शाहीन बाग: जिद, जुनून , मज़हब और सियासत का बाग़
   दिनांक 20-फ़रवरी-2020
अदालत, संविधान, संसद सब को धता बताकर शाहीनबाग़ वाले स्वयं को सबसे बड़ा क़ानून साबित करने पर आमादा हैं. अफवाह, उन्माद और जिद को हथियार बना रखा है

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न संसद की सुनेंगे, न अदालत की. न तर्क करेंगे, न कोई तर्क समझने को तैयार होंगे. खुद के लिए विशेष अधिकार मांगेंगे पर दूसरों के सामान्य नागरिक अधिकारों का भी हनन करेंगे. शाहीन बाग़ में जुटाई गई भीड़ को कुछ भी समझाने की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं, क्योंकि परदे के पीछे से उन्हें चलाने वाले चाहते ही यही हैं. कहावत है कि सोते हुए को उठाया जा सकता है लेकिन उसे नहीं उठाया जा सकता जो सोने का अभिनय कर रहा है.
जिस सड़क को घेरकर यह प्रदर्शन चल रहा है उससे दिल्ली के दस लाख लोग परेशान हो रहे हैं. दो महीने से जिनका व्यापार ठप हो गया है, ऐसे सैकड़ों दुकानदार और वहां काम करने वाले मायूस बैठे हैं, लेकिन तथाकथित प्रदर्शनकारी बेमुरव्वत हैं. क्या इन दुकानदारों को निर्बाध ढंग से अपनी आजीविका कमाने का अधिकार नहीं है? विद्यालय जाने वाले बच्चों, अस्पताल जाने वाले मरीजों के लोकतांत्रिक अधिकारों का अपहरण कैसे किया जा सकता है? देश की राजधानी के एक बड़े हिस्से को इस प्रकार बंधक बनाकर जो कुछ किया जा रहा है उसके लिए सिवाय ब्लैकमेलिंग के दूसरा कोई शब्द है क्या?
किससे बात करेंगे...?
हारकर लोग सर्वोच्च न्यायालय की शरण में पहुंचे. न्यायालय ने मामले की गंभीरता को समझते हुए शाहीनबाग वालों को हिदायत दी और कहा कि जिस प्रकार लोकतंत्र उन्हें प्रदर्शन करने का अधिकार देता है वैसे ही दूसरों के मूलभूत अधिकार भी हैं, और प्रदर्शन का अधिकार दूसरों के अधिकारों का हनन करने का हक़ नहीं देता. फिर अदालत ने शाहीनबाग वालों से बात करने के लिए कुछ मध्यस्थ नियुक्त किये. अब मध्यस्थ बात करने पहुंचे, लेकिन उनके सामने समस्या ये है कि बात करें तो किससे? वहां कोई प्रतिनिधि नहीं है जिससे बात की जाए. शाहीनबाग़ धरने को जानबूझकर एक भीड़ की शक्ल दी गई है, क्योंकि भीड़ की कोई जवाबदेही तय नहीं होती.आप भीड़ से तर्क नहीं कर सकते. आप भीड़ को कोई समझा नहीं सकते. शाहीनबाग एक सीखी-पढ़ाई भीड़ है. बड़े इस्लामी संगठन वहां लंगर चला रहे हैं. सब प्रकार की व्यवस्थाएं की जा रही हैं. लेकिन इस धरने का कोई चेहरा नहीं हैं.
शाहीनबाग के पैरोकारों ने टेक लगाई थी कि सरकार धरनेवालों से बात करे, लेकिन जब कहा गया कि जो बात करना चाहता है वो आगे आये, तो कोई नहीं आया. दूसरा, जब बातचीत करनी हो तो उसकी एक प्रक्रिया होती है. बातचीत करने वाले लोगों के नाम तय होते हैं. बातचीत का मसौदा तैयार होता है. शाहीनबाग़ ऐसा कुछ नहीं कर रहा है. शाहीनबाग़ सिर्फ चिल्ला रहा है.
अदालत के मध्यस्थ बात करने पहुंचें, इसके पहले प्रख्यात मोदी विरोधी, दंगों के नाम पर चंदे में घोटाला करके नाम कमा चुकीं तीस्ता जावेद सीतलवाड़ शाहीनबाग़ पहुंच गईं. धरने वालों को पट्टी पढ़ाती तीस्ता का वीडियो भी सामने आ गया जिसमें वो सवाल रटवाए जा रहे हैं ताकि बातचीत आगे ही न बढ़ सके. जिन सवालों का रट्टा लगवाया जा रहा था, और जवाब समझाए जा रहे थे, वो इस प्रकार हैं – यदि धरने की जगह बदली तो हम महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?.. जगह बदलने से हमारा आंदोलन कमजोर होगा... आदि.
धरने के नाम पर मज़हबी उन्माद 
धरने के लिए शाहीन बाग़ को ही क्यों चुना गया? जंतर-मंतर नहीं, रामलीला मैदान नहीं, आज़ाद मैदान नहीं? शाहीनबाग को चुना गया, क्योंकि उसके चारों ओर सघन मुस्लिम आबादी है. इस मुस्लिम आबादी को लक्ष्य करके एक उन्माद खड़ा किया गया. जिस सीएए कानून से देश के किसी नागरिक का कोई लेना-देना नहीं है उस सीएए को मुस्लिम विरोधी क़ानून बताया गया. वहां आने वाले तथाकथित “एक्टिविस्ट” इस्लाम की दुहाई दे रहे हैं. शरजील इमाम जैसे लोग भारत के टुकड़े करने और भारत को इस्लामी राज्य बनाने के लिए लोगों को फुसला रहे हैं, और इस आग को हवा देने वाला इकोसिस्टम इस मज़हबी मजमे को ‘सेकुलरिज्म’ की सेना बतला रहा है. देश के किसी कोने में सीएए का विरोध करने निकले नासमझ हों या शाहीन बाग़ में बैठी महिलाएं, किसी से भी बात कर लें, उन्हें इस क़ानून का क, ख, ग भी नहीं मालूम है, लेकिन उन्हें महिमामंडित किया जा रहा है. बड़ी बिंदी गिरोह मीडिया में ताली पीट रहा है कि “कमाल कर दिया शाहीनबाग़ की दादियों-नानियों !..” सच ये है कि इन दादियों-नानियों को एक कहानी सुनाई गई है, जिसे सच मानकर वो दिन में जिन्नात और फ़रिश्ते देख रही हैं. कोई उनसे जाकर कहे तो कि कोई एक मुसलमान तो सामने लाकर खड़ा करो जो सीएए से प्रभावित या प्रताड़ित हुआ है?
सीएए संविधान सम्मत है, लेकिन चीख-चीखकर उसे संविधान विरोधी बतलाया जा रहा है, और संविधान के इन तथाकथित रक्षकों ने देश की संपत्ति की रक्षा करने, क़ानून व्यवस्था का सम्मान करने और दूसरे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के संविधान के आदेश की धज्जियां उड़ा दी हैं. देश में जगह-जगह सीएए विरोधियों ने सड़क पर उत्पात मचाया, आगज़नी की, बसें फूंकी और पत्थरबाजी की. शाहीनबाग़ में अदालत ने प्रदर्शनकारियों से सड़क को खोलने को कहा तो कान नहीं दिया.सीएए का विरोध करने के लिए 19 फरवरी को चेन्नई की वाल्लाजाह सड़क पर हजारों मुस्लिम जमा हुए, . एक ही दिन पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने उस सड़क पर प्रदर्शन करने की मनाही की थी. इस प्रदर्शन का आयोजन स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने किया था.
शहर दर शहर फसाद
शाहीनबाग़ का उदाहरण सामने रखकर देश में शहर-दर शहर छोटे-मंझोले-बड़े शाहीनबाग़ अंजाम दिए जा रहे हैं. जहां ‘कौआ कान ले गया.. ‘ की तर्ज़ पर भाषण हो रहे हैं. कई जगह इन मज़मों में देश और हिंदुत्व के खिलाफ ज़हर भी उगला जा रहा है. शरजील जैसों को हीरो बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, और वामपंथी कारखाने में ब्रेनवॉश किए गए इक्का-दुक्का छात्र नारे लगाकर सनसनी की सवारी करना चाह रहे हैं कि “शरजील तेरे खून से, इंकलाब आएगा.” पंडाल, खाना-पीना, दिहाड़ी वगैरह का इंतजाम स्थानीय “सेकुलर” नेता या पीएफआई मार्का लोग कर रहे हैं. उधर अदालत के भेजे मध्यस्थों को धरने वालों ने कह दिया है कि वो ‘एक इंच भी नहीं हटेंगे’. उन्माद की ताकत, पैसे के चारे के दम पर “सेकुलरिज्म” और “संवैधानिक मूल्यों” का जुलूस निकाला जा रहा है जो अफवाह की पीठ पर सवार होकर हवा से बातें कर रहा है.