पीएफआई की 'जकात' पर टिका शाहीन बाग

    दिनांक 04-फ़रवरी-2020   
Total Views |
दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए कानून के विरुद्ध महिलाओं के जमावड़े के पीछे असली सूत्रधारों का खुलासा हो रहा है। इस दिखावटी जमावड़े को केरल के मजहबी उग्रपंथी गुट पीएफआई द्वारा धन उपलब्ध कराया जा रहा है, वही पीएफआई जो भारत को इस्लामी राज्य बनाना चाहता है

pfi _1  H x W:
ईडी की रिपोर्ट से एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है। मजहबी उग्रपंथी गुट पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने सीएए के नाम पर दंगा भड़काने के लिए सिर्फ चंद दिनों के अंदर 120 करोड़ रु. खर्च कर दिए। पाञ्चजन्य ने एक वर्ष पूर्व ही अपने स्तम्भ में इस संगठन का कच्चा चिट्ठा खोला था। जिस रीहैब इंडिया फाउंडेशन का नाम इस हेराफेरी में आया है, उसका भी विस्तार से जिक्र था उस रिपोर्ट में।
बहरहाल, 120 करोड़ रु. दंगे में लगे कुल पैसे का एक छोटा हिस्सा हैं, जो बैंकिंग प्रणाली के जरिए इस्तेमाल किया गया है, असली राशि तो इससे करीब पांच गुना से ज्यादा है। पीएफआई एकमात्र संगठन है जिसकी हैसियत इतने कम समय में इतना धन और जन इकट्ठा करने की हो गई है। यही नहीं, पीएफआई का दुष्प्रचार तंत्र इतना तेज है कि उसने पूरी सरकारी मशीनरी को धता बताते हुए सीएए के नाम पर झूठ को देशभर के मुसलमानों में फैला दिया। और वह झूठ यह कि कानून मुसलमानों के खिलाफ है। ¬
पीएफआई का मीडिया प्रबंधन
सूत्रों के अनुसार पीएफआई का मीडिया प्रबंधन का अपना एक पेशेवर तंत्र है। इसमें इंटर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड प्रमुख है जो तेजस पब्लिशिंग चैरिटेबल ट्रस्ट के अधीन है। तेजस पीएफआई के मलयालम दैनिक का नाम है जिसका प्रकाशन जनवरी 2006 से शुरू हुआ था। तब से पीएफआई ने मलयालम, तमिल और कन्नड़ में चार समाचार प्रकाशन शुरू किए हैं। उसके पास इन्हीं भाषाओं में चार पुस्तक प्रकाशन उपक्रम भी हैं। इसमें एक वेबसाइट और एक समर्पित वेबटीम है। उसने अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में प्रकाशन के लिए 'एम्पावर इंडिया प्रेस' बनाया है। एक अन्य तंत्र है 'मीडिया रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट' जो ऑडियो विजुअल वृत्तचित्र बनाता है। जल्द ही तेजस सऊदी अरब में एक संस्करण शुरू करने वाला है। इस तरह, तेजस ने 400 से अधिक मीडिया पेशेवरों को नौकरी दी है।
नेशनल डेवलपमेंट फ्ऱंट(एनडीएफ) ने पीएफआई में अपने विलय के पूर्व कुछ समय तक 'जमात-ए-इस्लामी हिन्द' के साथ मिलकर काम किया था। एनडीएफ बड़ी ही चालाकी से खुद को सामाजिक गतिविधियों का संगठन प्रचारित करता रहा था। इसी दौरान जमात ने 'मध्यमम' नाम से एक साप्ताहिक भी शुरू किया, जिसमें लिखने वाले प्रख्यात हिन्दू और ईसाई लेखकों ने इसे स्वीकार्यता दिलाई। वह 'तेजस' अखबार से मानवाधिकार और पर्यावरण संगठनों को साथ जोड़कर अपनी छवि चमकाने में लगा हुआ था। एनडीएफ के विलय के बाद 'तेजस' पीएफआई का मुखपत्र बन गया है।
इस मामले ने केंद्र सरकार का भी ध्यान आकर्षित किया है। 25 नवंबर 2009 को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एक वर्गीकृत पत्र जारी किया गया था, जिसमें लिखा था-'तेजस एक इस्लामिक प्रकाशन नेटवर्क का हिस्सा है जो कुछ निश्चित संगठनों के सांप्रदायिक एजेंडे को पूरा करता है। यह प्रकाशन कश्मीर में मुस्लिमों की दशा और अमेरिका व इजराइल के साथ भारत के संबंधों जैसे मुद्दों पर सरकार विरोधी रुख अपनाता है। कभी-कभी यह सरकार के उग्रवाद विरोधी प्रयासों को 'राज्य-प्रायोजित आतंकवाद' बताता है, जिससे आतंकवादी तत्वों को समर्थन मिलता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें समकालीन विकास और मुद्दों को हमेशा सांप्रदायिक कोण के साथ पेश किया जाता है।' केरल सरकार ने मई 2010 के बाद से इस अखबार को विज्ञापन देना बंद कर दिया। कुछ दिनों के लिए यह फिर शुरू हुआ, लेकिन मार्च 2013 से फिर बंद हो गया।
पीएफआई के पास सोशल मीडिया की ऐसी पेशेवर टीम है जो किसी भी घटना को अंतरराष्ट्रीय स्तर दे सकती है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास ऐसी रिपोर्ट हैं कि इसने भीमा कोरेगांव, रोहित वेमुला, अखिला अशोकन उर्फ हदिया, मुजफ्फरनगर दंगों सहित कई मामलों में दुष्प्रचार के लिए इसी टीम का सहारा लिया था। हाल ही में दिल्ली केंद्रित 'टीपू सेना' नामक संस्था के कार्यकर्ताओं ने रांची, झारखंड में दंगा भड़काने और कट्टरपंथी साहित्य के प्रसार के लिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया था। कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में भी इसके इस्तेमाल की सूचनाएं मिलती रही हैं। हर राज्य के लिए पीएफआई के पास एक अलग फेसबुक पेज है, जिसमें कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली खबरें, तस्वीरें, वीडियो और पर्चे पोस्ट किए जाते हैं। पीएफआई अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए आम जनता के बीच पर्चे बांटता है। पीएफआई के पास कट्टरपंथी प्रसारकों की एक पूरी फौज है जो गली-मुहल्लों में तकरीरें देती है।
पीएफआई की अपनी एक वेबसाइट है, इस वेबसाइट का इस्तेमाल वह अलग प्रकार की सूचनाओं के लिए करता है। इस वेबसाइट पर रोहिंग्या मुस्लिमों के 'जातीय संहार', चीन में उइगर मुस्लिमों के 'उत्पीड़न', अफस्पा के निरस्तीकरण, निर्दोषों की रिहाई, दलितों पर 'जातीय अत्याचार' की निंदा, बाबरी ढांचा, एनआईए: संघ परिवार का एक संगठन, समान नागरिक संहिता का विचार त्यागना, 'असहिष्णुता', टीपू सुल्तान की 'अवमानना', 'नव-औपनिवेशिक खतरे' आदि की चर्चा है। इन मुद्दों का उल्लेख करने का एकमात्र उद्देश्य है संभावित अलगाववादी और आंदोलनकारी सहयोगियों को एकजुट करना।
वित्त एवं संसाधन
ईडी के अनुसार सीएए के विरोध में देशभर में हुए दंगों में लगे पैसों की आवक खाड़ी देशों से होती रही है। पीएफआई की फंडिंग के कई रास्ते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार केवल कानूनी तरीकों से केरल राज्य के लिए भेजे जाने वाले धन में 2005 से 2008 के बीच 135 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। 2003 में खाड़ी से 38 अरब डॉलर की रकम आई थी जो 2008 में ये बढ़कर 90 अरब डॉलर हो गई। कथित हवाला से हस्तांतरित धन आधिकारिक रूप से भेजे गए धन का 300 गुना है। उशर भूमि खरीद को लेकर केरल सरकार भी उतावली है। कई जिलों में लगभग 70 प्रतिशत भूमि का स्वामित्व मुसलमानों के पास है, जिसमें काफी हिस्सा मुस्लिम मजहबी संस्थानों और संगठनों के पास है। केरल के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. सिबी मैथ्यू कहते हैं, ''हमारे पास इन गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है, भारत को आश्चर्यजनक रूप से कब्जे में ले लिया जाएगा।'' खाड़ी में 25 लाख मलयाली प्रवासी हैं। इनमें आधे से ज्यादा मुसलमान हैं। गृह मंत्रालय की एक खुफिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि भारत और विदेशों में रह रहे धनी मुस्लिम व्यापारी कट्टरवादी गतिविधियों के लिए धन देते हैं। यह पैसा अक्सर हवाला मार्ग से आता है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लई ने केरल में कहा था, ''फंडिंग (मुस्लिम संगठनों के लिए) अधिक प्रतीत हो रही है। केरल को स्थानीय के बजाय बाहरी मजहबी कट्टरवाद की अधिक चिंता करनी चाहिए।'' वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ और मुस्लिम वर्ल्ड लीग के स्थानीय प्रतिनिधि इस धन को मस्जिदों और स्थानीय मुस्लिम सामुदायिक संगठनों के बीच बांट देेते हैं जिसका इस्तेमाल बेशक मजहबी कट्टरता बढ़ाने और सोच में बदलाव करने में किया जाता है। वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ गुट असल में सऊदी अरब के शाही परिवार के साथ मिलकर काम करता है। इसी प्रकार मुस्लिम वर्ल्ड लीग, अल-हरमीयन इस्लामिक फाउंडेशन और बेनेवोलेंस इंटरनेशनल फाउंडेशन जैसी संस्थाएं भी यही काम कर रही हैं। केरल को स्थानीय के बजाय बाहरी मजहबी कट्टरवाद की अधिक चिंता करनी चाहिए।'' वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ और मुस्लिम वर्ल्ड लीग के स्थानीय प्रतिनिधि इस धन को मस्जिदों और स्थानीय मुस्लिम सामुदायिक संगठनों के बीच बांट देेते हैं जिसका इस्तेमाल बेशक मजहबी कट्टरता बढ़ाने और सोच में बदलाव करने में किया जाता है। वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ गुट असल में सऊदी अरब के शाही परिवार के साथ मिलकर काम करता है। इसी प्रकार मुस्लिम वर्ल्ड लीग, अल-हरमीयन इस्लामिक फाउंडेशन और बेनेवोलेंस इंटरनेशनल फाउंडेशन जैसी संस्थाएं भी यही काम कर रही हैं।
पीएफआई जैसे संगठन मात्र भारत की ही चिंता का कारण नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में ऐसे संगठन कार्यरत हैं जो आपस में एक दूसरे से जुड़े हैं। भारत सरकार के साथ ही फिलिपींस सेना ने भी वर्ल्ड असेम्बली ऑफ मुस्लिम यूथ को इस्लामिक आतंकवाद की फंडिंग करने वाला बताया है। गौर करने वाली बात यह है कि ओसामा बिन लादेन का भाई अब्दुल्ला बिन लादेन पूर्व में इसी गुट का कोषाध्यक्ष था।
सितंबर 2002 में अमेरिकी और सऊदी अधिकारियों ने पाकिस्तान में वर्ल्ड मुस्लिम लीग के एक बड़े अधिकारी वईल हमजा अल-जलाइदन की सम्पत्ति जब्त की थी, जो लादेन और शेख अब्दुल्ला अज्जाम के लिए काम कर रहा था। लीग के साथ ही रबिता ट्रस्ट के कई सदस्यों की संपत्ति जब्त की गई, जिसके बाद पाकिस्तान स्थित रबिता ट्रस्ट ने अपना नाम बदल कर 'एड ऑर्गनाइजेशन ऑफ द उलामा' कर लिया। वह1999 से ही तालिबान के लिए फंड की व्यवस्था करने का काम करने लगा था। जलाइदन रबिता ट्रस्ट का महानिदेशक भी रह चुका था।
इन संगठनों की फंडिंग गतिविधियों में भारत से बांग्लादेश को होने वाली गो-तस्करी भी शामिल है। इसका रास्ता उ.प्र., बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से होकर गुजरता है। झारखंड के सीमावर्ती जिले इस अवैध व्यापार का केंद्र बन गए हैं।
2006 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने केंद्र सरकार को गो तस्करी और आतंकवाद के बीच नाते के बारे में सचेत किया था। असल में हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी आतंकवादी अजीजुर्रहमान सरदार, जो 2005 में श्रमजीवी एक्सप्रेस बम धमाके और 2006 में बनारस संकटमोचन मंदिर बम धमाके में शामिल था, ने गो तस्करी से आतंकवादी गतिविधियों की फंडिंग की बात स्वीकार की थी। सूत्रों के अनुसार जमात-उद-मुजाहिद्दीन—बांग्लादेश का आतंकवादी दिलावर हुसैन, जो 2013 में बोधगया बम धमाके में शामिल था, ने भी यही खुलासा किया था। 28 फरवरी, 2008 को भारत के गृह मंत्रालय को पशु कल्याण प्रभाग ने एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि गो तस्करी के पैसे का आतंकवाद और 'स्लीपर एजेंटों' को फंड करने के लिए उपयोग किया जा रहा है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर बांग्लादेश को हो रही गो तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए। एक अनुमानित आंकडे़ के हिसाब से बांग्लादेश में अवैध गो तस्करी का 50,000 करोड़ रु. का कारोबार होता है।
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने कोलंबो में अपने उच्चायोग के माध्यम से दक्षिण में एक बड़ा मॉड्यूल स्थापित करने का प्रयास किया था। यह योजना कौंसुलर ऑफिसर अमीर जुबैर सिद्दीकी ने बनाई थी। आईएसआई ने दक्षिण भारत को संभावित केंद्र मानते हुए उसे चलाने के लिए खास तस्करी मार्ग बनाया था। यह मार्ग श्रीलंका के जरिए तमिलनाडु और केरल को जोड़ता है। तस्करी और हथियारों की तस्करी के लिए काफी लंबे समय से इस मार्ग का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि यह योजना एक श्रीलंकाई मुस्लिम जाहिद हुसैन की गिरफ्तारी के बाद ध्वस्त हो गई, पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस्लामिक बैंकिंग
यह इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा दुनियाभर में चलाई जा रही एक बड़ी साजि़श जा हिस्सा है। पीएफआई की मुख्य मांगों में से एक है भारत में शरिया या इस्लामिक बैंकिंग की स्थापना। पीएफआई द्वारा जुटाए गए इस्लामवादियों का एक दल इस्लामी बैंकिंग पर अपना पक्ष रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों से मिला था। पीएफआई के अनुसार, शरिया कानूनों के तहत बैंकिंग आर्थिक असमानता और भेदभाव को समाप्त करने का उत्तर है। लेकिन रिजर्व बैंक के अनुसार वर्तमान बैंकिंग कानूनों और विनियमों के तहत, इस्लामी बैंकिंग को कानूनी तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। वर्ल्ड असेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ और मुस्लिम वर्ल्ड लीग या राबिता ट्रस्ट, सभी सक्रिय रूप से भारत में इस्लाम और शरिया बैंकिंग को लागू करवाने में व्यस्त हैं। राबिता से मिलने वाले दान के लाभार्थियों में पीएफआई भी शामिल है। पीएफआई वास्तव में तो कई संगठनों का समूह है। यह अपने आप को उन सभी मुद्दों के साथ जोड़ता रहता है जो समय-समय पर अखबारों की सुर्खियां बनते हैं और जिनमें जातिगत विद्वेष या मजहबी उन्माद बढ़ाने की संभावना दिखती है।
भारत को एक पूर्ण इस्लामिक राज्य में तब्दील करने का सपना कोई नया नहीं है। सभी मुगल शासकों/आक्रांताओं ने यह स्वप्न देखा था। पीएफआई का भी हर कदम इसी स्वप्न को पूरा करने के लिए उठता है।
(लेखक पीएफआई पर शोध कर रहे हैं)