खिलाफत से शाहीन बाग़ तक नहीं बदली मानसिकता
   दिनांक 03-फ़रवरी-2020
सीएए के विरोधी वास्तव में क्या मांग रहे हैं ? वो मांग रहे हैं पाकिस्तान और बंग्लादेश के मुसलमानों को, वहां की सारी आबादी को भारत आकर बसने देने की छूट. सीएए में मुसलमानों को भी शामिल करने की मांग का यही व्यवहारिक मतलब है

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खिलाफत से शाहीन बाग़ तक छद्म सेकुलर राजनीति के सौ साल पूरे हो रहे हैं. आज से सौ साल पहले भारत में राजनैतिक इस्लाम का आधुनिक दौर शुरू हुआ था, जब प्रथम विश्व युद्ध के अंत में एक दूरदराज़ के देश के भ्रष्ट खलीफा के लिए भारत में जमीन आसमान एक कर दिया गया था. पैरों के नीचे जमीन है या नहीं इसकी चिंता किए बिना लंबे-लंबे डगों के साथ एक आंदोलन आगे बढ़ा जिसे नाम दिया गया खिलाफत आंदोलन. इस आंदोलन ने वैश्विक इस्लामवाद (पैन इस्लामिज्म) की मानसिकता को हवा दी जो राष्ट्रों की सीमाओं में विश्वास नहीं करता. जिसका परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया. शाहीन बाग़ में मजमा लगाकर एक बार फिर उसी अखिल इस्लामवाद को उभारने का प्रयास किया जा रहा है. जिसमें बड़े-बड़े खिलाड़ी शामिल हैं, और भारत की छद्म सेकुलर राजनीति जिसकी आंच पर वोटों की फसल काटने के ख्वाब देख रही है.
फिर वही कहानी
आज से 14 दशक पहले, सर सैय्यद अहमद खान ने, जिन्हें कई बार सुधारवादी मुस्लिम के रूप में चित्रित किया जाता है, आवाज़ उठाई कि मुसलमानों का नेतृत्व करने के लिए गैर मुस्लिमों का दल अधिकृत नहीं है, कोई मुस्लिम दल ही उनकी मांगे उठा सकता है. 1886 में मुहम्मदन एजुकेशनल कांफ्रेंस की स्थापना की जिसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए धनसंग्रह किया. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अपनी स्थापना के बाद से ही इस प्रकार के अलगाववादी तत्वों का गढ़ बन गई. सर सैय्यद की इसी मुहम्मदन एजुकेशनल कांफ्रेंस ने आल इंडिया मुहम्मदन एजुकेशनल कांफ्रेंस के नाम से दिसंबर 1906 में ढाका में आल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना की. जिसने अंततः पाकिस्तान को जन्म दिया. सर सय्यद और मुस्लिम लीग दोनों का उद्देश्य था अंग्रेजीदां मुसलमानों और अंग्रेजों के पिछलग्गू नवाबों तथा अभिजात्यों का दल बनाकर अंग्रेजों से सुविधाएं हासिल करना और भारत के मुस्लिमों की नेतागिरी करके एक ताकत के रूप में उभरना. इसलिए मुस्लिमों को भारत की मुख्यधारा में समाहित होने से रोकने के प्रयास भी समानांतर रूप से चलते रहे जिसमें अंग्रेजों का सहयोग उन्हें मिलता रहा.
तुर्की उन दिनों इस्लामी खलीफा के अंतर्गत शासित था, जिसके हाथ लाखों लोगों के खून से रंगे थे. 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ा जिसमें तुर्की के खलीफा ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे जर्मनी का दामन थाम लिया. तुर्की के अंग्रेजों के खिलाफ जाते ही भारत में मुस्लिम लीग और उसके जैसे मुस्लिम नेताओं ने रातों-रात पाला बदल लिया उअर अंग्रेजों के खिलाफ हो गए. प्रथम विश्वयुद्ध के अंत में तुर्की में खलीफा की सत्ता छिन्न-भिन्न हो गई , और मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में एक नया आंदोलन और नयी व्यवस्था प्रारंभ हुई, जिसमें से आधुनिक तुर्की का उदय हुआ. इस नयी व्यवस्था में पुराने इस्लामी खलीफा के लिए स्थान नहीं था. खलीफा को तुर्की की जनता ने ही नकार दिया था. लेकिन भारत का मुस्लिम नेतृत्व खलीफा के लिए आंसू बहाने लगा और अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद के नारे लगाने लगा. इसे मौक़ा समझकर कांग्रेस भी इस जिहाद के नारे को बुलंद करने लगी और खिलाफत आंदोलन का जन्म हुआ. किसी ने ये कहने की समझ या हिम्मत नहीं दिखाई कि एक दूरदराज के इस्लामी देश से भारत के मुसलमानों का क्या लेना-देना है ? भारत के मुसलमानों को अपने देश की चिंता करनी चाहिए, या किसी खलीफा की? परिणाम ये हुआ कि अखिल वैश्विक इस्लामी भाईचारे का नारा बुलंद हुआ, जिसने भयंकर सांप्रदायिक रूप ले लिया. विनाशकारी दंगे हुए, जिसमें मोपला मुस्लिमों द्वारा किया गया नरसंहार भी शामिल है.
उसी दुष्प्रचार को फिर हवा दी जा रही है. वही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया यूनिवर्सिटी और उसी तरह के नेता, छोटे-बड़े-छुटभैये नेता उसी तरह की बातें कर रहे हैं. अबू आज़मी के बेटे फरहान आज़मी का वीडियो सामने आया जिसमें फरहान ने डींग हांकी कि “हमें यदि भारत से जाने को कहोगे तो दुनिया में ढाई सौ करोड़ मुसलमान हैं, 50 से ज्यादा मुसलमान देश हैं, वो हमें गले लगाएंगे, लेकिन हम कहीं जाने वाले नहीं”. अब भारत से मुसलमानों को जाने के लिए कौन कह रहा है? और ये मुस्लिम देश मुसलमानों के प्रति इतना ही भाईचारा रखते हैं तो आपस में मिलकर एक बड़ा इस्लामी देश क्यों नहीं बना लेते? इसी प्रकार के बयान अकबरुद्दीन ओवैसी के आते रहते हैं. बंगाल, यूपी, बिहार से इसी प्रकार वीडियो वायरल हो रहे हैं. सेकुलर राजनीति खामोश तो है ही, अपनी हरकतों और अफवाह तंत्र के माध्यम से अंगारों को सुलगा भी रही है.गाहे-बगाहे हिंदू भावनाओं को आहत भी किया जा रहा है.
फरहान ने उद्धव ठाकरे के अयोध्या जाने वाले बयान के हवाले से कहा है कि यदि उद्धव ठाकरे अयोध्या जाएंगे तो “हम भी बाबरी मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या जाएंगे”. सत्ता के लोभ में शिवसेना ने जो गठबंधन कर लिया उससे आज उसका मुंह बंध गया है. अब ये फैसला शिवसेना को करना है कि वो ऐसे तत्वों के साथ कब तक गलबहियां कर सकती है. पर यहां सवाल दूसरा है. राम मंदिर पर सर्वोच्च अदालत का फैसला आने के बाद ऐसे तत्व उसे मानने को तैयार नहीं. उन्हें करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं से मतलब नहीं. और देश के “सेकुलर” नेता ऐसे तत्वों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते.
बेसर-पैर की मांगें
शाहीन बाग़ में प्रदर्शन की दुकान सजी है. स्टिंग भी सामने आ गया कि प्रदर्शन करने वाले दिहाड़ी पर वहां बैठे हैं. शिफ्ट में काम चल रहा है. कुछ लोग उनमें से गंभीर भी होंगे जिन्हें एक छोटी सी बात समझ नहीं आ रही है जिसे कोई स्कूली बच्चा भी समझ सकता है, कि मरहम पट्टी उसी की की जाती है जिसे चोट लगी हो. हास्यास्पद बातें चीख-चीखकर, मुट्ठियां भींचकर लाल चेहरों के साथ कही जा रही हैं कि ” सीएए में मुसलमानों को भी शामिल कर लो..” यानी पाकिस्तान के 20 करोड़ लोग और बंग्लादेश के 16 करोड़, कुल हुए 36 करोड़, इनमें से कोई भी या सभी भारत के नागरिक बन सकते हैं, ऐसा क़ानून बना दो. इससे भी कोई मतलब नहीं कि पाकिस्तान और बंग्लादेश में मुस्लिम कट्टरपंथी ही तो हैं जो वहां के अल्पसंख्यकों याने हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, ईसाई आदि को सता रहे हैं.
‘तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं, कमाल ये कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं’
दुष्यंत कुमार का ये शेर आज उन लोगों पर छजता है जो 500 रुपए दिन पर शाहीन बाग़ में प्रदर्शन की दुकान सजाए बैठे हैं. सीएए को लेकर उन्हें भरमाया जा रहा है और वो स्वार्थी सियासी और मज़हबी नेताओं की थाप पर कठपुतली बनकर नाच रहे हैं.