राजद्रोह के मामले में गिरफ्तार शरजील को बताया जा रहा एक्टिविस्ट और स्कॉलर
   दिनांक 04-फ़रवरी-2020
असम को भारत से तोड़कर अलग करने की बात करने वाले शरजील इमाम पर चुप्पी मारी हुई है. कुछ न्यूज़ चैनल उसे ‘स्कॉलर’ और ‘एक्टिविस्ट’ बता रहे हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि कल उन्हें हाफ़िज़ सईद और लादेन भी एक्टिविस्ट नज़र आने लगें

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खबर को हवा देनी है या नहीं, किसी बात पर लोकसभा में हंगामा करना है या नहीं, यह नाम, राज्य, मज़हब देखकर तय किया जा रहा है. पूर्वांचल को भारत से तोड़कर अलग करने की बात करने वाले शरजील इमाम पर चुप्पी मारी हुई है. कुछ न्यूज़ चैनल उसे ‘स्कॉलर’ और ‘एक्टिविस्ट’ बता रहे हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि कल उन्हें हाफ़िज़ सईद और लादेन भी एक्टिविस्ट नज़र आने लगें. देश के अनेक भागों में सरस्वती पूजा के जुलूस पर हमले और पथराव की घटनाएं हुई हैं. क्या इस पर संसद में आक्रोश दिखा ? राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय भी शोर शराबा मचाने वाले सांसद इस पर मुंह सिये बैठे हैं. रोहित वेमुला का मामला सभी को याद है जब एक छात्र के आत्महत्या के मामले को बेवजह दलित उत्पीड़न का मामला बनाकर केंद्र सरकार पर कीचड़ उछाला गया था. जबकि अपने सुसाइड नोट में उसने साफ़ लिखा था कि उसकी मौत के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है. ऐसे बेबुनियाद मामले में एक छात्र की दुखद मौत का तमाशा बनाया गया, और देश दुनिया में भारत सरकार पर कीचड़ उछाला गया. समाज में अविश्वास के बीज बोने की कोशिश की गई. जबकि जनवरी माह में मध्यप्रदेश के सागर जिले में मुसलमानों द्वारा एक दलित युवक को ज़िंदा जलाकर मारने की घटना पर सन्नाटा छाया रहा, क्योंकि मध्यप्रदेश एक कांग्रेस शासित राज्य है और दलित युवक की ह्त्या करने वाले मुस्लिम हैं. कुछ समय पहले एक बेसर पैर का हंगामा खड़ा किया गया था कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है. प्रेस का मुंह बंद किया जा रहा है. अब शाहीनबाग़ का कवरेज करने जा रहे पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं. न्यूज़ नेशन के पत्रकार दीपक चौरसिया और न्यूज़ 18 के पत्रकार भूपेन्द्र चौबे पर हमला हुआ है. अब किसी को प्रेस की आजादी की चिंता नहीं हो रही है.
शाहीन बाग़ में ऐसे पोस्टर लगे दिखे जिनमें असम व दूसरे पूर्वांचल राज्यों को भारत से तोड़कर दिखाया गया है. इस पर हंगामा क्यों नहीं उठता ? शरजील के हवाले से पुलिस नित नए खुलासे कर रही है जिससे पता चलता है कि शाहीन बाग़ के पीछे एक बड़ी साजिश पल रही है. तिस पर वोट बैंक का गणित लगाने वाले माइक पर चीख रहे हैं कि वो शाहीन बाग़ के साथ हैं. इस पर मीडिया का एक बड़ा वर्ग आंखे फेरे हुए है. देश के तथाकथित सेकुलर, लिबरल और प्रगतिशील बुद्धिजीवी और इसी श्रेणी के पत्रकार देश को किस ओर ले जाना चाह रहे हैं ? एक ख़ास तरह का रवैया देश में फैलाने के कोशिश की जा रही है कि देश के खिलाफ की जाने वाली ऐसी बातों को लोग नज़रंदाज़ करना सीखें. भारत के इस वर्ग में व्याप्त विकृत सेकुलरिज्म की खासियत है कि उसे शरजील इमाम से सहानुभूति होती है, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उत्पात करने वालों से वो हमदर्दी जताते हैं, लेकिन तारेक फतह, आरिफ मुहम्मद खान जैसे भारत भक्त मुसलमानों से उन्हें चिढ़ होती है.
ठीक इसी प्रकार की मानसिकता सेकुलरिज्म के नाम पर दिखाई गई थी जब देश के बंटवारे की नींव रखी जा रही थी. पक्के आर्यसमाजी और महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को काकोरी केस में फांसी की सजा हुई . उनके साथ फांसी की सजा पाने वाले उनके अभिन्न सखा और क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खान को तत्कालीन कांग्रेस ने अपना आदर्श नहीं बनाया. अशफाक उल्ला खान कैसे विचार रखते थे, इसकी झलक रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा फांसी के पहले उनके बारे में लिखे गए पत्र से मिलती है.
बिस्मिल लिखते हैं “तुम सच्चे मित्र बन गए. सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज-मंदिर में मेरा निवास था. किंतु तुम इन बातों की किंचित मात्र चिंता नहीं करते थे. मेरे कुछ साथी तुम्हारे मुसलमान होने के कारण तुम्हें कुछ संदेह की दृष्टि से देखते थे, किंतु तुम अपने निश्चय पर दृढ़ थे. मेरे पास आर्य समाज-मंदिर में आते जाते थे. हिंदू-मुस्लिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मोहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लमखुल्ला गालियां देते थे, काफिर के नाम से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए; सदैव हिंदू-मुस्लिम ऐक्य के पक्षपाती रहे. तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे. तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को खुदा अक़्ल देता कि वह हिंदुओं के साथ मिलकर हिंदुस्तान की भलाई करते. जब मैं हिंदी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते जो मुसलमान भी पढ़ सकें ? तुमने स्वदेश-भक्ति के भावों को भली-भांति समझने के लिए ही हिंदी का अच्छा अध्ययन किया. अपने घर पर जब माताजी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे तो तुम्हारे मुंह से हिंदी शब्द निकलते थे, जिससे सब को बड़ा आश्चर्य होता था. तुम्हारी एक ही इच्छा थी कि मुसलमान युवक और तुम्हारे मित्र तथा संबंधी भी क्रांति की भावना से अनुप्राणित हों .”
लेकिन अशफाकउल्ला खान भुला दिए गए. यहां तक कि मुहम्मद अली जिन्ना भी जब तक मौलवियों की कट्टरता की खिलाफत करते रहे तब तक कांग्रेस ने उन्हें भाव नहीं दिया. जिन्ना अहंकारी व्यक्ति थे. बहुत बड़े वकील थे. पोर्क खाने वाले, अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेज. जिन्ना का अहम आहत हुआ. उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथ की राह पकड़ ली. जब जिन्ना अपने जिहादी रूप में सामने आए तो कांग्रेस ने भी अचानक जिन्ना की पूछताछ शुरू कर दी. दावत ए इस्लाम का नारा देकर लोगों को मुसलमान बनाने वालों को तो अनदेखा किया जाता रहा लेकिन शुद्धिकरण करवाने वाले आर्यसमाज को दुत्कारा जाता रहा. इसी मानसिकता ने देश के दो टुकड़े किए. यही मानसिकता आज संसद में होने वाले शोरशराबे में गूंज रही है. यही सोच शाहीनबाग के समर्थन से झलक रही है. कहीं-कहीं सीएए के विरोध करने वाले देश के खिलाफ जिहाद तक के नारे लगा रहे हैं, और सेकुलर राजनीति इस बारूद पर आग का खेल कर रही है.