मातृशक्ति के बिना पूर्ण नहीं हो सकता हमारा लक्ष्य
   दिनांक 26-फ़रवरी-2020
हम जो काम करते हैं, वह कर सकें, उसके लिए हमारे घर में जो माता-बहनें हैं उनको जो करना पड़ता है, वह हमारे कार्य से कई गुना ज्यादा कष्टदायक है।
 
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कार्यक्रम को संबोधित करते (मध्य में) श्री मोहनराव भागवत। मंच पर साथ हैं (दाएं) पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंती भाई भाड़ेसिया एवं गुजरात प्रांत संघचालक डॉ. भरतभाई पटेल
 
 
 
गत दिनों कर्णावती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने स्वयंसेवक परिवार मिलन कार्यक्रम को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक जो कुछ काम संघ में करते हैं, वह जानकारी परिवार को भी दें, ऐसी पूर्ण अपेक्षा है, क्योंकि हम जो काम करते हैं, वह कर सकें, उसके लिए हमारे घर में जो माता-बहनें हैं उनको जो करना पड़ता है, वह हमारे कार्य से कई गुना ज्यादा कष्टदायक है।
 
उन्होंने कहा कि हमको जो कार्य करना है, वह मातृशक्ति के बिना हो ही नहीं सकता। हिन्दू समाज को गुण संपन्न और संगठित होना चाहिए और जब हम समाज कहते हैं तो उसमें केवल पुरुष नहीं, मातृशक्ति भी है। समाज यानी उसमें आपस में अपनापन होता है, उस अपनेपन के कारण उसकी एक समान पहचान होती है।
 
समान पहचान के कारण जो लोग एकत्रित आते हैं वे सब अपने आपको समाज कहते हैं जिसमें समान पहचान बताने वाले आचरण के संस्कार होते हैं। मैं हिन्दू हूं, मैं सभी के श्रद्धा स्थानों का सम्मान करता हूं, लेकिन अपने श्रद्धा स्थान के विषय में एकदम पक्का रहता हूं। मैंने अपने सभी संस्कार कहां सीखे तो, अपने कुटुंब से, परिवार से और यह सिखाने का काम हमारी मातृशक्ति करती है। हमको समाज का संगठन करना है। इसलिए अपना जो काम है, उसके विषय में सभी कार्यकर्ताओं को अपने-अपने घर पर सब बताना चाहिए।
 
गृहस्थ हैं, तभी समाज है। गृहस्थ नहीं है तो समाज नहीं है, क्योंकि आखिर समाज को चलाने का काम गृहस्थ ही करता है। अत: शाखा में संघ का काम करो, समाज में संघ का काम करो और अपने घर में भी संघ का काम करो, क्योंकि आपका घर भी समाज का हिस्सा है। अपने देश के इतिहास में जहां-जहां कोई पराक्रम का, वीरता का, विजय का, वैभव का, सुबुद्धि का पर्व है, वहां-वहां आप देखेंगे कि उन सारे कार्यों को मन, वचन, कर्म से कुटुंब का आशीर्वाद मिला है। समाज संगठित होना यानी कुटुंब में इन संस्कारों का पक्का होना।