डर के साए में बांग्लादेशी हिन्दू !
   दिनांक 04-फ़रवरी-2020
बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जिस तरह से अत्याचार जारी है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब यहां एक भी हिन्दू नहीं बचेगा। 1947 में, विभाजन के समय जो जनसंख्या 30 प्रतिशत से अधिक हुआ करती थी वह आज कुल जनसंख्या का लगभग 7 प्रतिशत ही बची है

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जिन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम की संवैधानिकता पर संदेह था, वे सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए। कुछ लोग, जो संदेह या बिना संदेह, संवैधानिक कारणों से या उसके बिना ही, नागरिकता संशोधन अधिनियम को खारिज करना चाहते हैं, वे अपने-अपने दोहरे तंबुओं में सर्वोच्च न्यायालय के बाहर दरी बिछाकर पहुंच गए।
सेकुलर, वामपंथी, हल्ला बोल, वेशभूषा से बुद्धिजीवी लगने वाले, लश्कर-ए-जेएनयू वाले आदि-इत्यादि शहरी तत्वों ने अपने हमले तेज कर दिए। जो सर्वोच्च न्यायालय में राममंदिर के विषय पर तारीख दर तारीख मांगते थे, वे इस विषय पर पहली ही तारीख पर कुलबुलाने लगे हैं।
सबसे जबरदस्त है- कथा गढ़ने की फैक्ट्री। इस फैक्ट्री का नया उत्पाद यह है कि न तो पाकिस्तान में, न बांग्लादेश में और न अफगानिस्तान में किसी हिंदू, सिक्ख, जैन या बौद्ध पर कोई अत्याचार हुआ, जो हुआ, वह तो इस्लामी देशों का रिवाज ही है, और फिर भी अगर कुछ हुआ, तो वह भारत में घटी किसी घटना पर प्रतिक्रियास्वरूप ही हुआ होगा। माने उसके लिए भी जिम्मेदार भारत ही है। पाकिस्तान इस पर सबसे ज्यादा बौखलाया हुआ है। और अब थोड़ी बहुत बौखलाहट बांग्लादेश ने दिखाई है। पाकिस्तान की बौखलाहट के अपने कारण हैं, और बांग्लादेश की बौखलाहट के कारण उससे बहुत भिन्न हैं। पहले पाकिस्तान की हालत पर नजर डालें। एक तो वह खुद को मुगल सल्तनत का वारिस समझता है, और दूसरे 'गजवा-ए-हिंद' से लेकर तमाम तरह के शगूफों का ऐसा शिकार हो चुका है कि उन पर सचमुच विश्वास करने लगा है। दूसरे, वह खुद को दुनिया भर में चले रहे आतंकवाद का नैतिक अभिरक्षक समझता है। तीसरे उसके सामने रोजाना 'ज्यादा से ज्यादा इस्लामिक' होकर पेश होने की राजनीतिक और आर्थिक मजबूरी रहती है और चौथे उस पर भारत विरोध का कोई मौका न चूकने का राजनीतिक और आर्थिक दबाव रहता है। अगर वह कोई मौका चूक जाएगा, तो चीन से लेकर पूरे 'कॉफी-क्लब' देशों के बीच तुरंत महत्वहीन हो जाएगा। फिर उसे डॉलर कौन देगा?
बांग्लादेश इस तरह के दबावों से फिलहाल ज्यादा पीडि़त नजर नहीं आता, हालांकि आंतरिक राजनीति का दबाव उसकी सरकार पर भी है और भारत में सबसे ज्यादा घुसपैठियों बांग्लादेश से होने के कारण उस पर एक नैतिक दबाव भी है।
बांग्लादेश ने पाकिस्तान की तरह उछलकूद भी नहीं की है, हालांकि भारत से मित्रता की बार-बार बातों के बीच में थोड़ी बहुत अप्रसन्नता जरूर जताई है। यही कारण था कि जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 पर टिप्पणी की, तो भारत में भी इसे अधिकांश लोगों ने बांग्लादेश की घरेलू स्थितियों को ध्यान में रखकर कहा गया और मुस्लिम उम्माह को संबोधित करके कहा गया बयान माना (शेख हसीना ने यह टिप्पणी गल्फ न्यूज से बातचीत में की थी, अब गल्फ न्यूज के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण क्यों था- यह आप अनुमान लगा सकते हैं)। भारत में मीडिया ने यह भी कहा कि शेख हसीना की टिप्पणी संतुलन बैठाने की दिशा में थी। उनके मीडिया सलाहकार इकबाल सोबन चौधरी ने तो यहां तक कहा कि सीएए में (बांग्लादेश को) पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ जोड़कर क्यों रखा गया है? चौधरी ने कहा कि हमें उन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ न जोड़ा जाए, जो कट्टरवाद और आतंकवाद के लिए जाने जाते हैं।

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बांग्लादेश के मुस्लिम उन्मादी आएदिन हिन्दुओं को निशाना बनाते हैं लेकिन कहीं से भी इसके विरोध में स्वर नहीं उठते (फाइल चित्र)
 बांग्लादेश की इन भंगिमाओं से भारत का जनमानस भी काफी हद तक प्रभावित रहा है। भारत में घुसपैठ की भारी समस्या होने के बावजूद बांग्लादेश के प्रति आम लोगों में कोई खास आक्रोश नजर नहीं आता है। तो क्या वास्तव में बांग्लादेश उतना ही सभ्य और सौम्य है, जितना शेख हसीना के मीडिया सलाहकार दर्शाना चाहते हैं, या जितना भारत के सेकुलर, वामपंथी आदि विश्वास कराना चाहते हैं? या भारत के लोग अपनी आंखें बंद रखने की आदत में ज्यादा ही लिप्त हो चुके हैं? सारी और सीधी बात आंकड़े कहते हैं। बांग्लादेश में हिन्दू जनसंख्या अब वहां की कुल जनसंख्या का लगभग 7 प्रतिशत है। 1947 में, विभाजन के समय यह संख्या 30 प्रतिशत से अधिक थी। फरवरी 1950 में हुए हिन्दुओं के भारी नरसंहार के बावजूद, जिसमें 5 लाख हिन्दू मार डाले गए थे और लगभग 45 लाख हत्या-बलात्कारों के बीच भागने के लिए मजबूर हुए थे, 1951 की जनगणना के अनुसार तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में 22 प्रतिशत हिन्दू बच गए थे। फरवरी 1950 में पूर्वी पाकिस्तान में हुआ हिन्दुओं का नरसंहार इतिहास के सबसे नृशंस नरसंहारों में गिना जाता है। ढाका, बारीसाल, चटगांव, नोआखली, सिलहट, राजशाही, मेमनसिंह, जेसौर जिलों में हिंदू जहां भी मिले, वहीं मार दिए गए। उनकी दुकानों और घरों में आग लगा दी गई और लूटपाट की गई। जो हिन्दू भाग कर भारत जाने की कोशिश में थे, उन पर रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर हमला किया गया। हिंदुओं के पूरे गांवों का सफाया कर दिया गया। अकेले ढाका से मात्र सात घंटे में 50,000 हिंदू खदेड़ दिए गए, जबकि उस समय ढाका में हिन्दुओं की कुल संख्या ही 80,000 थी। 1950 के नरसंहार की शुरुआत खुलना जिले के बागेरहाट क्षेत्र के कलशीरा गांव से मानी जाती है। कलशीरा गांव के अधिकांश ग्रामीण अनुसूचित जातियों के हिंदू थे। पुलिस ने गांव पर छापा मारा और महिलाओं के साथ बलात्कार का प्रयास किया। इस पर विवाद हुआ, जिसका नतीजा लाखों लोगों के नरसंहार में निकला। इस घटना का उल्लेख इसलिए आवश्यक है, क्योंकि यह कलशीरा की ही घटना थी, जिसे लेकर जोगेंद्र नाथ मंडल ने इस्तीफा दिया था, जो बड़े शौक से पाकिस्तान गए थे और वहां के केंद्रीय कानून और श्रम मंत्री बने थे। उनके त्यागपत्र का पैराग्राफ 15-17 इन घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। अक्तूबर, 1958 में लगे मार्शल लॉ के दौरान फिर हिन्दुओं का उत्पीड़न और उन्हें यातना देने का चक्र चला। अब पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू जनसंख्या में 3.5 फीसदी की गिरावट आई और 1961 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू जनसंख्या मात्र 18.5 प्रतिशत रह गई। 1971 में बांग्लादेश बना। पूर्वी पाकिस्तानी सेना के एक व्यवस्थित नरसंहार के दौरान 25 लाख हिंदुओं का कत्लेआम हुआ 1 करोड़ हिंदू शरणार्थियों के रूप में भारत में चले आए। स्वतंत्र बांग्लादेश में, 1974 में हिंदू जनसंख्या घटकर 13.5 प्रतिशत रह गई। 2011 की जनगणना के अनुसार बांग्लादेश में मात्र अंतिम 8.4 प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं। और अब बांग्लादेश का सरकारी रुख क्या है? वहां की सरकार ने तमाम सरकारी महकमों को, शोधकर्ताओं को, पत्रकारों को एक अलिखत फरमान जारी किया हुआ है कि उन्हें बांग्लादेश में हिंदू जनसंख्या का प्रतिशत 10 दिखाना है। यह प्रतिशत तय है। प्रतीक के तौर पर कुछ हिन्दुओं को बड़े पदों पर बैठाए रखना है और भारत से संबंध सामान्य बनाए रखने हैं। चाहे वास्तविकता कुछ भी क्यों न हो।
अजीब विडंबना है कि उधर लाखों लोग गायब होते गए और बांग्लादेश को सभ्य और सौम्य माना जाता रहा! ऐसा कैसे संभव है? इसके तीन कारण हैं। एक यह कि पाकिस्तान से भिन्न, बांग्लादेश में सरकार खुद नरसंहार नहीं करती सिर्फ होने देती है और हत्यारों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। बांग्लादेश की हिंदू आबादी समाप्त हो रही है। यह विचार का सवाल नहीं है, एक तथ्य है। न्यूयॉर्क की स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर साची दस्तिदार के बहुआयामी शोध के अनुसार बांग्लादेश के लगभग 5 करोड़ हिंदू लापता हैं (दस्तिदार, 2008)। माने अगर आप विश्व भर के सारे नरसंहारों और जातीय सफाए के सबसे वीभत्स मामलों को जैसे नाजी नरसंहार, रवांडा, बोस्निया, दारफुर भी एक साथ कर लें, तो भी वे बांग्लादेश में हिंदू जनसंख्या के सफाए के आगे तुच्छ हैं।

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 मजहबी उन्मादियों के दमन की शिकार एक आहत मां अपने बच्चे के साथ (फाइल चित्र)
बांग्लादेश की वर्तमान और अतीत की सरकारें यह बात जोर देकर कहती हैं कि हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले सरकारी एजेंट नहीं थे, लेकिन वह यह बात छिपा जाती हैं कि सरकारों ने उनकी हर हरकत की अनदेखी की। नाममात्र के लोगों पर मुकदमा चला और बहुत ही कम को सजा हुई। दूसरा कारण यह है कि बांग्लादेश अपनी उत्पत्ति के समय से ही भारत को अपनी मित्रता के छलावे में मुग्ध बनाए रहा है। भारत में उससे सहानुभूति रखने वालों का बड़ा वर्ग रहा है और भारत की सरकारों से लेकर मीडिया तक का ध्यान पश्चिमी मामलों पर ही ज्यादा रहा है। ऐसे में बांग्लादेश को अपने अपराध छिपाने का भरपूर अवसर मिलता रहा है। उसने इसे कभी पाकिस्तानी सेना के मत्थे मढ़ा, और कभी अंतरराष्ट्रीय कट्टरपंथी इस्लाम के उदय को जिम्मेदार ठहराया। तीसरा और बड़ा कारण है- नरसंहारों की यदा-कदा घटने वाली बड़ी घटनाओं के बीच बांग्लादेशी हिंदुओं का विनाश धीमी गति से लेकिन दशकों से और लगातार चल रहा है। ऐसे में किसी के लिए भी इसे ताड़ पाना और पहचान सकना मुश्किल हो जाता है।
सवाल है कि अगर बांग्लादेश भारत से मित्रता और हिन्दुओं के नरसंहारों से आपत्ति ही रखता है तो वहां के सभी राजनीतिक दलों के लिए हिंदुओं की छोड़ी हुई अधिकांश संपत्ति की जब्ती को वैध बनाने वाला अधिनियम इतना पवित्र क्यों है? वास्तव में यह कानून हिन्दुओं को मारकर-भगाकर उनकी संपत्ति लूटने के लिए एक प्रोत्साहक का काम कर रहा है।
पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश दुनिया का ऐसा देश है, जहां अल्पसंख्यकों को मारना-खदेड़ देना फायदे का सौदा होता है। इसे समझिए। बांग्लादेश का एक कानून है- 'वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट' (वीपीए)। इस कानून के तहत बांग्लादेश सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अल्पसंख्यकों की संपत्ति को मामूली से मामूली बहाने पर भी 'वेस्टेड प्रॉपर्टी' घोषित कर सकती है और फिर इसे मुसलमानों को वितरित कर सकती है। अंतिम बहाना यह आरोप होता है कि संपत्ति का मालिक अब बांग्लादेश में नहीं रहता (कानून के अनुसार वह हिन्दू अब 'स्थायी' निवासी नहीं रह गया है)। यह एक उद्योग बन चुका है जिसके तहत इन बेबस अल्पसंख्यकों को और विशेष रूप से हिंदुओं को, जिनका कोई बचाव न स्थानीय स्तर पर होता है, न राज्य स्तर पर और न राष्ट्रीय स्तर पर, हमला करके उनकी भूमि से खदेड़ दिया जाता है और अनिवासी घोषित कर दिया जाता है, फिर उनकी भूमि और मकान को जब्त करके हमला करने वालों में ही बांट दिया जाता है। 2001 में इस कानून को खत्म करने वाला विधेयक पारित हुआ। लेकिन उसे कभी लागू ही नहीं किया गया।
यह कानून जातीय सफाए में लगे अपराधियों को संरक्षण देने और उन्हें राजनीतिक- आर्थिक तौर पर पुरस्कृत करने का एक जबरदस्त स्रोत है। कौन कहता है कि बांग्लादेश की सरकार इस जातीय सफाए में शामिल नहीं है। इस विषय पर सबसे व्यापक अध्ययन और शोध करने वाले ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबुल बरकत का निष्कर्ष है कि वीपीए से सभी दलों को लाभ हुआ है। प्रोफेसर बरकत के अनुसार किसको लूट का कितना माल मिलेगा, यह इससे निर्धारित होता है कि किसकी राजनीतिक शक्ति कितनी है। इसमें कोई विचारधारा या सिद्धांत आड़े नहीं आता। जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सत्ता में थी, तो उसके गुंडों को वीपीए की 45 प्रतिशत लूट हासिल हुई। जब अवामी लीग सत्ता में आई, तो उसके गुंडों को 44 प्रतिशत माल प्राप्त हुआ। जमात-ए-इस्लामी का हिस्सा 'फिक्स्ड' है, जो पांच से आठ प्रतिशत के बीच रहता है, चाहे सरकार किसी की भी हो।
20 जून, 2016 को बांग्लादेश के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निवर्तमान अध्यक्ष प्रोफेसर मिजानुर रहमान ने कहा था,''बांग्लादेश में पांथिक अल्पसंख्यकों के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है, मैं नहीं मानता कि उस पर सरकार की प्रतिक्रिया पर्याप्त है। अगर यह (इसी तरह) चलता रहा, तो 15 वर्ष के भीतर बांग्लादेश में एक भी हिन्दू नहीं बचेगा।'' और जो कुछ चल रहा है, वह आज और कल की बात नहीं है, सिर्फ दो देशों के संबंधों की बात नहीं है। वह लाखों लोगों के अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न है।
यह बात फिर दोहराने में कोई समस्या नहीं है क्योंकि बात आज या कल की नहीं है। बात पूरे देश की है, उसके इतिहास और वर्तमान की है, इतिहास के प्रवाह की है। 20 अगस्त 1975 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने बीबीसी को एक साक्षात्कार दिया था। इस साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया था कि बांग्लादेश की इस्लामी सरकार के कारण हिंदू अल्पसंख्यक भी बांग्लादेश छोड़ सकते हैं, जो भारत के लिए आर्थिक और राजनीतिक समस्याएं पैदा करेंगे।
अब यह आप पर है कि आप अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे धरतीपुत्रों को अपना मानते हैं, या अपनी आर्थिक और राजनीतिक समस्या मानते हैं।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )