द टेलीग्राफ की ओछी पत्रकारिता, राष्ट्रपति की तुलना कोरोना वायरस से की, प्रेस परिषद ने भेजा नोटिस
    दिनांक 18-मार्च-2020
वामपंथी पत्रकारिता का  स्तर इतना गिरा हुआ कैसे हो सकता है कि वह देश के राष्ट्रपति के संबंध में अपमाजनक टिप्पणी कर दे, उन्हें वायरस तक कह दे, लेकिन अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ ने पत्रकारिता के मूल्यों को ताक पर रखकर ऐसा किया है। मामला आने के बाद प्रेस परिषद ने अखबार को नोटिस भेजा है

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भारतीय प्रेस परिषद ने बंगाल से छपने वाले दैनिक अंग्रेजी ‘द टेलीग्राफ’ को कारण बताओ नोटिस जारी किया। टेलीग्राफ को यह नोटिस राष्ट्रपति के नाम की तुलना कोरोना वायरस के साथ करने के कारण दिया गया। मंगलवार (मार्च 17, 2020) को जारी प्रेस रिलीज के अनुसार परिषद ने 17 मार्च 2020 को अखबार में प्रकाशित हुई एक हेडलाइन पर संज्ञान लेते हुए यह कार्रवाई की है।
इस पहले पेज की लीड स्टोरी में समाचार पत्र ने ‘व्यंग्यात्मक’ शैली का इस्तेमाल करते हुए नियमों का उल्लंघन किया। राष्ट्रपति पर अपमानजक टिप्पणी की। पत्रकारिता के नियमों और आचरण का पूरा उल्लंघन करने जाने के बाद मामला प्रेष परिषद की जानकारी में आया और यह नोटिस जारी किया गया।
जानकारी के अनुसार, प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस चंद्रमौली कुमार प्रसाद ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया था और पत्रकारिता आचरण के मानदंडों का उल्लंघन करने के लिए द टेलीग्राफ के संपादक को नोटिस भेजा।

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प्रेस काउंसिल ने लिखा है कि देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति कोविंद) पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियां, उपहास और उन्हें नीचा दिखाने की बात गैरजरूरी होने के साथ-साथ पत्रकारिता के उचित प्रतिमानों के विपरीत जाती हैं।
गौरतलब है राष्ट्रपति कोविंद ने सोमवार को पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया था। जिसके बाद वामपंथियों में हलचल मच गई और वे पूर्व सीजेआई के फैसलों को इससे जोड़कर देखने लगे। इस बीच 17 मार्च को सारे नियमों और कायदों को ताक पर रखने के साथ साथ टेलीग्राफ ने पत्रकारिता की गरिमा को ताक पर रख दिया। द टेलीग्राफ ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ही वायरस तक कह दिया।
अखबार में इस हेडलाइन के आने के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने भी अखबार को जमकर फटकार लगाई। राष्ट्रपति कोविंद वंंचित समुदाय से आते हैं, सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे अनुसूचित जाति का अपमान बताया।
प्रेस परिषद ने ओछी पत्रकारिता के लिए द टेलीग्राफ को फटकार लगाई और उससे ऐसी हरकत करने के पीछे की वजह को पूछा है।
ऐसा पहली बार नहीं है कि वामपंथियों ने पत्रकारिता के मूल्यों को ताकपर रखा है। पत्रकारिता का सहारा लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में वामपंथी बिग्रेड ऐसा करती है। असम को देश से अलग करने का भाषण देने वाला शरजील एजेंडा वेबसाइट द वायर पर नियमित लिखता रहता था।
झूठी खबरें चलाना और लोगों को गुमराह करना और अपना एजेंडा हमेशा से इनका काम रहा है। पिछले दिनों आउटलुक पत्रिका में उमर अहमद के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को केन्द्र में रखकर एक अपमानजनक लेख लिखा गया था। हालांकि बाद में आउटलुक पत्रिका के एडिटर-इन-चीफ रूबेन बनर्जी ने पत्रिका में प्रकाशित लेख के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांग ली थी। तलाशेंगे तो ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर पत्रकारिता के मूल्यों की धज्जियां वामी पत्रका​रों ने उड़ाई हैं।