शाहीनी मीडिया को नहीं दिखती बदहाल दिल्ली
   दिनांक 04-फ़रवरी-2020
a_1  H x W: 0 xशाहीन बाग का 'सच' छुपाने वाला मीडिया केजरीवाल की बैसाखी बना
 
दिल्ली के शाहीन बाग में पिछले दिनों में पत्रकारों पर कई हमले हुए। वहां कुछ खास मीडिया समूह के पत्रकारों की आवभगत हो रही है, जबकि उन पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है जो प्रदर्शन करने वालों की बोली बोलने को तैयार नहीं हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब खुद को देश के संपादकों की संस्था बताने वाला एडिटर्स गिल्ड विरोध में एक बयान तक जारी नहीं करता। यह वही एडिटर्स गिल्ड है जिसने राजदीप सरदेसाई को लेकर मजाक में किए गए एक ट्वीट के खिलाफ बयान जारी किया था। एक ही संस्था के ये दोहरे बर्ताव बताते हैं कि एडिटर्स गिल्ड नाम की यह संस्था वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व कर रही है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस ने मीडिया और उससे जुड़ी तमाम संस्थाओं को अपने हिसाब से ढाल लिया था। अब जब जनता ने कांग्रेस को राजनीतिक सत्ता से बेदखल कर दिया, मीडिया का यह वर्ग आज भी उसके लिए अपनी वफादारी साबित करने में जुटा है।
 
नागरिकता कानून को लेकर देश भर में भ्रम और भय का जो खेल खेला गया है उसमें मीडिया बराबर का हिस्सेदार है। इन सारे प्रायोजित विरोध-प्रदर्शनों में टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी और इंडिया टुडे समूह सबसे बड़े 'मीडिया पार्टनर' बनकर उभरे हैं। यही कारण है कि असम को भारत से अलग करने का दम भरने वाले शरजील इमाम को हीरो बनाने के लिए यही संस्थान सबसे पहले आगे आए। खास तौर पर एनडीटीवी ने तो उसके बचाव में सारी हदें पार कर दीं। चैनल ने उसके बयान का एक वीडियो चलाया और दावा किया कि उसने देश तोड़ने वाली कोई बात नहीं की। यह स्थिति तब है जब उसके भाषण का पूरा वीडियो सामने आ चुका है जिसमें वह बिल्कुल वही कह रहा है जो हर किसी ने समझा है। लेकिन मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग भ्रम फैलाने से बाज नहीं आता। लगभग सभी ने बड़ी सफाई से उसके 'जेएनयू छात्र' होने पर जोर दिया, जबकि उसकी पहचान इससे कहीं बढ़कर है। हिंदुस्तान टाइम्स समेत कुछ अखबारों ने झूठ छापा कि उसे गिरफ्तार नहीं किया गया, बल्कि उसने आत्मसमर्पण किया।
कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल और कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पीएफआई के बीच रिश्तों की खबर आई। पूरे दस्तावेजों के साथ पता चला कि नागरिकता कानून के विरोध से लेकर हिंदुओं के कन्वर्जन जैसे मामलों में कांग्रेस का ये नेता सीधे तौर पर शामिल है। मीडिया के एक जाने-पहचाने वर्ग ने इस खबर पर चुप्पी साध ली, जिन्होंने भी इसे दिखाया उन्हें कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से धमकी दी। लेकिन पत्रकारीय स्वतंत्रता के लिए समय-समय पर कोहराम मचाने वाले कुछ चिर-परिचित चेहरे इस पर चुप्पी साध गए। झारखंड के लोहरदगा में नागरिकता कानून के समर्थन में रैली पर हमले में घायल युवक नीरज राम प्रजापति की मृत्यु हो गई। झारखंड सरकार ने परिवार वालों पर दबाव डालकर इसे घर में गिरने से मौत का मामला बनाने की कोशिश की, लेकिन किसी भी चैनल या अखबार ने इसे प्रमुखता नहीं दी। अगर विरोध में प्रदर्शन करने वाले किसी व्यक्ति की ऐसी स्थितियों में मौत हो जाती तो कल्पना की जा सकती है कि यही मीडिया इसे कितना बड़ा मुद्दा बना देता।
 
दिल्ली चुनाव में मीडिया की एकपक्षीय रिपोटिंर्ग जारी है। ज्यादातर स्थानीय अखबारों और चैनलों का झुकाव साफ देखा जा सकता है। भाजपा की रैली में अनुराग ठाकुर ने 'गद्दारों' के खिलाफ एक नारा लगवाया। इंडिया टुडे समूह को इस नारे पर इतनी मिर्ची लगी कि उसने कई बुलेटिन इसी को समर्पित कर दिए। लेकिन शाहीन बाग में जब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को जान से मारने के फतवे जारी किए जाते हैं तो इंडिया टुडे उसे 'सहज अभिव्यक्ति' की तरह दिखाता है। इसी तरह टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स भी भाजपा विरोध की खबरों से भरे दिखते हैं। दिल्ली का चुनाव प्रचार आखिरी चरण में है। लेकिन अभी तक शायद ही किसी चैनल ने शहर की सड़कों-गलियों की बदहाली और यहां की वास्तविक समस्याओं पर कोई कार्यक्रम दिखाया हो। इसके बजाय सारा जोर आम आदमी पार्टी सरकार के महिमामंडन पर है। इंडिया टुडे के विवादित संपादक राजदीप सरदेसाई ने कुछ दिन पहले ही फर्ज़र्ी खबर के एक मामले में अदालत में लिखित क्षमायाचना की थी, लेकिन लगता नहीं कि उनकी आदत में कोई सुधार हुआ है। लगभग हर दिन एक झूठ फैलाने का उनका औसत बना हुआ है।