1990 की वह जिहादी रात
   दिनांक 04-फ़रवरी-2020
अग्नि शेखर 
19 जनवरी, 1990 की वह ठंडी, बर्बर, हुआं हुआं करती हत्यारिन रात। जिहादी रात। लाखों कश्मीरी हिंदुओं के लिए कयामत की रात। 

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कश्मीर के आसमान से उतरी 19 जनवरी, 1990 की वह ठंडी, बर्बर, हुआं हुआं करती हत्यारिन रात। जिहादी रात। लाखों कश्मीरी हिंदुओं के लिए कयामत की रात। आशंकाओं, मृत्यु भय, जनसंहार की पूर्व सूचना देती सी रात। गांव-गांव, मुहल्ले-मुहल्ले, शहर-शहर की हजारों मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से सामूहिक नारे गुंजाती काली रात।
- हम क्या चाहते? आजादी!
- आजादी का मतलब क्या? ला इलाहा इलल्लाह!
- पाकिस्तान से रिश्ता क्या? ला इलाहा इलल्लाह!
- ऐ काफिरो! ऐ जाबिरो! कश्मीर हमारा छोड़ दो!
- असि छु बनावुन पाकिस्तान। बटव रोसतुय बटन्यव सान! (अर्थात् हमें बनाना है पाकिस्तान। बिना हिंदुओं के, पर उनकी बहु बेटियों को लेकर।)
- यहां क्या चलेगा? निजाम-ए-मुस्तफा (यानी इस्लामी राष्ट्र व्यवस्था)
- बटन हुंद ब्योल खोदायन गोल (खुदा कश्मीरी भटों, हिंदुओं का बीज नासे)
 
मुट्ठियों में जान बचाकर भागे, भगाए गए अपनी हजारों-लाखों बरसों की प्यारी मातृभूमि से लाखों कश्मीरी पंडित। गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक। मारकर। डराकर। बहु-बेटियों को अगवा कर। बलात्कार व सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाकर। घरों में चिट्ठियां भेजकर। मुहल्ले की मस्जिदों के बाहर हिट लिस्ट जारी कर। अफवाहें उड़ाकर। झूठी तोहमतें लगाकर। मुखबिर बताकर। कितनी स्त्रियां चढ़ीं जिहाद की भेंट। अलगाववाद की सूली पर। लंबी फेहरिस्त है। सामूहिक बलात्कार के बाद गिरिजा तिक्कू को जिंदा आरे से चीरना कितना भयानक सच है! दैनिक उर्दू अखबार 'अलसफा' में मोटे-मोटे अक्षरों में छपी कश्मीरी पंडितों के नाम 48 घंटों में कश्मीर छोड़ कर भाग जाने की धमकी।
 
हम किसी तरह पहुंचे उधमपुर, जम्मू। कुछ भागे, जो भाग सके, दिल्ली और दूर-दराज के अन्य शहरों में। तंबुओं की बस्तियां बनती गईं जम्मू में। सब तरफ शरणार्थी कैंप। मिश्रीवाला, मुट्ठी, पुरखू, झिड़ी, कठुआ, उधमपुर में अनेक जगहों पर, लद्दाखी सराय, ट्रांसपोर्ट नगर आदि क्षेत्रों में। जम्मूवासियों ने घर, मंदिर, धर्मशालाएं, स्कूल आदि खोले। तालाब तिल्लो के गोलगुजराल कैंप में एक अधूरी सरकारी इमारत में नए बने शौचालय में एक कश्मीरी पंडित परिवार को सर छिपाने की जगह मिली। बाद में तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन दौरे पर आए तो यह मंजर देखकर फफक कर रो पड़े। फिर चला इस 'जीनोसाइड' को झुठलाने का अभियान। 'कश्मीरी हिंदुओं को जगमोहन ने निकाला', 'जम्मू में घर-प्लॉट दिए'। 'जगमोहन ने मुसलमानों का जनसंहार करने की बात कही। इसलिए उन्हें कुछ देर घाटी छोड़कर जाना है।' 'कश्मीरी हिंदुओं को कश्मीर में कोई डर नहीं था।
 
वे झूठ फैलाते हैं। उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।' 'कश्मीरी हिंदुओं ने तमाम सरकारी नौकरियां छीन ली थीं मुसलमानों की।' चुप रहे अक्सर बोलने वाले, मानवाधिकारवादी दलाल। हमारे महान लेखक, कवि, पत्रकार, बुद्धिजीवी। जंतर-मंतर पर डफलियां बजाने वाले। जेएनयू वाले। हस्ताक्षरित अपीलें जारी करने वाले। पत्रिकाओं के विशेषांक निकालने वाले। हम थे कीडे़-मकोड़े इस लोकतंत्र में। हमारे नहीं थे मानवाधिकार। क्या थी हमारी बिसात? वोट बैंक तक नहीं। हमें अपना सच नहीं कहना था। झूठ लगने की हद तक वाला सच। उन्हें असुविधा होती थी हमारे सच से। आज भी होती है बराबर। उनके समीकरण गड़बड़ा जाते हैं। जैसे उनके पास रेडीमेड फार्मूले हैं आपको पंथनिरपेक्ष या सांप्रदायिक या प्रतिक्रियावादी या हिंदुत्ववादी, प्रतिगामी इत्यादि घोषित करने के। हम जब प्रश्न करते हैं तो वे पहले सकपका जाते हैं। फिर तमगा देते हैं- 'आप कुतर्क कर रहे हैं!' अब तो निर्वासित कश्मीरी हिंदुओं को ऐसे प्रश्न करने के लिए दक्षिणपंथी भी कहने लगे हैं। अगर ऐसा है तो क्या कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित जिहादी आतंकवाद व निजाम-ए-मुस्तफा यानी इस्लामी राष्ट्रवाद की अलगाववादी तहरीक वामपंथी कही जानी चाहिए? यह कायरता और साजिश नहीं तो क्या है?
 
19 जनवरी, 1990 से पहले तक हम उनके लिए सेकुलर थे। मानवतावादी थे। वे कश्मीर घूमने आते। हम उनके लिए नम्द बिछाते। दावतें खिलाते। गोष्ठियां करते। हम बड़े अच्छे लोग थे तब। और अब? अनपेक्षित व व्यर्थ लोग। हमारे लिए किसी ने मुंह नहीं खोला। जुलूस नहीं निकाला। कोई हंगामा नहीं किया संसद में। हमसे सच में हमारी नागरिकता छीन ली गई। हम अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रहने को बाध्य किए गए। - फेसबुक वॉल से