धर्म का मूल है सत्य को खोजना
   दिनांक 04-फ़रवरी-2020
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पुस्तक 'चातुर्वर्ण्य-भारत समीक्षा' के हिंदी अनुवाद का विमोचन करते (बाएं से)
श्री मोहनराव भागवत एवं महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि जी
 
 
''राष्ट्र और संस्कृति के प्रति हर नागरिक में प्रेम भाव होता है। हमारे पास विश्व कल्याण की धरोहर है, जिसने हमें अभी तक बनाए रखा है। सुख को लोग बाहर खोजते हैं, पर वह हमारे अंदर है। एक समय के बाद बाहरी सुख फीका पड़ जाता है, जबकि हमारे अंदर उपस्थित सुख कभी फीका नहीं होता। हर धर्म का मूल ही है, सत्य को अपने अंदर खोजना, यही सनातन धर्म की मर्यादा है।'' उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कही। वे गत दिनों पश्चिम मुंबई स्थित संन्यास आश्रम में पांच दिवसीय अमृत महोत्सव के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। अनुशासन को देशहित में बताते हुए उन्होंने कहा कि समूह में चलने के लिए अनुशासन आवश्यक है, उसके लिए संयम जरूरी है। हम प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। उसे भूलने के बाद लोगों ने प्रकृति का गलत तरीके से दोहन किया। साधु-संतों का जीवन हमें शिक्षा देता है कि अपने आचरण और शौर्य से धर्म की रक्षा करो। सनातन धर्म केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है, वह मनुष्य मात्र के लिए है। इसके समाप्त होने पर संसार समाप्त हो जाएगा। इस सनातन संस्कृति को सदा के लिए प्रवाहमान बनाने के लिए आद्य शंकराचार्य और अन्य कई संतों ने अपने जीवन को झोंक दिया। यही हमारा इतिहास है। उन्होंने कहा कि पूर्व में बनी गलत परंपरा का आदरपूर्वक बहिष्कार होना चाहिए। महापुरुष केवल सिखाते नहीं, बल्कि आचरण द्वारा दिखाते हैं। अगर व्यक्ति सत्य और करुणा रखता है तो उसके आचरण में भी लक्षित होना चाहिए। कार्यक्रम में 'चातुर्वर्ण्य-भारत समीक्षा' का लोकार्पण भी हुआ। 

रक्तदान से मिलता है जीवनदान
 
इस देश की युवाशक्ति को सही मार्गदर्शन मिलने पर अपने राष्ट्र, समाज और मानवता के हित में सब कुछ करने को तैयार रहती है। इस बात का उदाहरण दिल्ली स्थित महाराजा अग्रसेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी और मैनेजमेंट स्ट्डीज के छात्र हैं। जन-जन में आजादी की अलख जगाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर संस्थान द्वारा महारक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में छात्रों ने रक्तदान किया।
इस दौरान महाराजा अग्रसेन टेकनिकल एजुकेशन सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. नन्द किशोर गर्ग ने कहा कि अनजान लोगों के लिए रक्तदान करना एक प्रकार का बलिदान ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ी सेवा है। इससे ज्यादा सेवा और सेकुलर काम कोई हो ही नहीं सकता। सोसायटी के उपाध्यक्ष श्री जगदीश मित्तल ने कहा कि यह रक्तदान शिविर नहीं अपितु रक्तदान महाकुम्भ है। -प्रतिनिधि