भंवर के ‘मध्य’ कांग्रेस
    दिनांक 16-मार्च-2020
रंग में भंग पड़ेगा, यह निश्चित था। अंतत: होली के दिन मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार का रंग उतर ही गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए

scindia _1  H x
भाजपा की सदस्यता दिलाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया का स्वागत करते हुए जे.पी.नड्डा
इस घटनाक्रम के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। पहला, यह ऐसी घटना है जहां सिंधिया पर एक अंगुली उठाते ही चार अंगुलियां कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व, या कहिए सोनिया गांधी की ओर उठती हैं। कांग्रेस के कर्णधार सिंधिया पर मौकापरस्त या पदलोलुप होने का आरोप नहीं मढ़ सकते। राज्यसभा का पद एक बात है किन्तु बात सिर्फ इतनी भर नहीं थी। यह जनता के सामने वचन भंग का ऐसा मामला था जिससे मध्य प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व लगातार लापरवाही से टाल रहा था और सिंधिया के लिए समर्थकों के बीच ‘साख में सुराख’ की सी स्थिति बन गई थी।
संकेत बहुत पहले से साफ थे! मध्य प्रदेश कांग्रेस में तीन फांक पूरी दुनिया देख रही थी। दो पुराने खिलाड़ियों को साधते और राहुल के हाथ से कमान जाते ही युवा ‘महाराज’ की उपेक्षा करते हुए देश की सबसे पुरानी पार्टी और उसका बुजुर्ग नेतृत्व यह भूल गए कि ग्वालियर से बार-बार छलकती टीस बता रही है कि बात काबू से बाहर होती जा रही है। पिछले वर्ष ज्योतिरादित्य ने अपने ट्विटर परिचय से पहले ‘कांग्रेसी’ शब्द हटाया, फिर फरवरी के दूसरे पखवाड़े में टीकमगढ़ में अतिथि शिक्षकों से किया वचन पूरा न होने पर दूसरी बार और चंद रोज बाद किसानों के लिए 2,00000 रु. तक के कृषि ऋण माफी न होने पर तीसरी बार ‘सड़क पर उतरने’ की चेतावनी दी। यानी कुछ भी एकाएक नहीं, बल्कि उपेक्षापूर्ण, अनिर्णयकारी केन्द्रीय नेतृत्व के चलते हुआ।
दरअसल, शिक्षकों या किसानों के मुद्दे पर ज्योतिरादित्य के पास जो प्रश्न थे तथा राज्य सरकार के भ्रष्टाचार की जो कहानियां थीं, उन्हें वह सार्वजनिक रूप से न कहकर पार्टी नेतृत्व के साथ बंद कमरे में साझा करना चाहते थे। उसके लिए उन्हें 10 जनपथ से समय नहीं दिया गया। सच यह है कि यदि ज्योतिरादित्य के पास गुस्से की ठोस वजह थी तो सूबे की सचाइयों पर उनसे आंख मिलाकर बात करने का साहस सोनिया गांधी में नहीं था।
घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस पार्टी का जर्जर नेतृत्व से बंधे रहने की विकल्पहीनता है। कांग्रेस के भीतर अब दो खेमे एकदम साफ हैं। सोनिया के भरोसेमंद घाघ-बुजुर्ग नेता बनाम राहुल के करीबी रहे अपेक्षाकृत युवा चेहरे। इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस पार्टी सिंधिया और पायलट जैसे युवा चेहरों को आगे कर चुनाव में कूदी थी किन्तु परिणाम आते ही युवाओं को पीछे धकेल सत्ता सुख भोगने के आदी पुराने चेहरे आगे कर दिए गए। इससे युवा नेताओं और उनके समर्थक वर्ग का परस्पर टकराव और अंतत: कांग्रेस से मोहभंग शुरू हो गया। कांग्रेस के भीतर, पार्टी का भला चाहने वालों को यह मान लेना चाहिए कि सोनिया गांधी का जो नेतृत्व राहुल के कमान संभालने से भी पहले, वर्ष 2013 में ही अपना असर खो चुका था। उसे जनता द्वारा राहुल गांधी को भी खारिज कर दिए जाने के बाद दोबारा आजमाना निरर्थक कवायद थी। आज पार्टी के भीतर दोनों धड़े अलग होकर भी ‘गांधी’ उपनाम के खूंटे से बंधे जरूर हैं किन्तु सिर्फ एक परिवार के नाम का चप्पू चलाने से सियासत की नैया पार होगी, इस बात पर अब पार्टी के भीतर ही शशि थरूर से लेकर तमाम नौजवान नेता तक दबी जबान में सवाल उठाने लगे हैं। ऐसे में अगली पीढ़ी के तर्कपूर्ण नेताओं को परिवार के खूंटे से बांधे रखना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी।
घटनाक्रम के तीसरे आयाम के केंद्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वयं हैं। यह उनकी क्षमता है कि एक परिवारवादी पार्टी में लंबा समय बिताने और स्वयं एक राजघराने का स्तंभ होने के बावजूद उन्होंने पद अथवा परिवार के उपनाम से अलग अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। बेदाग छवि वाले इस कुशल वक्ता को अगली पीढ़ी के सुलझे हुए नेता के तौर पर भाजपा जैसे सिद्धांतनिष्ठ दल के साथ सफर करना है तो किसी एक परिवार की बजाए संपूर्ण भारतीय समाज को एक परिवार के रूप में समझना होगा। ठीक वैसे ही जैसे उनकी दादी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने समझा था!