भारत में रहने वाले भारत-विरोधी
   दिनांक 16-मार्च-2020
डॉ. डेविड फ्रॉले
भारत को बदनाम करने में यहां के ही तथाकथित अभिजात्य लोग लगे हैं। उन्हें न यहां के गौरवशाली इतिहास से कोई सरोकार है, न यहां की समृद्ध संस्कृति से। अवसरवादी-जातिवादी नेताओं की जमात उनके साथ है

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अपने बयानों-लेखों से भारत को बदनाम करने वाली जमात के कुछ चेहरे (बाएं से)-तेजस्वी यादव, असदुद्दीन ओवैसी, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई और ममता बनर्जी
आज कुछ तथाकथित आधुनिक भारतीयों के मन में एक नकारात्मक प्रवृत्ति पल रही है। देश का यह अभिजात्य कहलाने वाला वर्ग एक आंतरिक संघर्ष से गुजर रहा है जो गृहयुद्घ की शक्ल लेने को आतुर दिखता है। इसके सांस्कृतिक आकाओं का मुख्य प्रयास देश को पतन की ओर धकेलना या विदेशी छवि में गढ़ना है मानो किसी भारतीय, खासकर किसी हिंदू में इसका संरक्षण या सुधार करने की सामर्थ्य नहीं।
भारत का यह अभिजात्य वर्ग भारत की मूल परंपराओं और संस्कृति से सर्वथा अलगाव की भावना से ग्रसित नजर आता है। सत्ता में बैठा अभिजात्य वर्ग तो महज पुराने औपनिवेशिक शासकों का देशी अवतार प्रतीत होता है, जो अपनी अलग-अलग छावनियों में रहते थे और लोगों से घुलने-मिलने से परहेज करते थे, उनके रीति-रिवाजों को बेमानी समझते थे। अंग्रेजी बोलने वाला यह वर्ग इस मिट्टी से अपनी पहचान तोड़कर खुद को गौरवान्वित महसूस करता है।
विश्व में शायद ही ऐसा कोई दूसरा देश हो, जहां लोग राष्ट्र के स्तर पर अपनी उस संस्कृति और इतिहास को धूमिल करने में आनंदित होते होंगे जो अनादिकाल से एक गौरवपूर्ण परंपरा का प्रतीक रहा है। भारत की प्राचीन गाथा पुरातात्विक अवषेशों के प्रमाण के जरिए सामने आई तो यही वर्ग उन्हें ‘आविष्कार’ मानकर गौरव मानने की बजाय उसका उपहास उड़ाता है, मानो वे एक ‘पिछड़ी’ सभ्यता और सामंतवादी परंपरा की कपोल कल्पना हो।
इसका कारण संभवत: यह है कि ऐसा कोई देश नहीं जहां उसकी बहुसंख्यक आबादी के धर्म का मजाक उड़ाया जाता हो, वह आबादी जो ज्ञान-समृद्घ, चैतन्य और आध्यात्मिक हो। इसके उलट अल्पसंख्यक मजहब चाहे कितना ही कट्टरपंथी या उग्रवादी हो, ऐसे लोग उसके लिए कसीदे ही काढ़ते हैं। बहुसंख्यक धर्म और उसके संस्थानों पर जहां करों का बोझ है, उनके नियमन के लिए विधान निर्धारित हैं, वहीं अल्पसंख्यक मजहबी समुदायों को विभिन्न कर लाभ दिए गए हैं, उनका नियमन या निगरानी भी नहीं की जाती। अल्पसंख्यक मजहबी समुदाय अपने मदरसों में मनचाहा सबक सिखा सकते हैं, भले ही वह राष्ट्र विरोधी या व्यावहारिक तौर पर पिछड़ापन हो। ऐसी पुस्तकें प्रतिबंधित हो जाती हैं, जिनसे अल्पसंख्यकों की मजहबी भावनाओं को ‘ठेस’ पहुंचती हो, लेकिन वे बहुसंख्य समुदाय की मान्यताओं का अपमान करें तो ‘कोई फर्क नहंी पड़ता’, बल्कि उन्हें महिमामंडित ही किया जाता है।
विश्व में शायद ऐसा कोई देश नहीं है, जहां क्षेत्रीय और जातीय पक्षपात और परिवारवाद के प्रति निष्ठा राष्ट्रीय हित से अधिक महत्वपूर्ण हो। यहां तक कि जो लोग लोकतांत्रिक, समाजवादी या जाति सुधारक होने का दावा करते हैं, वे भी इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। राजनीतिक दल किसी राष्ट्रीय एजेंडे को बढ़ावा देने या राष्ट्र को सर्वोपरि रखने के लिए नहीं, बल्कि देश के किसी एक क्षेत्र या जन समुदाय के सरोकार से जुड़कर अपनी पहचान बनाए रखने में दिलचस्पी रखते हों। प्रत्येक समूह राष्ट्रीय अनुकंपा का सबसे बड़ा हिस्सा हासिल करने के लिए लालायित रहता है। वह नहीं समझना चाहता कि अपनी मुट्ठी में जितना ज्यादा भरेगा, उतना ही किसी और के हिस्से से छिन जाएगा। असमान बंटवारे की यह परंपरा बदस्तूर जारी रहती है और असंतोष फैलाती रहती है।
अजीब बात है कि भारत में आबादी के कुछ वर्गों को योग्यता की कसौटी पर परखे बगैर आगे बढ़ने की राह थमा दी जाती है, जबकि अन्य वर्गों को उन्हीं पदों के लिए असंख्य परीक्षाओं से गुजरना होता है, चाहे वे कितने ही योग्य क्यों ना हों। जातिप्रथा को खत्म करने की कोशिश में एक नए जातिवाद ने जन्म लिया जिसके तहत स्कूल में प्रवेश पाने या नौकरी हासिल करने के लिए किसी की जाति को किसी की योग्यता के मुकाबले ज्यादा वरीयता दी जाने लगी। ब्राह्मणवाद-विरोधी विचार जातिवादी विचारधारा का सबसे प्रचलित रूप बन कर उभरा है। लोग सरकार को अपने मतों के आधार पर चुनी गई शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि एक कल्याणकारी राज्य के रूप में देखते हैं, जो देश के बजाय उन्हें ज्यादा से ज्यादा व्यक्तिगत लाभ मुहैया कराए।
बाहर के लोगों को भारतीयों को नीचे गिराने की जरूरत नहीं, भारतीय ही यह काम बखूबी कर रहे हैं और न सिर्फ अपने लोगों, बल्कि देश के विकास की गति को भी बाधित करने में खासी भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पड़ोसी पिछड़ रहे हैं, या राष्ट्र का विकास अवरुद्ध हो रहा है, उनका सपना बस खुद को शीर्ष पर देखना है। यही भारतीय जब विदेश जाते हैं तो अक्सर बड़ी सफलता हासिल करते हैं, क्योंकि उनकी मूल प्रतिभा को देश के वर्तमान माहौल पर हावी सांस्कृतिक आत्म-नकारात्मक प्रवृत्ति और भेदभावपूर्ण व्यवहार से संघर्ष नहीं करना पड़ता।
भारत में ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हासिल करने का अर्थ निजी कोश को धन-धान्य से समृद्ध करना और राष्ट्र को लूटना भर रह गया है। राजनीतिक नेताओं में कई अपराधी, धूर्त, ढोंगी और मूर्ख शामिल हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। यहां तक कि तथाकथित आधुनिक या उदारवादी दल भी राजा-दरबारी शासन व्यवस्था की तरह ही व्यवहार करते हैं, जिसके तहत किसी भी लोकतांत्रिक भागीदारी की तुलना में व्यक्तिगत वफादारी अधिक मायने रखती है। एक बार जब उन्हें सत्ता हासिल हो जाती है, तो वे राजनेता के तौर पर लोगों की सेवा करने के बजाय अपने फायदे के लिए उन्हें धोखा देते हैं। महाभ्रष्ट नेता अक्सर नौकरशाही पर हावी रहते हैं और इस सिलसिले में भ्रष्टाचार के कुछ छींटे उनके दामन पर भी अंकित हो जाते हैं।
राजनेता देश को वोट बैंक का अखाड़ा बनाकर एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देते हैं। वे विभिन्न समुदायों को तरह-तरह के उपहार देते हैं ताकि कुर्सी तक उनकी राह आसान हो जाए, या वे सत्ता में बने रहें। वे ऐसे नारों के साथ अपना चुनाव अभियान चलाते हैं जो राष्ट्रीय सौहार्द या सद्भाव बढ़ाने के बजाय सामुदायिक भय और संदेह का माहौल तैयार करता है। सामाजिक बदलाव संबंधी सकारात्मक कार्यक्रम बनाने के बजाय वे दोषारोपण और घृणा की भावना को उकसाकर अपनी रोटियां सेकते हैं। वे अशिक्षित जनता को वास्तविक सामाजिक समस्याओं जैसे बढ़ती जनसंख्या, खराब बुनियादी ढांचे या शिक्षा का अभाव जैसे विषयों पर जागरूक करने के बजाय अपने हित को साधने के लिए पाखंडपूर्ण प्रचार करते हैं।
जब एक अच्छी सरकार सत्ता में आती है तो विपक्ष का लक्ष्य उसे विफल करने पर केंद्रित हो जाता है, ताकि उसे गिराकर वह कुर्सी दुबारा हासिल कर सके। आज एक रचनात्मक या सहयोगपूर्ण विपक्ष एक दिवास्वप्न बन गया है। लक्ष्य बस खुद को कुर्सी पर बैठे देखना है, कोई और नहीं। अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भारतीय राजनेता अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए विदेशी प्रेस को अपने हिसाब से इस्तेमाल करने से भी परहेज नहीं करते, भले ही इसके लिए झूठ और अफवाह फैलानी पड़े और देश की छवि को बाहरी दुनिया की नजर में गिरानी पड़े। भारत में होने वाले एक मामूली तनाव को विदेशी मीडिया में विदेशी पत्रकारों ने नहीं, बल्कि भारत के चंद लोगों ने ‘महा विस्फोटक’ बना कर पेश किया जो अपने विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए उनका इस्तेमाल करने का मौका नहीं गंवाना चाहते थे। विदेशी प्रेस के जरिए भारत की खबर को जहरीला बनाकर पेश करने वाले चंद भारतीयों ने अपने ही देश के बारे में विष उगला है।
एक ईसाई मिशनरी की हत्या ‘ईसाई विरोधी हमलों’ के नाम से राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों पर छाई रहती है, जबकि सैकड़ों हिंदुओं की हत्या एक बेनाम, गौण घटना के तौर पर हाशिए पर खिसका दी जाती है, मानो सिर्फ गोरी चमड़ी वाले लोगों की मौत ही मायने रखती हैं। मिशनरी का आक्रामक होना जहां ‘सामाजिक उत्थान का प्रतीक’ माना जाता है, वहीं कन्वर्जन के खिलाफ आत्मरक्षा में हिंदुओं के प्रयास घोर कट्टरवाद के रूप में पेश किए जाते हैं।
आइए देखें, भारत में कैसे-कैसे नेता हुए हैं-लालू प्रसाद यादव (पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार), मुलायम सिंह यादव (पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश) आदि। ये ऐसे नेता रहे हैं जो खुद को बेताज बादशाह समझते थे और चाटुकारों से घिरे रहते थे।
अनके आधुनिक भारतीय राजनेता औपनिवेशिक शासकों से कम नहीं हैं, जो अपने ही देश को लूटते रहे, फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते रहे ताकि जनता इतनी कमजोर हो जाए कि उनकी सत्ता को चुनौती देने के लिए खड़ी भी न हो सके।
भ्रष्टाचार लगभग हर जगह मौजूद है और रिश्वत करीब करीब सभी क्षेत्रों में काम निकालने का सबसे सटीक साधन। भारत में एक वर्चस्वपूर्ण नौकरशाही है, जो सिर्फ अपने दंभी राजहठ में नियंत्रण नहीं खोना चाहती और इसलिए बदलाव का विरोध करती है, विकास को रोकती है।
मुख्य रूप से इस हिंदू बहुल राष्टÑ की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी ने एक इतालवी कैथोलिक महिला को अपना नेतृत्व सिर्फ इसलिए सौंप दिया क्योंकि अंतिम गांधी प्रधानमंत्री की विधवा के रूप में उन्होंने परिवार की मशाल थाम ली थी, मानो परिवारवाद और उसके प्रति वफादारी अभी भी देश में राजनीतिक विश्वसनीयता का मुख्य आधार थी। सोचने वाली बात है कि ऐसे नेता और पार्टी को प्रगतिशील समझा जाता है!
भारत की छवि विगत कुछ सालों से दिख रही अस्थिर राजनीतिक व्यवस्था से नहीं आंकी जा सकती। यह दुनिया की सबसे प्राचीन और पूजनीय सभ्यताओं में से एक है। इसकी संस्कृति को दुनिया पर जीत हासिल करने के लिए जिहाद की शक्ल में उभरा उग्रवादी और कट्टरपंथी मजहब नहीं कुचल सकता। यह एक अलौकिक, परमज्ञानी और चेतन दृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाला धर्म दर्शन है। भारत में उन प्रमुख पंथों का उद्भव हुआ जो ऐतिहासिक रूप से पूर्व एशिया में प्रसारित हुए- हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख सहिष्णुता और आध्यात्मिकता के लिए जाने जाते हैं। इसने संस्कृत भाषा को जन्म दिया, जो शायद दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा है। इसने हमें योग की अद्भुत आध्यात्मिक प्रणाली और ध्यान-चिंतन और आत्मज्ञान की महान परंपराएं सौंपी हैं।
वैश्विक आध्यात्मिकता के एक बेहतर सार्वभौमिक स्वरूप को प्राप्त करने के लक्षित उद्देश्य के साथ भविष्य की ओर दृष्टि केंद्रित है। एक प्रबुद्ध सभ्यता के विकास के लिए ऐसे विश्व दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो मजहबी हठधर्मिता के बजाय चेतना द्वारा परिभाषित दर्शन का पालन करे और यही परंपराएं शायद वे महत्वपूर्ण विरासत हैं जो भविष्य का मार्गदर्शन करेंगी।
विडंबना यह है कि अपनी मूल पुरातन परंपराओं को अपनाने के बजाय, आधुनिक भारतीय मानस, मार्क्सवाद जैसे पश्चिमी बौद्धिक विचारों की गुलामी करके खुश है। यहां तक कि वह ईसाई और इस्लामी मिशनरी की ओर से दिखाई गई उग्रता को भी वैध ठहराता है। परंतु ये तथाकथित अभिजात्य भारत में रहते हुए, मंदिरों, योगियों और महान उत्सवों की ऊर्जस्व धारा से रिश्ता कायम करने में पिछड़ गए। अधिकांश आधुनिक बुद्धिजीवियों ने भारत की पवित्र भूमि की आत्मा से साक्षात्कार किया ही नहीं। वे लोहे की मीनार में बंद अपने ही अनजान विचारों में कैद हैं।
( लेखक न्यू मैक्सिको, अमेरिका स्थित अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ वैदिक स्टडीज के संस्थापक और योगाचार्य हैं )