मुसलमानों को अपना वीटो का दौर ख़त्म होने की छटपटाहट है !
    दिनांक 16-मार्च-2020
वीटो मतलब सबकी बात काटकर अपनी बात थोपने की ताकत. भारत में मुस्लिम सियासत ने पूरी एक सदी अपना वीटो चलाया. आज उस वीटो के अचानक गायब हो जाने की हताशा है सीएए विरोधी फसाद 

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सीएए में कुछ भी मुस्लिम विरोधी नहीं है ये ऐसी कोई बात नहीं जिसे समझा न जा सके. एक सातवीं-आठवीं का छात्र भी जो आसानी से समझ सकता है वो मज़हबी मुस्लिम जमात (अधिकाँश) के पल्ले क्यों नहीं पड़ रहा ? कारण साफ़ है. ये नासमझी ओढ़ी हुई है. इस नासमझी के नीचे छिपाई गई है, एक कुंठा, और एक जिद. कुंठा और जिद है उनके उस सुनहरे दौर को वापस लाने की, जब उनकी हर जायज़-नाजायज़ माँग पर सत्ता घुटने टेक देती थी. राष्ट्रीय महत्व और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर भी मुल्लाक्रेसी का वीटो चला करता था. न्याय-अन्याय-संविधान- मानवता – सहज बोध (कॉमनसेंस) सब इस वीटो के आगे पानी भरते थे. साल 2014 के आम चुनावों के बाद वीटो का ये लंबा दौर ख़त्म हुआ. होना भी चाहिए था. लेकिन पुरानी आदतें बदलने में समय लगता है..
वीटो का पहला दौर : आज़ादी के पहले
सौ साल पहले खिलाफत आंदोलन के साथ ये दौर शुरू हुआ था, जब संकुचित दृष्टि वाले इस्लामी नेतृत्व की सनक को देश के जीवन-मरण का प्रश्न बनाकर एक बेवजह के आंदोलन में झोंका गया था. सुदूर तुर्की के भ्रष्ट खलीफा को फिर से गद्दी पर बिठाने के लिए भारत में जमीन-आसमान एक किया गया. जिहाद की तक़रीर की गई और जब स्वयं तुर्कों ने, और सारे अरब जगत ने खिलाफत को नकार दिया तो जिहाद की इस तलवार को अपने आस-पास मौजूद “काफिरों” की गर्दन पर रख दिया गया. यहां से इस्लामी मज़हबी संस्थान देश की मुख्यधारा की राजनीति पर हावी होते गए. तर्क और औचित्य को किनारे रखकर की गईं उनकी मांगों के आगे देश का नेतृत्व झुक जाता. आज़ादी के पहले ही तुष्टीकरण का ऐसा दृश्य खड़ा हो चुका था. कट्टरपंथियों ने वन्देमातरम पर ऐतराज जताया तो वन्देमातरम से कन्नी काटी जाने लगी. मुस्लिम लीग से तो बात की जा सकती थी, लेकिन हिंदू महासभा अछूत थी. इस्लाम में मतांतरण स्वीकार, पर वापस हिंदू बनाने के लिए किया जाने वाला शुद्धिकरण अस्वीकार. देश के तत्कालीन नेताओं द्वारा इस उन्माद को हवा देने का परिणाम ये हुआ कि उस समय देश में शुद्धिकरण अभियान के सबसे बड़े चेहरे स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी गई, और जब हत्यारे रशीद पर मुकदमा चला तो मज़हबी नेताओं ने उसका मुकदमा लड़ने के लिए लाखों का चंदा इकट्ठा करवाया. रशीद को फांसी हुई तो उसकी शवयात्रा में लाखों मुसलमान शामिल हुए. उस समय के कांग्रेस के नेता इस पर चुप्पी साधे रहे. ये वीटो था कि सच को सच न कहा जाए, यदि मुस्लिम कट्टरपंथ को वो मंज़ूर नहीं है. ऐसे अनेक अलिखित वीटो चलते रहे, और फिर उस दौर का सबसे बड़ा वीटो लगाया गया, पाकिस्तान की मांग, जो अंततः सफल हुआ. दंगों का दावानल भभका, रक्त की नदी बही, और देश का विभाजन हो गया. करोड़ों लोगों का विस्थापन एक बड़ी मानवीय त्रासदी बन गया. अब उम्मीद स्वाभाविक थी कि सब नागरिक समान दृष्टि से देखे जाएँगे और वीटो की परंपरा समाप्त हो जाएगी, लेकिन हुआ उलटा. चुनावी राजनीति ने गट्ठा वोटों के सौदागर पैदा किए और वीटो का एक नया दौर शुरू हुआ.
वीटो का दूसरा दौर: आज़ादी के बाद
आज़ादी के बाद जब देश में नया विधान लाया जा रहा था तो आधुनिक युग के हिसाब से पुरानी सारी व्यवस्थाएं बदलीं गईं. हिंदुओं में बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया गया, तलाक, तलाशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता आदि तय हुआ. हिंदू कोड बिल लाया गया. लेकिन मुस्लिमों में 14 सौ साल पुराने अरब कानूनों, बहुविवाह, तीन तलाक आदि को नहीं बदला गया और संविधान को भी बायपास करने वाले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मान्यता दी गई. देश में समानांतर शरिया अदालतें चलती रहीं, और वहां “इमराना” जैसे फैसले होते रहे. मुजफ्फर नगर की 28 वर्षीय इस मुस्लिम युवती के साथ 6 जून 2005 को उसके ससुर अली मुहम्मद ने बलात्कार किया. मामला स्थानीय शरिया अदालत में ले जाया गया. वहां से फरमान जारी हुआ कि चूंकि उसके ससुर ने उसके साथ बलात्कार किया है, इसीलिए उसके ससुर का बेटा, अर्थात इमराना का पति, इमराना के लिए बेटे समान हो गया है. इसलिए दोनों का निकाह अपने आप ही निरस्त हो गया है. फैसला सुन कर स्तब्ध हुई पांच बच्चों की माँ इमराना को समझाइश देते हुए शरिया अदालत ने कुरान की आयत (4:22) दोहराई ‘वा ला तनकीहू मा नकाहा आबा-ओ-कुम’ अर्थात् जिन महिलाओं से तुम्हारे बाप ने निकाह किया है, उनसे तुम निकाह न करो.’ इस तरह बलात्कारी ससुर को छुट्टा छोड़ते हुए इस्लामी न्यायाधीशों ने इमराना और उसके पांच मासूम बच्चों को कठोरतम सजा सुना दी. वीटो लगा दिया गया. सियासत मुंह सिए रही.
शाहबानो नामक बूढ़ी महिला को तीन तलाक देकर बेसहारा छोड़ने वाले उसके समृद्ध वकील पति को जब सर्वोच्च न्यायालय ने मामूली सा गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया तो सारे देश में भूचाल लाया गया. मुस्लिम संगठन सड़क पर आ गए. वीटो लगा दिया. राजीव गांधी सरकार झुक गई और संसद में अपने प्रचंड बहुमत का इस्तेमाल करके अदालत के फैसले को उलट दिया. तीन तलाक को ख़त्म करने की शिक्षित मुस्लिम महिलाओं की बहुत पुरानी मांग चली आ रही थी. अनेक मुस्लिम देशों यहां तक कि पाकिस्तान में भी तीन तलाक प्रतिबंधित था, लेकिन भारत में बदस्तूर जारी था, हलाला का व्यापार चल रहा था. मुल्ला फौज का वीटो लगा हुआ था कि ये सब यूं ही चलता रहेगा और चलता रहा. “सेकुलर देश” में, “सेकुलर नेताओं” की सत्ता द्वारा भारतीय करदाताओं के पैसे पर हज सब्सिडी दी जाती रही. हज हाउस बनते रहे. गवर्नर हाउस और राष्ट्रपति भवन में रोजा अफ्तार चलते रहे. गौ हत्या पर आपत्ति उठाना सांप्रदायिक, राम जन्मभूमि की बात करना सांप्रदायिक, औरंगजेब और टीपू सुलतान का महिमामंडन, ये सब छद्म सेकुलरिज्म के चलन थे. संघ को गाली देना और जाकिर नाइक से मंचों पर गले मिलना, वीर सावरकर की निंदा और “ओसामाजी”- हाफ़िज़ सईद “साहेब” के संबोधन, सिमी जैसे आतंकी संगठनों को निर्दोष बताना, जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों को खुला हाथ , विदेशी एनजीओ के पैसों से मस्जिदों और मदरसों का जाल बिछाया जाना आदि की छूट थी. भारत मां को “डायन” कहने की जुर्रत करने वाले लोग सत्ता की शोभा बढ़ा रहे थे.
नेता चुनावों में तुष्टीकरण के नए-नए दाँव लेकर उतरते, अरबी वेशभूषा में चुनाव प्रचार करते, मज़हब के आधार पर मुस्लिमों के आरक्षण की माँग करते जबकि जातीय आधार पर मुस्लिम भी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं. पाकिस्तान भारत में आतंक का निर्यात करता लेकिन देश के कर्णधार खुलकर पाकिस्तान का नाम भी लेने से बचते थे. देश की विदेशनीति पर भी इस वीटो की छाया थी. भारत का विदेश मंत्रालय फिलिस्तीन के पीछे दीवाना बना रहता लेकिन इजराइल से लंबे समय तक राजनयिक संबंध भी नहीं बनाए गए क्योंकि मुस्लिम कट्टरपंथी यहूदियों से नफरत करते हैं. “सेकुलरिज्म” की ऐसी कितनी ही मिसालें हैं और “वीटो” पावर के ऐसे कितने ही किस्से हैं.
और घूम गई दुनिया......
2014 के चुनावों ने एक नए परिवर्तन के दौर को जन्म दिया, और 2019 में देश ने इस परिवर्तन पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाईं. हज सब्सिडी समाप्त कर दी गई. तीन तलाक ख़त्म कर दिया गया. राम जन्मभूमि पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया, धारा 370 का अस्त हो गया. हजारों विदेशी एनजीओ क़ानून की सख्त निगाह के सामने कुम्हला गए और बचे खुचे कायदे से चलने को मजबूर हो गए. वीटो समाप्त हो गया. यही कसक, यही छटपटाहट शाहीनबाग़ के कर्णधारों को मजबूर कर रही है. इसीलिए कट्टरपंथी बेचैन हैं, और देश के मुस्लिमों में सीएए और एनआरसी को लेकर अफवाहें फैला रहे हैं. अफवाहों का पेट्रोल मज़हबी उन्माद की आग में झोंका जा रहा है. ताकि सत्ता पर से फिसल गई अपनी पकड़ को फिर से जमाया जा सके. उनके साथ वो सारे सियासी और दूसरे फिरके आ खड़े हुए हैं, जो सत्ता से दूर तिलमिला रहे हैं.