आंदोलन की असलियत उजागर
   दिनांक 03-फ़रवरी-2020
जिन्होंने मजहब के नाम पर मातृभूमि के टुकड़े करने की जिद पाली, भारत और पाकिस्तान में ऐसे लोगों के लिए अलग-अलग राय हैं। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना या जवाहरलाल नेहरू, सियासत की कमान थामने वाले चमकदार चेहरे सीमा के दोनों ओर दर्द और खून से सनी विरासत छोड़ गए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं

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नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) नेहरू-लियाकत समझौते का एक अरसे से छूटा काम ही गिना जाना चाहिए।
माहभर से ज्यादा की उथल-पुथल के बाद ही सही, किन्तु यह बात साफ होने लगी है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जारी आंदोलन मोटे तौर पर गलतफहमी के आधार पर चल रहा है। किन्तु अब तस्वीर साफ हो रही है कि यह आंदोलन उन हाथों से संचालित हो रहा है, जो भारत को खोखला करना चाहते हैं।
पहले लोगों को इन बातों पर संदेह भर था कि चीजें पर्दे के पीछे से और देश विरोधी मंशा से संचालित हो रही हैं किन्तु अब धुंध छंटने लगी है। पुष्ट खबरें हैं कि भारत में विरोध प्रदर्शनों की आग भड़काने के लिए पाकिस्तानी सेना का प्रचार तंत्र पूरी ताकत झोंके हुए है।
भारतीय जांच और सुरक्षा एजेंसियों को सहयोग करने वाली एक साइबर सुरक्षा फर्म की रिपोर्ट के अनुसार नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध को भड़काने का काम एक हजार से ज्यादा पाकिस्तानी ट्विटर हैंडल कर रहे थे और #IndaiDiscriminatesMuslims, #IndaiToEndia, #NaziIndiaRejected, #ModiTerrorismPolicy जैसे अनेक हैंडल पाकिस्तान साइबर आर्मी के इशारे पर ही तैयार किए गए थे।
एक बात और, दिल्ली में जो शाहीन बाग विरोध का अखाड़ा बना हुआ है, उन्मादी इस्लाम को फैलाव देने वाले पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) का दफ्तर वहीं है, यह बात ज्यादातर लोग नहीं जानते। पीएफआई को कुख्यात सिमी का ही बदला रूप माना जाता है। इसका देशभर में कार्यकर्ता और मीडिया नेटवर्क तो है ही, साथ ही सेकुलर राजनीति भी जगह-जगह इसकी कदमबोसी करती नजर आती है। नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध के लिए पीएफआई करोड़ों रुपए मुहैया करा रहा था, यह बात अब खुल चुकी है (देखें रिपोर्ट, पृष्ठ 12 पर)। इस प्रकरण में कांग्रेस-वामदलों की ओर स्पष्ट राजनीतिक झुकाव रखने वाले नामी वकीलों के नाम उभरना संदेह की उन कडि़यों को जोड़ता है, जिसके अनुसार विरोध को राजनीतिक संरक्षण और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के एवज में कोई बड़ी सौदेबाजी हुई थी। पीएफआई के तंत्र की जांच सिर्फ भारत में इसके कामकाज तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। देसी रसूखदारों के साथ इसके विदेशी संपकार्ें को खंगालना जरूरी है। इसलिए भी क्योंकि संविधान की साख में सुराख करने के लिए लोकतंत्र की दलीय राजनीति और इसी देश के विधिकतंत्र को औजार बनाने का खेल सिर्फ एक संस्था के बूते नहीं सोचा जा सकता।
हिंसक विरोध का प्रशासनिक जवाब मिलते ही उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बदल दिया जाना और बस फूंकते, पत्थर मारते उन्मादियों का पलक झपकते ही मुस्लिम महिलाओं, मासूम बच्चों की भीड़ के पीछे खो जाना इस बात का संकेत है कि यह केवल किसी कानूनी संशोधन का विरोध मात्र नहीं है, बल्कि भारत का, इसकी संवैधानिक प्रक्रियाओं का और इस लोकतंत्र के जनादेश को झुठलाने का बड़ा
षड्यंत्र है।
जांच एजेंसियों की तत्परता से हुए इस खुलासे से इतर संयोग से कुछ और घटनाएं भी हुईं जिन्होंने आंदोलन की आड़ में रचे जा रहे देश तोड़ने के मंसूबों की कलई खोल दी। मासूम बच्चों की मौत के मामले में दागी डॉक्टर कफील, सर्वोच्च न्यायालय को न मानने वाली मुस्लिम छात्रा, सेकुलरिज्म के लबादे में इस्लामी राज की तरकीब बताने वाली 'प्रोपेगैंडा वेबसाइट' की मुस्लिम पत्रकार और सबसे बढ़कर देश तोड़ने की रणनीति बताता शरजील इमाम! सीएए विरोध की देग से छिटके ये वे चावल हैं जिनसे पता चलता है कि देग में क्या पक रहा था।
कट्टरता का विचार मस्जिद के अहातों से लेकर विश्वविद्यालयों और मीडिया तक में जड़ें जमा रहा है तो देश के रूप में यह हमारे लिए जागने का समय है।
यदि मुस्लिम बहुल विश्वविद्यालयों में संविधान के विरोध को हवा मिली और जिस तरह भारत के टुकड़े करने का ख्वाब पालने वाले शरजील नेे मस्जिद में पनाह ली उससे लगता है कि जहां ज्ञान और प्रार्थना की धारा बहनी चाहिए थी वह स्थान कट्टरता की सड़ांध मारते पोखरों में तब्दील हो रहे हैं। यह संकेत निराधार नहीं है क्योंकि जिन्ना या अफजल के फोटो को दिल से लगाने वाले विश्वविद्यालयों की ही तरह मस्जिदों पर भी कमलेश तिवारी के हत्यारों, डॉ. बम कहलाने वाले जलीस अंसारी और अब शरजील को आड़ मुहैया कराने के दाग हैं।
यह वक्त उस मीडिया से भी सवाल पूछने का है जो सबसे सवाल पूछता है, किन्तु उसके मंच पर प्रगतिशीलता की आड़ में शरजील को लेखक/पत्रकार के तौर पर प्रतिष्ठा दी जाती है और पकड़े जाने पर उसे केवल 'छात्र' के तौर पर उल्लेखित किया जाता है।
मन में जहर भरे और आंखों में आंसू लिए छलिया किरदार नागरिकता संशोधन कानून के विरोध को संचालित कर रहे हैं। बौद्धिकता के तड़के से सफाई से बात घुमाई जा रही है। तिरंगे का नकाब लगाए यह वह हिंसक उन्माद है जिसके पीछे गहरी चालबाजी और विदेशी मदद छिपी है। गौर कीजिए फैज की नज्म में 'सब बुत उठवाए जाएंगे..' की तान पर उन्माद में झूमती वह भीड़ तिरंगा लहराते हुए बढ़ रही है जो 'वंदेमातरम्' को कुफ्र बताती रही है।
बहरहाल, नहीं भूलना चाहिए कि विविधतापूर्ण लोकतंत्र और इस्लामी राज में से किसी एक को चुनने का मौका आने पर फैज ने दूसरा विकल्प ही चुना था। किसी तानाशाह को दुत्कारने और इस्लामी राज कायम करने के लिए...तख्त उछाले जाएंगे...और 'बस नाम रहेगा अल्लाह का' जैसे फितूरी जुमले पाकिस्तान के लिए कारगर थे, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में ऐसे नारों और शरजील सरीखे देशघाती मंसूबे बांधने वालों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।
 
@hiteshshankar