का बयान वायरल हुआ था जिसमें वो पुलवामा हमले का जिक्र करके कह रहे थे कि दुबारा चुनाव जीतने के लिए कितने लोगो को मरवाओगे? भारत के इन नेताओं द्वारा उपलब्ध करवाई गई मुफ्त प्रचार सामग्री का पकिस्तान और आईएसआई ने भरपूर इस्तेमाल किया. आज उस हमले के एक साल बाद राहुल ने फिर उसी तरह की बयानबाजी करके अपने इरादों की झलक दे दी है, कि अपनी राजनैतिक अक्षमता की सर्वज्ञात कमजोरी की भरपाई करने के लिए वो पाकिस्तान के एजेंडे को भी हवा देने से नहीं चूकेंगे.
राजनीति में पतन की पराकाष्ठा है ये. पाकिस्तान यही चाहता है.पाकिस्तान में बैठे पाक फौज के लोग, वहां का मीडिया और नेता राहुल, राहुल के वैचारिक गुरु मणिशंकर अय्यर और भारत के ऐसे ही तथाकथित सेकुलर नेताओं के बयानों का हवाला देते हैं कि पाकिस्तान भारत में कोई आतंकवाद नहीं फैलाता बल्कि भारत की सरकार और सेना ही स्वयं अपने नागरिकों और जवानों को मरवाते हैं ताकि पाकिस्तान को बदनाम किया जा सके.