एक दल की कठपुतली बनता सेकुलर मीडिया
   दिनांक 26-फ़रवरी-2020
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद सेकुलर मीडिया स्थानीय मुद्दों को कर रहा अनदेखा 
 a_1  H x W: 0 x
 
ज्यादा दिन नहीं हुए जब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की हर नकारात्मक घटना राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में हुआ करती थी। कुछ जिला स्तर के आंदोलन भी कई दिन तक अखबारों और चैनलों पर छाए रहते थे। लेकिन अब समय बदल चुका है। इन तीनों राज्यों में अब कांग्रेस की सरकार है।
 
इसलिए समाचार के महत्व को नापने वाला पैमाना भी बदल चुका है। राजस्थान के नागौर में अनुसूचित जाति के दो भाइयों पर अमानवीय अत्याचार की घटना पर पूरे तीन दिन बाद तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया की नजर पड़ी। सोशल मीडिया पर इस घटना का वीडियो वायरल हो रहा था। लेकिन न जाने क्या दबाव था कि यह समाचार छिटपुट ही कहीं-कहीं दिखाई दिया। चौथे दिन जब राहुल गांधी ने ट्वीट किया, तब जाकर उनके ट्वीट के साथ चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज चलनी शुरू हुई। यह कोई इकलौती घटना नहीं है, राजस्थान में जब से कांग्रेस की सरकार आई है। इन राज्यों में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ मामलों में कांग्रेस से जुड़े लोगों के हाथ भी पाए गए हैं, लेकिन मीडिया ने इसे अब मामूली अपराध की श्रेणी में डाल दिया है।
 
उधर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक के बीच वे सारे मुद्दे गायब हैं जिन पर वह चुनी गई थी। मीडिया इस बारे में सरकार से कोई सवाल नहीं पूछता। ढाई महीने से अतिथि अध्यापकों का धरना चल रहा है। महिलाएं अपने सिर के बाल कटवा कर राहुल गांधी को भिजवा रही हैं, लेकिन दिल्ली तो क्या भोपाल के मीडिया में भी शाहीन बाग की पल-पल की खबरें बताई जा रही हैं। भोपाल के अखबारों में स्थानीय समाचारों से ज्यादा शाहीन बाग के प्रदर्शन की तस्वीरें मिलेंगी। बेरोजगारी के मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश के औसत से ऊपर पहुंच चुका है। लेकिन तमाम क्रांतिकारी पत्रकार इस बारे में सवाल पूछते नहीं दिखाई दे रहे। यही हाल छत्तीसगढ़ में है, जहां धान खरीद को लेकर किसान सड़कों पर हैं। कुछ जगह लाठीचार्ज हुआ, जिसमें कई किसान घायल हुए हैं। घोटाले के भी आरोप हैं। कांग्रेस नेताओं के धान की खरीद प्राथमिकता के आधार पर की गई और किसान उपज लेकर मंडियों में भटक रहे हैं। इस सबसे दूर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अमेरिका की सैर पर हैं। छत्तीसगढ़ का यह सारा घटनाक्रम दिल्ली के मीडिया से गायब है। स्थानीय अखबार और चैनल भी यह ध्यान में रख रहे हैं कि सरकारी विज्ञापनों का कोई नुकसान न हो।
 
झारखंड में पिछले दिनों 7 वनवासियों की हत्या का समाचार भी कुछ इसी तरह से दबाया गया था। वहां के दौरे पर गए गृहमंत्री अमित शाह ने जब अपने भाषण में उस घटना का जिÞक्र किया तो दिल्ली के चैनलों और अखबारों ने ध्यान रखा कि वह बयान ज्यादा प्रमुखता न पाने पाए। इसके बजाय पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर झूठ फैलाने में मीडिया ने पूरी ताकत झोंक दी। आजतक चैनल तो पहले ही सारी मयार्दाएं पार कर चुका है। चैनल ने इस मामले पर कई दिन तक झूठ फैलाने की कोशिश की। ऐसा करते हुए पूरा इंडिया टुडे समूह कई बार कांग्रेस के दुष्प्रचार तंत्र का हिस्सा मालूम होने लगता है। पुलवामा हमले पर राहुल गांधी का गैरजिÞम्मेदार बयान आया।
 
उन्होंने पूछा कि पुलवामा से किसको फायदा हुआ? आजतक चैनल ने बताना भी शुरू कर दिया। चैनल पर एक के बाद एक कार्यक्रमों के जरिए समीक्षा होने लगी कि उस आतंकवादी हमले से किसको राजनीतिक लाभ हुआ। सेना में महिलाओं की पक्की नौकरी पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का श्रेय भी राहुल और प्रियंका गांधी को देने की पूरी कोशिश हुई। उनके ट्वीट के आधार पर खबरें चलाई गईं, जिनमें दावा किया गया था कि भाजपा सरकार ने महिलाओं को सेना में पक्की नौकरी का विरोध किया था। ऐसा करते हुए यह तथ्य भी बड़ी चालाकी से छिपाया गया कि महिलाओं के अधिकार का यह मुकदमा भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने बिना कोई शुल्क लिए लड़ा है।
 
जामिया हिंसा मामले में भी मीडिया ने पक्षपात की पूरी कोशिश की। सीसीटीवी कैमरे के एक छोटे से वीडियो के आधार पर साबित करने की कोशिश हुई कि पुलिस ने पुस्तकालय में घुसकर मारपीट की थी। जब इसका पूरा वीडियो सामने आया तो दूध का दूध पानी का पानी हो गया। लेकिन सच साफ होने के बावजूद ज्यादातर चैनलों ने अब इसे आरोप-प्रत्यारोप के तौर पर दिखाना शुरू कर दिया। जबकि इस मामले में जामिया के छात्रों ही नहीं, बल्कि वहां के प्रशासन की भूमिका भी सीधे तौर पर सवालों में है। ल्ल