मां - बेटे के बीच की खींचतान और लगातार होते अपमान के चलते सिंधिया ने छोड़ी कांग्रेस !
   दिनांक 11-मार्च-2020
कहा जा रहा है कि जब राहुल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तो वह ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही मुख्यमंत्री बनवाना चाहते थे. मगर अपनी मां की मर्जी के आगे वह असहाय हो गए

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बात थोड़ा कड़वी है मगर उतनी ही सच्ची भी है. जिस मां ने अपने बेटे को राजनीति में सफल होते देखने के लिए काफी जतन किए मगर बेटा था कि चुनाव हारता ही जा रहा था. करीब डेढ़ वर्ष पहले दो प्रदेशों में ‘बेटा’ किसी तरह कांग्रेस की सरकार बनवाने में कामयाब हुआ तब मां ने ऐन वक्त पर बड़ा फेरबदल कर दिया. यही वजह थी कि मां और बेटे के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई. ये मां – बेटा कोई और नहीं सोनिया गांधी और राहुल गांधी हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया को गद्दार कहने वाले अधीर रंजन चौधरी भी उस सचाई को जानते तो हैं मगर उस सचाई को बयान करने का उनमे साहस नहीं हैं. मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने हर जगह पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को कुछ इस तरह से पेश किया था कि सिंधिया ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे. चुनाव परिणाम आए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश की तो सोनिया गांधी ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनवाया. उस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, सिंधिया को ही मुख्यमंत्री बनवाना चाहते थे. मगर अपनी मां की मर्जी के आगे वह असहाय हो गए. मध्य प्रदेश की जनता के सामने झूठे साबित हो गए. यहीं से कांग्रेस के भीतर राहुल और सोनिया के समर्थक दो अलग- अलग राह पर चल पड़े.
जिसके परिणामस्वरूप मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार अब अपने दिन गिन रही है. अगर सब कुछ ऐसे ही रहा तो राजस्थान में भी जल्द ही कमल खिलेगा. कांग्रेस छोड़ने से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सोनिया गांधी से मिलने का समय मांगा था मगर सोनिया गांधी की तरफ से उन्हें मुलाक़ात के लिए समय नहीं दिया गया. जाहिर सी बात है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, मध्य प्रदेश में चल रही कमलनाथ की कारगुजारियों को सोनिया गांधी के संज्ञान में लाना चाहते थे. बहुत संभव है कि सोनिया गांधी को भी यह आभास हो गया हो कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जब उनसे मिलेंगे तो कमलनाथ की आलोचना ही करेंगे. बावजूद इसके, सोनिया गांधी ने ज्योतिरादित्य से मुलाक़ात करने की जहमत उठाई होती तो कांग्रेस की सरकार कुछ दिन के लिए बच सकती थी. मगर सोनिया गांधी ने अपने अहंकार के चलते ज्योतिरादित्य से मिलना भी उचित नहीं समझा. कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष रहते हुए सोनिया गांधी चाहती थीं कि पार्टी की कमान राहुल गांधी ही संभाले. पहले उन्होंने राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनवाया. फिर उसके बाद वर्ष 2017 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाया. अध्यक्ष पद संभालते- संभालते राहुल गांधी के खाते में कई हार दर्ज हो चुकी थी.
उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय अरूण जेटली ने कहा था कि " पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा राजनितिक दल का अध्यक्ष होगा जिसके खाते में इतनी हार दर्ज होगी." कुछ समय बीता. राजस्थान और मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव नजदीक आ गया. राहुल गांधी ने राजस्थान में सचिन पायलट और मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को कुछ इस तरह से पेश किया कि सरकार बनने पर इन्हीं दोनों नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. चुनाव परिणाम आए. कड़ी टक्कर के बाद कांग्रेस पार्टी, सरकार बनाने में कामयाब हो गई. जब सत्ता संभालने की बारी आई तब सोनिया गांधी ने परदे के पीछे से अपने विश्वास पात्र एवं बुजुर्ग नेताओं को मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवाई. राजस्थान में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बनें और सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री के पद पर ही संतोष करना पड़ा. इधर मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार में कोई भी पद ग्रहण नहीं किया.
मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुख्यमंत्री न बन पाने की दशा में यह कहा जाने लगा था कि सोनिया गांधी ने बुजुर्ग नेताओं को तरजीह दी और युवा नेताओं को दरकिनार कर दिया. इस पूरे घटनाक्रम में एक बात शीशे की तरह साफ़ हो गई थी कि राहुल गांधी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में युवा चेहरों को आगे करके चुनाव लड़ाया था. ऐसे में राहुल गांधी की पार्टी में चलती तो उन दोनों नेताओं को ही मुख्यमंत्री बनाया जाता. इसका मतलब साफ़ था कि राहुल गांधी, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो बन गए थे मगर पार्टी पर कब्जा सोनिया गांधी का ही था. मध्य प्रदेश में कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना दिये जाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को राजनीति में महत्वहीन किया जा रहा था.
कमलनाथ को यह बखूबी मालूम था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री पद के दावेदार रह चुके हैं. इसलिए वह धीरे – धीरे ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश की राजनीति से उखाड़ने में लगे हुए थे. यह और बात है कि सिंधिया को उखाड़ने के चक्कर में वह स्वयं उखड़ गए. इसी के बाद, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच खट - पट होने की जब खबरें आने लगी. तब कांग्रेसियों ने इन खबरों को झूठलाने का हर संभव प्रयास किया. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने पर अड़ गए और उन्होंने यह कहते हुए पद छोड़ा कि ‘अध्यक्ष’ गांधी परिवार से बाहर के किसी नेता को बनाया जाय.
150 साल से ज्य़ादा पुरानी पार्टी को पांच जोन में बांट कर बैठकें की गईं मगर एक भी ऐसा नेता उभर कर सामने नहीं आया जो अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल सकता. इसके लिए बैठक हुई. राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों लोग बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि अध्यक्ष, गांधी परिवार के बाहर से चुना जाना था मगर घूम-फिर कर सोनिया गांधी को ही अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया और सोनिया गांधी ने उसे स्वीकार कर लिया.
बैठक में तीन प्रस्ताव पास हुए थे. पहले प्रस्ताव में राहुल की प्रशंसा की गई. दूसरा प्रस्ताव पास किया गया कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर बने रहें मगर राहुल गांधी ने इससे इंकार कर दिया. तीसरे प्रस्ताव में सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना गया. इस पर सोनिया गांधी तैयार हो गईं. अब यहां पर सवाल यह उठता है कि जब राहुल पद छोड़ने पर अड़े रहे और उन्होंने प्रस्ताव पास होने के बाद भी पद स्वीकार नहीं किया. ऐसे में सोनिया गांधी ने पारित किए गए तीसरे प्रस्ताव को क्यों नहीं ठुकराया ?
कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद रणदीप सुरजेवाला ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि " कृपया हमसे, हमारा अध्यक्ष चुनने का अधिकार ना छीने. इस मुश्किल घड़ी में कांग्रेस को उबारने के लिए गांधी परिवार से ही किसी को यह जिम्मेदारी संभालनी होगी. सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से अंतरिम अध्यक्ष चुना गया है."
पांच जोन की बैठक एक औपचारिकता ही रही. छिटपुट आवाज मुकुल वासनिक और ज्योतिरादित्य सिन्धिया के पक्ष में उठीं थी मगर फिर नेपथ्य में लौट गईं. दिलचस्प है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. हार के तीन साल बाद सोनिया गांधी ने वर्ष 2017 में अध्यक्ष का पद छोड़ा. परिवारवाद की परम्परा के तहत यह पद उनके बेटे राहुल गांधी को प्राप्त हुआ. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद राहुल तिलमिला गए. राहुल राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीत कर भी अपनी मर्जी से पार्टी के भीतर कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.
राहुल इस पद की जिम्मेदारी छोड़ कर पलायन कर गए. उन्हें कांग्रेसियों ने कई बार मनाया मगर वह नहीं माने. करीब चार महीने तक ड्रामा चलने के बाद अध्यक्ष पद फिर उन्हीं के परिवार में लौट आया. अगर राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया था तो सोनिया गांधी को भी अध्यक्ष बनने से इनकार करना चाहिए था मगर बेटे के इनकार के बाद सोनिया गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद पर पुनः कब्जा जमा लिया. सोनिया गांधी के अध्यक्ष बन जाने के बाद राहुल के करीबियों के पर कतरे जाने लगे.
वर्ष 2019 के अक्टूबर माह में कांग्रेसी नेता संजय निरूपम के बयान ने पार्टी की इस कलह को सतह पर ला दिया. संजय निरूपम ने उस समय कहा कि “ सोनिया गांधी, अपने दरबारियों से मुक्ति प्राप्त करें. राहुल गांधी को अपना वनवास खत्म करके पार्टी की कमान संभालनी चाहिए.”
वर्ष 2019 के सितम्बर माह में त्रिपुरा के कांग्रेस अध्यक्ष प्रद्युत देव बर्मन ने अपने पद से इस्तीफा की घोषणा कर दी. उन्होंने अपने ट्वीटर पर लिखा कि ” आज जब मैं सोकर उठा तो बहुत सहज महसूस कर रहा हूं. आज के दिन की शुरुआत मैं झूठ बोलने वालों और अपराधियों को बिना सुने कर रहा हूं. आज मुझे यह फिक्र नहीं है कि मेरा कौन सा साथी मेरी पीठ में छुरा घोंपेगा. मुझे गोलबंदी नहीं करनी पड़ रही है, न ही मुझे हाईकमान से यह सुनना पड़ रहा है कि कैसे भ्रष्ट लोगों को पार्टी के ऊंचे पदों पर बिठाया जाए. आज जब मैं सुबह सोकर उठा, मुझे एहसास हुआ कि इन गलत लोगों की वजह से मेरी सेहत और जिंदगी को कितना नुकसान हुआ. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं उन भ्रष्ट लोगों को पार्टी के ऊंचे पदों पर बिठाने के लिए तैयार नहीं था, जो हमारे प्रदेश को बर्बाद करेंगे. मैंने कोशिश की और शायद मैं हार गया. लेकिन शुरू से ही इस लड़ाई में अकेला होने पर मैं कैसे जीत सकता था? बहरहाल, राहुल गांधी की पसंद रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में हो रहे अपमान के कारण कांग्रेस को छोड़ चुके हैं और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार अपने दिन गिन रही है.