ददलानी का देशद्रोही दर्द, बॉलीवुड की जिहादी मानसिकता
   दिनांक 16-मार्च-2020

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कांग्रेस समर्थित वामपंथी वैचारिक वायरस कोने-कोने में समाए हुए हैं. जब इनके वैचारिक आतंक को चुनौती मिलती है, तो ये बिलबिला उठते हैं. समाज और देश के हर तबके में इनके वैचारिक आतंक के खिलाफ विद्रोह है. इस्लामिक जिहाद, विभाजनकारी और विध्वंसकारी सोच के खिलाफ इस समय देश में ज्वार है. पत्रकारिता से लेकर बॉलीवुड कलाकार का चोला ओढ़े ये लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. अब ये देश केसरी देखना चाहता है, ये देश अब तान्हा जी के भगवा को सलाम करता है. ये देश मणिकर्णिका देखता है. साथ ही ये देश वैचारिक आतंकवादियों को छपाक जैसी फिल्म को बुरी तरह फ्लॉप करके बता देता है कि आप भारत के खिलाफ सोचकर हमसे कमाई नहीं कर सकते. ऐसे ही एक वैचारिक वायरस हैं विशाल ददलानी. कहने को संगीतकार हैं, लेकिन अब बस इतनी हैसियत बची है कि रियलिटी शोज में जज की कुर्सी पर फुरसत से बैठे रहें. बिल्कुल सही पहचाना आपने. ये वही विशाल ददलानी है, जिसने 2019 में जैन मुनि तरुण सागर जी को लेकर पत्तिजनक टिप्पणी की थी, इस पर ददलानी का देशभर में विरोध हुआ था तब ददलानी ने चंडीगढ़ जाकर उनसे माफी मांगी थ़ी.अब ददलानी को फिर से दर्द उठा है. ददलानी, जी न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी को कीटाणु बता रहे हैं. उन्होंने ट्वीट किया कि सुधीर चौधरी कीटाणु हैं और उनके हालिया कार्यक्रमों को लेकर ददलानी ने मुंबई पुलिस से अपील की कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए. ददलानी को दर्द आखिर किस बात पर उठा है. असल में सुधीर चौधरी इन दिनों अपने कार्यक्रम के जरिए जिहाद के अलग-अलग रुपों की व्याख्या कर रहे हैं. वह बता रहे हैं कि जिहाद सिर्फ वह नहीं है, जो एके 47 लेकर लड़ी जा रही है. असल में जमीन कब्जाने की जिहाद है. लव जिहाद है. वैचारिक जिहाद है. साहित्यिक जिहाद है. हर संभावित रूप में जिहाद का नाग फन उठाए है. यह बेबाक सच ददलानी के लिए सच में दर्दनाक है.
 
ददलानी इस पूरी जमात के एक प्रतिनिधि भर हैं. बॉलीवुड में ये जमात बहुत गहरे तक पसरी थी. एक तरफ कांग्रेसियों का प्रश्रय, दूसरी तरफ नक्सलियों का समर्थन. तीसरी तरफ दाऊद इब्राहिम जैसे माफिया का संरक्षण. असल में बॉलीवुड इस बात का सबसे सटीक उदाहरण है कि कैसे कांग्रेस, नक्सली और आतंकवादी विचारधाराएं एक बिंदु पर जाकर एक हो जाती हैं. बॉलीवुड का ये गैंग कभी अवार्ड वापसी के रूप में सामने आता है, तो कभी वैचारिक स्वतंत्रता के खतरे के नारे लगाने लगता है. ये वही गैंग है, जिसे भारत में डर लगता है और पाकिस्तान में ये सर-माथे बैठाए जाते हैं. ये वही लोग हैं, जो माफिया के पैसे से बनी फिल्मों में काम करते डरते नहीं, लेकिन जय श्री राम से इन्हें डर लगता है. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के आने के बाद से बॉलीवुड के वैचारिक आतंकवादियों के नकाब ही उतर गए हैं. अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक, जो सिर्फ कुछ सुविधाएं केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से न मिल पाने के कारण मोदी सरकार के विरोधी हो गए हैं. ये शाहीन बाग जाते हैं, बिरयानी खाते हैं और फिर ट्वीट करते हैं कि सीएए समर्थक होने का मतलब मुस्लिम विरोधी होना है. एक जावेद अख्तर भी हैं. जिन्हें शरजील इमाम नहीं दिखाई देता, जिन्हें ताहिर हुसैन जैसा कातिल नजर आता. वह राग अलापते हैं कि दिल्ली में हिंसा के लिए कपिल मिश्रा जिम्मेदार है. विशाल ददलानी जैसे लोग इसी स्कूल से कोचिंग पाए हुए हैं. ददलानी ने दिल्ली हिंसा के बाद भी ट्वीट किया था कि सीएए के खिलाफ दो महीने से प्रदर्शन हो रहा था, लेकिन कहीं हिंसा नहीं हुई (उन्हें जुमे को हुई जिहादी हिंसा असल में हिंसा नजर आती ही नहीं है). जबकि सीएए के पक्ष में बयान आते ही हिंसा शुरू हो गई. तब ये
सभी बॉलीवुड के नक्सल मिलकर दिल्ली दंगे का ठीकरा वारिस पठान, शरजील इमाम, शाहीन बाग के आयोजकों के बजाय कपिल मिश्रा पर फोड़ने की कोशिश कर रहे थे. सोनम कपूर से लेकर स्वरा भास्कर तक, इन सभी को सीएए मुस्लिम विरोधी नजर आता है. ये बात अलग है कि इनमें से शायद ही किसी ने ऐसे किसी प्रावधान का जिक्र किया हो, जिसमें ये अपनी बात साबित कर सकते हों. अब आते हैं मूल बात पर. बॉलीवुड के इस गिरोह को पता है कि इनकी कोई जवाबदेही नहीं है. ये जानते हैं कि ये हिट एंड रन (निशाना साधो और भाग खड़े हो) की शैली में ट्वीट करते रहेंगे और इन्हें मीडिया में जगह मिलती रहेगी. इन्हें सुधीर चौधरी और हर उस राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी से दिक्कत है, जो इनसे सवाल पूछ लेता है. जो इनसे पूछता है कि सीएए मुस्लिम विरोधी कैसे है. जो इनसे पूछता है कि शरजील इमाम या वारिस पठान का भाषण भड़काऊ क्यों नहीं था. जो इनसे पूछ लेता है कि आपको ये वैचारिक प्रेरणा कहां से मिलती है. ददलानी हो या फिर जावेद अख्तर या फिर नसीरुद्दीन शाह, ये सुधीर चौधरी और उनके जैसे राष्ट्रविरोधी विचाऱों पर सवाल उठाने वाले मीडिया से मुखातिब नहीं होते. इनकी प्रेस अलग है. इनके पत्रकार अलग हैं. लेकिन अब अगर ये लोग सोचते हैं कि जवाबदेही नहीं है, तो इन्हें दीपिका पादुकोण से पूछना चाहिए. अपनी फिल्म छपाक के प्रमोशन के लिए दीपिका जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ जा खड़ी हुई थीं. नतीजा, अच्छा सब्जेक्ट होने के बावजूद देश न छपाक को नकार दिया. तापसी पन्नू तो अभी तक थप्पड़ फिल्म को लेकर अपने गाल सहला रही हैं. असल में देश की जनता ने जवाबदेही तय कर दी है. आप देश को गाली देकर हमसे कमा नहीं सकते. अब आपके वैचारिक लगाव आपके करियर के लिए खतरा बन सकते हैं. चंद दिन और इंतजार कीजिए. कुछ और फिल्मों और सितारों का अंजाम देखिए. फिर देखते हैं कि इन्हें कांग्रेस बचाती है, नक्सली बचाते हैं या फिर दाऊद गिरोह.