सिंधिया पर हो हल्ला करने वाली कांग्रेस अपने गिरेबान में भी झांक ले
   दिनांक 12-मार्च-2020
सदैव विपक्षी दलों की सरकारें गिराती आई कांग्रेस पार्टी को शोभा नहीं देती शुचिता की राजनीति की बातें, अनुच्छेद 356 का बेजा इस्तेमाल कर कांग्रेस गिरा चुकी है 93 विपक्ष सरकारें। 1992 में तो कांग्रेस भाजपा की चार सरकारों राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश सरकार को एकसाथ बर्खास्त कर दिया था, जबकि सभी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई थीं

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कांग्रेस पार्टी को एकाएक शुचिता की राजनीति का ख्याल आ गया है। मध्य प्रदेश में खुद के खड़े किए गए राजनीतिक संकट पर जिस तरह से कांग्रेस पार्टी केंद्र की सत्ताधारी भाजपा पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रही है, वो उसे शोभा नहीं देता है। देश पर करीब 50 साल राज कर चुकी कांग्रेस पार्टी ने ही सर्वाधिक बार शुचिता की राजनीति को चूर-चूर किया है और आज भी करती आ रही है।
शुचिता की राजनीति का पहला उदाहरण तो आजादी के कुछ दिनों बाद ही देखने को मिल गया था। 31 जुलाई 1957 को सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करते हुए केरल में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया था। सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने सदैव अनुच्छेद 356 का गलत इस्तेमाल किया है। संविधान बनने के बाद से आज तक अनुच्छेद 356 का 132 बार इस्तेमाल हुआ, जिसमें 93 बार कांग्रेस ने विपक्षी दलों की सरकारों को बर्खास्त किया है।
अनुच्छेद 356 के गलत इस्तेमाल में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हॉफ सेंचुरी लगा चुकी थीं। वैसे तो उनके शासनकाल में देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस ही सत्तासीन थी, लेकिन इक्का-दुक्का यदि कहीं गैर कांग्रेसी सरकार होती थी तो इंदिरा गांधी को वो बर्दाश्त नहीं होता था। इंदिरा गांधी ने जनवरी 1966 से मार्च 1977 के बीच 35 बार और जनवरी 1980 से अक्टूबर 1984 के बीच 15 बार अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग किया। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने समय में 12 बार, और राजीव गांधी ने 6 बार अनुच्छेद 356 का गलत इस्तेमाल किया। 1992 में तो कांग्रेस ने भाजपा की चार सरकारों राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश सरकार को एकसाथ बर्खास्त कर दिया था, जबकि सभी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुईं थीं।
आज लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाली कांग्रेस पार्टी के समय में ही देश ने आपातकाल का दंश झेला है। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने इंदिरा गांधी ने देश के नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निरस्त कर दिए थे। विपक्षी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। मीडिया की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा दी थी, जिसके विरोध में समाचार पत्रों ने अपने संपादकीय को खाली छोड़कर विरोध दर्ज कराया था। आपातकाल लगाने के पीछे इंदिरा गांधी का निजी स्वार्थ था, क्योंकि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका चुनाव निरस्त कर छह साल तक चुनाव न लड़ने की पाबंदी लगा दी थी। कमाल की बात यह थी कि हाईकोर्ट के इस निर्णय को इंदिरा गांधी ने मानने से इनकार कर दिया था।
1980 में कांग्रेस ने हरियाणा के नेता भजनलाल के सहारे चुनी हुई विपक्षी सरकार को धराशायी करते हुए अपनी पार्टी की सरकार बना ली थी। तब भजनलाल 40 विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए थे। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दो बार बसपा के सभी विधायकों का कांग्रेस में विलय करा चुके हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जब कांग्रेस ने विपक्षी दलों को छिन्न-भिन्न करने का काम किया है।
मध्य प्रदेश में आज के घटनाक्रम के लिए स्वयं कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार है। पार्टी ने अपने घर को संभाला नहीं और दूसरों पर दोषारोपण शुरू कर दिया है। अपने दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस के दिग्गज बुरी तरह बौखला गए हैं। सिंधिया समर्थक 22 विधायकों के पार्टी छोड़ने से मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार अल्पमत में है और पार्टी के नेताओं ने सिंधिया पर व्यक्तिगत टिप्पणियां शुरू कर दी है। कमाल की बात यह है कि दो दिन पहले तक जब सिंधिया कांग्रेस में थे, तब उन्हें यह सब याद नहीं आया। दिग्विजय सिंह समेत कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिंधिया के खिलाफ अनर्गल बयान देने पर उतारू हैं। बेहतर तो यह होगा कि कांग्रेसी नेता अपने गिरेबान में झांककर देखें। उन्हें विपक्ष दलों के साथ किए गए अपने दुर्व्यवहार की पूरी सूची मिल जाएगी।