सावरकर को क्यों दुश्मन मानते हैं कांग्रेस और वामपंथी ?
   दिनांक 26-फ़रवरी-2020
दुनिया यह जानती है कि बेगुनाहों की जान लेते हुए भी दिल में जन्नत और बहत्तर हूरों का ख्वाब पालने वाला कोई इस्लामी जिहादी भले हो, सामान्य इंसान नहीं हो सकता!लेकिन मरने वाले की कलाई पर कलावा बंधा हो तो बात उलझ सकती है! मुंबई हमला दुनिया को उलझन में डालने वाली ऐसी ही चाल थी। भगवा और आतंकवाद! हो ही नहीं सकता !

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यह बात लोग शुरू से जानते थे कि यह शब्द गढ़ा गया है और इसके पीछे बड़ा षड्यंत्र है। अब साजिश की परतें उघड़नी शुरू हो गई हैं। मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की आत्मकथा (लैट मी से इट नाउ) से यह बात साफ हो जाती है कि हाथ में कलावा बांधे कसाब और उसी की तरह हिन्दू पहचान ओढ़े मुस्लिम आतंकियों के पास फर्जी पहचान पत्र इसलिए थे, क्योंकि इस्लामी हमले को हिन्दू दिखाना ही उद्देश्य था!
बताया जा रहा है कि यह सारी चालबाजी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की थी, ताकि आतंकी का मजहब सिर्फ छिप ही न जाए, बल्कि उस पर हिन्दू ठप्पा लग जाए।
ठीक! लेकिन आईएसआई ही क्यों? क्या हिन्दू समाज और संगठनों पर उन्मादी होने का झूठा ‘लेबल’ लगाने का ऐसा ही काम कांग्रेस पार्टी नहीं कर रही थी? ‘भगवा आतंकवाद’ का हौआ खड़ा करने की तरकीब लेकर सबसे पहले राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु दिग्विजय सिंह आए। इस शब्द को बार-बार दोहराने और जांच तथा विमर्श को धीरे-धीरे एक खास दिशा में धकेलने का काम खुद राहुल गांधी, पी. चिदम्बरम, सुशील शिंदे आदि ने किया। कांग्रेस ने तो इस मुद्दे पर अजीज बर्नी से पूरी किताब लिखवा मारी थी! इतना ही नहीं, बाद में कपिल सिब्बल द्वारा झूठ पर टिकी किताब के लेखक को अल्पसंख्यक मंत्रालय में सलाहकार के पद से भी नवाजा गया!
यानी जो बात सीमापार आईएसआई को रास आ रही थी, जिसे उसके गुर्गे अंजाम तक पहुंचा रहे थे, ठीक वही बात यहां कांग्रेस अपने नेताओं और उनके प्यादों के माध्यम से भारत में साबित करने में लगी थी!
यानी! यानी यही कि मजहब के आधार पर देश बंट गया, जिन्ना और नेहरू के बीच कुर्सियां बांट ली गईं लेकिन लोगों को बांटने वालों के बीच कदमताल और तालमेल कायम रहा! बात ज्यादा कड़वी हो सकती है मगर सच से परे नहीं दिखती, क्योंकि कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का वह साक्षात्कार याद आ जाता है, जिसमें वे पाकिस्तानी मीडिया से गुहार लगाने के अंदाज में कह रहे हैं- हमें ले आइए, इन्हें (मोदी/भाजपा को) हटाइए!
तुष्टीकरण का आरोप कांग्रेस पर लगता रहा, नई बात जो पकड़ में आई वह यह कि देश में ऐसी राजनीति पल रही है जो देश के दुश्मनों को भी संतुष्ट करती है!
गौर कीजिए, हिन्दू समाज और संगठनों को घेरने की यह पहली चाल नहीं थी, जो सोनिया-राहुल के दौर में चली गई। सिमी पर नरम और अभिनव भारत पर गरम, दक्षिण में पीएफआई से हाथ मिलाती और उत्तर में सेना का मनोबल तोड़ने वाले बयान जारी करती कांग्रेस और उसके कामरेड साथी क्या पहले से ऐसे नहीं हैं? गांधी हत्या के बाद संघ पर आरोप लगाने वाली कांग्रेस का समाज से कटाव और तुष्टीकरण के लिए झुकाव जवाहरलाल नेहरू के समय भी ऐसा ही तो था!
और ऐसा क्यों न होता, वामपंथी दल क्या थे? भारत की राजनीति को विदेशी आकाओं के इच्छानुसार चलाने के लिए रचे गए तंत्र! खुद कांग्रेस लंबे समय तक क्या थी? ईस्ट इंडिया कंपनी के राज को कायम रखने और जनता का गुस्सा सुरक्षित तरीके से निकाल बाहर करने की गरज से अंग्रेजों द्वारा बनाया गया ‘सेफ्टी वॉल्व’! तो क्या आश्चर्य कि देश की बात, एकता की बात, इस देश की हिन्दू पहचान की बात करने वाले व्यक्ति या सामाजिक अभियान ऐसे दलों और इनके पारिस्थितिकी तंत्र को खटकते रहे।
ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विनायक दामोदर सावरकर सरीखे व्यक्तित्व यदि ऐसे राजनीतिक दलों को खटकते हैं तो इसमें कैसा आश्चर्य। जो संघ हर आपदा में देश-समाज के साथ खड़ा दिखता है, उसके कार्यकर्ताओं की हत्या इन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता करते हैं, कार्यालयों पर आतंकी हमलों के प्रयास होते हैं तो समझा जा सकता है कि देश से किसके सरोकार जुड़े हैं। जो सावरकर तब अंग्रेजों के दुश्मन थे, जिन्हें एक ही जन्म में दो जन्मों की सजा देने का फैसला अंग्रेजों ने तब किया, उन्हें कांग्रेस और वामपंथी आज भी अपना दुश्मन मानते हैं तो इसके पीछे क्या कारण होंगे, समझा जा सकता है। जिनकी नजरों में कसाब से ज्यादा उसकी पहचान खटकती है, जिनकी आंखों में बटला हाउस पर पानी भर आता है और उनके गले सावरकर पर बात करने में क्यों सूखने लगते हैं, यह कोई अनुसंधान का विषय नहीं है।
बहरहाल, ‘भगवा आतंक’ की कहानी भरभरा कर गिर चुकी है। बात करते हैं सावरकर की। क्रांतिकारियों को गढ़ने वाले, विश्व घटनाक्रम को घटने से पहले पढ़ने वाले और ब्रिटिश सत्ता से चतुराई से लड़ने वाले सावरकर ऐतिहासिक आभा के साथ स्वतंत्र भारत के मानस पर क्यों दृढ़ हैं, इसके लिए पढ़ना जरूरी है।