लाशों की गिनती में भी बेइमानी करता सेकुलर मीडिया
   दिनांक 01-मार्च-2020
दिल्ली कई दिन तक सुलगती रही, और कुछ पत्रकार फसाद की आंच में अपने सियासी एजेंडे की रोटियां सेकते रहे. विदेशी मीडिया ने दिल्ली के दंगों की बेहद एकतरफा और शरारतपूर्ण रिपोर्टिंग की, लेकिन विदेशियों को कोसने से क्या फायदा, जब देश के अंदर बैठे कलमकार ही दुनिया के उन अखबारों में सफ़ेद झूठ परोस रहे थे. विदेशी मीडिया में प्रकाशित इन भारत विरोधी लेखों को भारतीय पत्रकारों ने ही लिखा है.

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दंगों में सरेराह फायरिंग करता शाहरुख परिवार समेत फरार है, इसे हिंदू युवक बताकर झूठी खबरें चलाई गईं .
 
इन लेखों में दंगों में मारे गए मुसलमानों के नाम लिखे गए लेकिन क़त्ल किए गए हिंदुओं का जिक्र तक नहीं किया. भाजपा नेता कपिल मिश्रा के सड़क खाली करवाने संबंधी बयान को प्रमुखता से लिखा गया, और उसे दंगों की वजह बताया गया, लेकिन आप पार्षद ताहिर हुसैन की हिंसक भूमिका, शरजील इमाम के देश के टुकड़े करने और इस्लामी हुकूमत कायम करने के अरमान , राहुल सोनिया-प्रियंका के “आर-पार की लड़ाई” वाले भड़काऊ बयान, वारिस पठान की “15 करोड़” वाली धमकी, आमआदमी पार्टी के अमानतुल्लाह के जहरीले बोल और दो महीने से शाहीन बाग़ वालों द्वारा बंद की गई सडक के बारे में कोई बात नहीं की गई. दंगा शाहीन बाग़ समर्थकों द्वारा पथराव-आगजनी करने से भड़का इस बात को भी दबा दिया गया. मारे गए आईबी अधिकारी या जान गंवाने वाले पुलिस के सिपाही का भी जिक्र नहीं किया बल्कि उलटे पुलिस पर मुसलमानों पर ज्यादती करने का आरोप मढ़ दिया.
मुस्लिमों के घरों में घुसकर तोड़फोड़ की गई ये तो लिखा है लेकिन बात भी नहीं छेड़ी कि अनेक हिंदुओं को उनके घरों में घुसकर मार दिया गया, बाजार में हिंदुओं की दुकानें, शोरूम, होटल और पेट्रोलपंप चुन-चुनकर जलाए गए, लोगों को उनका नाम पूछ-पूछकर हिंसा का शिकार बनाया गया, ये सब बातें सिरे से गायब कर दी गई हैं. शाहीनबाग़ में, और देश में स्थान-स्थान पर सीएए विरोधियों ने पत्रकारों पर जानलेवा हमले किए, लेकिन इन हमलों को भी हिंदुओं और “भाजपा समर्थकों” पर थोप दिया.
वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी या अन्य कोई भी विदेशी अखबार उठा लीजिए और दिल्ली दंगे के बारे में प्रकाशित रपट या लेखों पर नज़र दौड़ाइये तो सार निकलेगा कि प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, दिल्ली पुलिस, सुरक्षा बल, भाजपा समर्थक और देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज मिलकर मुसलमानों को सता रहे हैं, मार रहे हैं. इन पत्रकारों ने पहले विदेशी मीडिया में सीएए को लेकर उकसावे वाला झूठ फैलाया था . बीबीसी ने 11 दिसंबर 2019 को जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली के इतिहास के अध्यापक मुकुल केशवन के हवाले से लिखा कि “ शरणार्थियों के नाम पर बनाया गया सीएए वास्तव में मुस्लिमों की नागरिकता को अवैध घोषित करने के लिए लाया गया है.” ऐसे सफ़ेद झूठ बोले गए. जिस क़ानून का भारत के नागरिकों से कोई लेना-देना ही नहीं उसे सारी दुनिया के सामने मुस्लिमों की नागरिकता ख़त्म करने वाला क़ानून प्रचारित किया गया. देश के अंदर सक्रिय सियासी, कट्टरपंथी और वामपंथी सिपहसालार फरेब फैलाते रहे. अगर मुकुल केशवन ने सचमुच ये कहा है तो बुद्धि और समझ पर प्रश्न चिन्ह लगता है. इस तरह की बातें देश के अंदर-बाहर फैलाई गईं. भारत को तोड़ने की बात करने वालों को “एक्टिविस्ट” और “स्कॉलर” बताया जाता रहा और जब हालात बिगड़ गए तो दिल्ली के इस सुनियोजित दंगे को ‘हिंदू दंगा’ बताकर सारी दुनिया में भारत को बदनाम किया गया . पत्रकारिता पेशे की ईमानदारी और जिम्मेदारी को ताक पर रख दिया गया. ये लोग किसके लिए काम कर रहे हैं, इनका क्या मकसद है, ये सोचने पर पर विवश होना पड़ता है.
झूठ के पुलिंदे
द डिप्लोमेट में सोमा बासु ने लिखा- “ 200 नागरिक घायल हुए हैं. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने दो मस्जिदों को आग के हवाले कर दिया. कई पत्रकारों को पीटा गया और उनके मोबाइल और कैमरे छीन लिए गए. कुछ पत्रकारों से ये साबित करने को कहा गया कि वो हिंदू हैं, और इसी शर्त पर छोड़ा गया कि वो दंगाइयों के खिलाफ कुछ नहीं लिखेंगे... देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए हैं लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के समर्थक अभी भी इकट्ठे हो रहे हैं और भडकाऊ नारे लगा रहे हैं..... भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने सीएए विरोधियों को तीन दिन में प्रदर्शन ख़त्म करने की चेतावनी दी थी ( जबकि कपिल मिश्रा ने सड़क खाली करने के लिए कहा था, और सुप्रीमकोर्ट ने भी शाहीनबाग़ वालों से सड़क खाली करने की अपील की थी ) अनेक भाजपा नेताओं ने सीएए प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उत्तेजक भाषण दिए, उन्हें गद्दार और आतंकवादी कहा (ये भी झूठ है,.. गद्दार और आतंकी शरजील इमाम जैसे लोगों को कहा गया, और सारे देश ने कहा) ज्यादातर सीएए विरोधी मुस्लिम हैं.. चुनाव के दौरान भाजपा की मुख्य रणनीति मुस्लिमों और हिंदुओं को एक दूसरे के खिलाफ उकसाने की थी........ पत्थरबाजी शुरू होने से बहुत पहले ही मुसलमानों को अपमानित करना शुरू कर दिया गया था. कोई नहीं जानता कि पहला पत्थर किसने फेंका, लेकिन दोनों पक्ष एक दूसरे पर पत्थर फेंके लगे.. तीन रातों तक भाजपा समर्थक माथे पर भगवा पट्टी बांधे, और भगवा झंडे लिए उत्पात करते रहे.. दो मस्जिदों पर हमला किया गया , यहां तक कि छोटे बच्चों को भी लोहे की सलाखों से पीटा गया...श्रेया चटर्जी ने ट्वीट किया ‘हां , मैंने देखा, सीएए समर्थकों ने घर जलाए, दुकानें तोडीं, और सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर पहले पत्थर चलाए...” गौर करने वाली दो बातें हैं, एक सोमा बासु ने सारा दोष हिंदुओं पर डालकर मुसलमानों को पीड़ित चित्रित किया है. दूसरा, दंगाइयों को जानबूझकर, बार-बार ‘भाजपा समर्थक’ बताया है.

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वाशिंगटन पोस्ट में निहा मसीह, तानिया दत्ता और जोआन्ना स्लेटर ने लिखा “दोबारा चुनाव जीतने के बाद मोदी ने देश पर हिंदू प्रभुता कायम करने के अपनी पार्टी के एजेंडे पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया. नागरिकता संशोधन क़ानून इसमें सबसे विवादास्पद कदम है. दंगा तब भड़का जब मोदी की भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता कपिल मिश्रा ने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को, जिनमे अधिकांश महिलाएं हैं, धरना ख़त्म करने की धमकी दी. ... कर्दमपुरी में रहने वाए आदिल खान ने बताया कि मुसलमान खुद को बचाने के लिए सड़कों पर इकट्ठा हुए. उन्हें पता चला था कि उन पर हमला करने के लिए भीड़ जमा हो रही है. अगली सुबह (हमलावर) भीड़ पास आ गई... पुलिस ने हिंसक भीड़ को रोकने की कोशिश की. कुछ पुलिसवाले हमला करने वाली भीड़ में शामिल हो गए. एक रायटर संवाददाता ने देखा कि पुलिस सीएए समर्थकों को सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर पत्थर फेंकने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी. 40 वर्षीय मोहम्मद साजिद ने बताया कि मुस्लिम मोहल्ले में पुलिस आकर (बेवजह) आंसू गैस के गोले दागने लगी और जब लोगों ने गुस्से में आकर पत्थर चलाने शुरू किए तो पुलिस गोली चलाने लगी, जिससे उसके भाई की पीठ में गोली लग गई...”
बीबीसी ने दंगों के रिपोर्ट करते हुए लिखा “.. कई मुसलमानों पर हमला किया गया है. दंगाई , जिनमे ज्यादातर हिंदू हैं, निहत्थे लोगों को मार रहे हैं.”
बरखा दत्त ने 26 फरवरी को वाशिंगटन पोस्ट में “भारत की नफ़रत की राजनीति” के बारे में लेख लिखा. शीर्षक था – ‘इंडियाज़ पॉलिटिक्स ऑफ़ हेट एरप्टेड फॉर आल दि वर्ल्ड टू विटनेस’. बरखा ने मोदी और ट्रम्प के भोज के मांसाहारी व्यंजनों जैसे मटन बिरयानी, लेग ऑफ़ लैम्ब आदि (मोदी शाकाहारी हैं) को शाहिद खान की हत्या से जोड़कर अपने लेख की शुरुआत की, और इशारा किया कि ट्रम्प की यात्रा इसलिए हुई क्योंकि ट्रम्प को अमेरिका निवासी भारतीय मूल के लोगों के वोट चाहिए, और मोदी भी दिल्ली की (भाजपा की) हार संबंधी अखबारों की सुर्ख़ियों को बदलना चाहते थे, मानो दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद मोदी ने आनन्-फानन में ट्रम्प को भारत बुला लिया, अहमदाबाद में दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का काम पूरा करवाकर सवा लाख लोगों का कार्यक्रम करवा डाला हो और इसीलिए 3 बिलियन डॉलर का रक्षा सौदा भी कर लिया.
लेख में आगे बरखा लिखती हैं कि “यद्यपि अधिकारियों का कहना है कि दंगा सीएए के समर्थकों और विरोधियों के बीच टकराव का परिणाम है.. लेकिन दिन के अंत में ये एकदम साफ़ है कि मुसलमानों को जानबूझकर , सुनियोजित ढंग से आतंकित किया जा रहा है. दंगाई मुसलमानों के घरों में घुसकर उन्हें बाहर खींच रहे हैं.” बरखा को इस बात का भी अफ़सोस है कि ट्रम्प दंगे पर चुप रहे और भारत के आंतरिक मामले में कुछ भी बोलने से मना कर दिया. अपने लेख में बरखा “दंगा पीड़ित” मुसलमानों के नाम ले-लेकर लिखती हैं, लेकिन हिंदू मौतों और अंकित शर्मा, रतन लाल पर चुप रहती हैं. बरखा शाहिद, फुरकान आदि नाम एक के बाद एक लिखती हैं, लेकिन एक भी हिंदू मृतक का नाम लेख में नहीं आता. बरखा कपिल मिश्रा को दंगे का ज़िम्मेदार ठहराती हैं लेकिन ताहिर हुसैन, वारिस पठान और शरजील का जिक्र भी नहीं करतीं.
इस तरह के कपटपूर्ण लेखों से बरखा और सोमा बासु जैसे लोगों ने दुनिया भर में हिंदुओं पर कीचड उछाला जिनके साथ यूरोप और अमेरिका के समाजवादी-वामपंथी और पाकिस्तान परस्त पत्रकार भी अलापने लगे. रॉजर वाटर्स, जॉन ऑलिवर, बर्नी सैंडर्स वगैरह अपना अधकचरा ज्ञान बांचने लगे. विडंबना ये कि बर्नी सैंडर्स को दुनियाभर के जघन्य हत्यारे कम्युनिस्ट तानाशाहों की प्रशंसा करते लाखों ने देखा- सुना है.