महाविनाश मचाती ऑस्ट्रेलिया की जंगली आग
   दिनांक 03-फ़रवरी-2020
इस बार जंगली आग का मौसम ऑस्ट्रेलिया के लिए राष्ट्रीय आपदा में बदल गया है। बीते सितंबर से अब तक लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर भूमि जल गई है, जो लगभग उत्तराखंड राज्य के आकार से दोगुनी है। लगभग 25 लोगों की जान चली गई है और 2000 से अधिक लोगों के घर नष्ट हो गए हैं

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 ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में चार महीने से धधक रही आग पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका है, इस दावानल में अब तक एक अरब वन्यजीव जलकर मर चुके हैं
जून 2019 - ऑस्ट्रेलिया में जंगली आग के मौसम की शुरुआत। हां, आपने सही पढ़ा है। जिस तरह भारत में हमारे छह अलग-अलग मौसम हैं, उसी तरह ऑस्ट्रेलिया में भी जंगली आग का मौसम है। यह अलग-अलग क्षेत्रों में इसका समय अलग-अलग है। मतलब है कि ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए झाड़ के जंगलों में आग लगना बहुत असामान्य बात नहीं हैं। फिर असामान्य क्या है ?
असामान्य है गर्मी के सारे रिकार्ड तोड़ता 17 दिसंबर, 2019 का सबसे गर्म दिन। आमतौर पर लोगों से बचने वाले कोआला का प्यास बुझाने और जान बचाने के लिए साइकिल सवारों के समूह के बीच आ जाना। लाल आकाश का आतंक, जैसे पृथ्वी पर जीवन के विकास के आरंभ से पहले का समय हो। आग से बचने में विफल कोआला का एक निस्सहाय बच्चे का जलकर मर जाना। लाखों जानवर आग की लपटों में घिर जाना। किसानों के पास अपने जले हुए जानवरों को मार देने के लिए मजबूर होना। अपने बच्चे को गले से लगाए एक मां कंगारू का डर और अनिश्चितता के साथ इधर-उधर देखना। ये सभी असामान्य और परेशान करने वाले दृश्य हैं!
लेकिन इसी के साथ, पिछले पांच महीनों से ऑस्ट्रेलियाइयाओं द्वारा दिखाई जा रही असीम गर्मजोशी और साहस भी असामान्य है। इस बार जंगली आग का मौसम ऑस्ट्रेलिया के लिए राष्ट्रीय आपदा में बदल गया है। बीते सितंबर से अब तक लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर भूमि जल गई है, जो लगभग उत्तराखंड राज्य के आकार से दोगुनी है। लगभग 25 लोगों की जान चली गई है और 2000 से अधिक लोगों के घर नष्ट हो गए हैं।
सिडनी विश्वविद्यालय के एक पर्यावरणविद् ने पहले अनुमान लगाया था कि आग लगने से लगभग 50 करोड़ जानवर मर गए हैं। लेकिन, अब उनका कहना है कि अकेले न्यू साउथ वेल्स में 80 करोड़ जानवरों की मौतों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या लगभग एक अरब हो गई है। हालांकि, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि मरने वाले जीवों की संख्या एक अरब से अधिक होने की संभावना है। इन अनुमानों में केवल स्तनधारी (चमगादड़ को छोड़कर), पक्षी और सरीसृप शामिल हैं; मेंढक, कीड़े या अन्य अकशेरुकी जीवों को नहीं रखा गया है जिनकी कई प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी होंगी।
यहां कुछ सवाल जवाब मांगते हैं! किस चीज ने इस वर्ष की जंगली आग को इतना विनाशकारी बनाया? मरने वाले जानवर इतनी गंभीर चिंता का विषय क्यों हैं? वह देश इसका मुकाबला कैसे कर रहा है और हम मदद में क्या कर सकते हैं?
हम जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया पृथ्वी का सबसे शुष्क महाद्वीप है। ऑस्ट्रेलिया का एक तिहाई हिस्सा रेगिस्तानी है और एक तिहाई शुष्क झाड़ और घास के बड़े-बड़े मैदान हैं। देश का भूगोल और जलवायु ही आमतौर पर झाड़ के जंगलों में आग का कारण बनते हैं। जंगली आग के खतरे का समय देश के अलग-अलग भागों में जलवायु के आधार पर भिन्न होता है। आस्ट्रेलिया के उत्तरी भागों में यह खतरा आम तौर पर सर्दियों और वसंत में होता है जबकि अधिकांश दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में खतरे की अवधि गर्मियों और पतझड़ के समय होती होती है। दक्षिण-पूर्व ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे अधिक जोखिम आमतौर पर वसंत और शुरुआती गर्मियों के दौरान होता है।
2019 में, जब जंगली आग शुरू हुई, तो देश अब तक ज्ञात सबसे गर्म और सबसे शुष्क वर्ष का सामना कर रहा था जिससे सूखे जैसे हालात पैदा हो गए थे। इन परिस्थितियों में, देश के अधिकांश हिस्सों में धनात्मक हिंद महासागरीय द्विध्रुव के साथ पैदा होने वाली तेज हवाओं के कारण रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की लहर ने अकल्पनीय विनाशकारी आग को जन्म दिया। आग इस साल दक्षिण-पूर्वी तट तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश में फैल गई।

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इन अग्निकांडों से वातावरण में लगभग 35 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड पहुंचने का अनुमान है और विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इस कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करने में एक सदी या उससे अधिक समय की आवश्यकता होगी।
रेड क्रॉस की रिपोर्ट कहती है, "कुछ क्षेत्रों में जंगली आग की तीव्रता और आकार ने उनकी स्वयं की मौसम प्रणालियों का निर्माण कर दिया है जिससे पायरोकुमुलोनिम्बस (अग्निपुंज) श्रेणी के बादल पैदा होते हैं जो गर्मी को अवशोषित करते हैं जिससे तेज हवाएं चलने लगती हैं और आकाशीय बिजली गिरती है जिससे और इलाकों में आग लग जाती है।"
वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष के इस हिस्से में उच्च तापमान, शुष्क मौसम और जंगल की आग असामान्य नहीं है। लेकिन उन्होंने इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है कि इन ज्वलंत स्थितियों की गंभीरता और निरंतरता खतरनाक है और जलवायु परिवर्तन के पैटर्न के अनुकूल है।
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन इस आग का सीधा कारण नहीं है, लेकिन निश्चित रूप से यह योगदान करने वाला एक कारक रहा है।
जंगलों में जल रही आग ने ऑस्ट्रेलिया को जैव विविधता के लिए वास्तविक अर्थो में गर्म स्थान बना दिया है। ऐसा स्थान जहां धधकती आग और गर्मी के प्रकोप में निर्दोष जानवरों की जान या संभवतः पूरी प्रजाति समाप्त हो रही है।
हम नहीं जानते हैं कि अब तक कितनी प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। लेकिन हर कोई इस बात से डरा हुआ है कि इन झाड़ियों में मरने वाली प्रजातियां हमेशा हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है। इस कारण यह है ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले अधिकांश जानवर मार्सुपियल्स हैं। मार्सुपियल्स श्रेणी की लगभग 70% प्रजातियां ऑस्ट्रेलिया की स्थानिक प्रजातियां हैं। इसका मतलब यह है कि अगर आग बढ़ती रही, तो भविष्य में ऑस्ट्रेलिया को कंगारुओं, कोआलाओं, वोम्बैटों और कई अन्य दुर्लभ प्रजातियों की भूमि नहीं कहा जा सकेगा।
मेंढक, सांप और अन्य अकशेरुकी प्रजातियों की मृत्यु और मार्सुपियल प्रजाति की अपूरणीय क्षति (अकेले न्यू साउथ वेल्स में लगभग 8000 कोआलाओं की मृत्यु हो चुकी है) के साथ कहा जा सकता है कि दुर्भाग्य से हम रिवेट परिकल्पना (1994) में जी रहे हैं। यह परिकल्पना प्रत्येक प्रजाति के नष्ट होने से पारिस्थितिकी तंत्र के काम पर पड़ने वाले प्रभाव की तुलना हवाई जहाज के पंखों में लगे रिवेटों के एक-एक कर नष्ट होने से करती है। यह संकेत है कि ऐसा कई प्रजातियों के नष्ट होने से एक दिन पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का पतन हो सकता है और यह वास्तव में चिंतित करने वाला कारण है!

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लेकिन आप खुद से पूछें कि क्या केवल ग्रह के बारे में चिंता करके इसे बचाया जा सकता है? बिलकूल नही। वास्तविक क्रिया ही वास्तविक समाधान की ओर ले जाती है। यही बात वे लोग सिद्ध कर रहे हैं जो अपने जीवन को जोखिम में डालकर भी वन्यजीवों को बचाने और आग को नियंत्रित करने के लिए प्रयत्नशील हैं। सभी लोग अग्निशमन दल के सदस्य के रूप में आग को नियंत्रित करने के प्रयासों में हिस्सेदारी नहीं कर सकते, लेकिन वे अपने घर पर पशु आश्रय बना रहे हैं, जानवरों के बच्चों के रहने लायक जेबें बना रहे हैं, सुनिश्चित कर रहे हैं कि घायल जानवर उपचार केंद्रों और वन्यजीव अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके और बचाए जा सके जानवरों की अपने बच्चों की तरह से देखभाल कर रहे हैं। बहुत से स्वयंसेवक सड़कें बंद हो जाने के कारण अलग-थलग पड़ गए परिवारों और समुदायों के बचाव और उनकी आवश्यकताएं पूरी करने में जुटे हैं।
इरविन परिवार जैसे परिवारों की कहानियां बहुत ही हृदयस्पर्शी है, जो वन्यजीवों को बचाने के काम में लगा है और पूरे ऑस्ट्रेलिया में अब तक 90 हजार जानवरों को बचा चुका है। इस परिवार के एक सदस्य टेरी का कहना है कि, "अब हम उस स्थिति में हैं जहां हमें अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय होना होगा।"
ऐसे प्रयास करने वालों में न केवल ऑस्ट्रेलिया निवासी बल्कि दूर रहने वाले लोग भी हैं जो इस प्रयास में हिस्सेदारी की कोशिश कर रहे हैं। इंग्लैंड की केटी कहती हैं, "आप बस चुप बैठ कर सब कुछ देखते नहीं रह सकते।" इसलिए, उन्होंने बचाए गए छोटे जानवरों के अनुकूल पाउच बनाने का फैसला किया जिसमें वे बढ़ सकें। वह दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। ऐसे नायकों की कहानियाँ और भी हैं।
प्रकृति के नियमों से अनजान एक अबोध बच्ची को भी इन नायकीय प्रयासों में भूमिका निभानी थी। कुल 19 महीने की शार्लोट ने अपने स्वयंसेवी फायरफाइटर पिता के अंतिम संस्कार में अपने पिता का सेवा पदक और हेलमेट पहना। हो सकता है कि प्रकृति की रक्षा के लिए किसी दिन वह भी अपने पिता की ही तरह लड़ने जाए जिनके बारे में उसे बताया गया था कि, "आपके पिताजी एक निःस्वार्थ व्यक्ति थे... वास्तव में वह एक नायक थे और उन्होंने दूसरों को बचाने में अपने प्राणों की आहुति दी।" उनके जैसे लोग सिद्ध कर रहे हैं कि प्रकृति की ही तरह दया और साहस की भी कोई सीमा नहीं होती।
ऐसी बहुत सी कहानियां हैं, जो आपके हृदय को मथेंगी और आपसे इस ग्रह, ‘आपके अपने’ ग्रह, के प्रति हितैषी रुख अपनाने का आग्रह करेंगी। क्योंकि दुनिया के एक हिस्से में की गई आपकी कार्रवाई दुनिया के किसी दूसरे हिस्से या शायद पूरे ग्रह को नष्ट करने की क्षमता रखती है। और, दुख की बात यह है कि आप को यह पता भी नहीं है!
जेन गुडाल कहती हैं, "आप जो भी करते हैं, उससे फर्क पड़ता है। और, यह आपको तय करना है कि आप कैसा परिवर्तन लाना चाहते हैं।" ऐसे वक्त में हम जो कर सकते हैं वह यह है कि या तो हम इस उद्देश्य के लिए दान करें नहीं तो कम से कम अपने जीवन में एक सकारात्मक वातावरण-हितैषी परिवर्तन ले आएं जो हमारे पारिस्थितिक तंत्र का भाग्य बदलने में मददगार हो सके।
( लेखिका पर्यावरण विज्ञान की छात्रा हैं )