न्यायमूर्ति गोगोई को राज्यसभा भेजे जाने को ईनाम बताने वालों को शर्म आनी चाहिए
   दिनांक 18-मार्च-2020
अनूप भटनागर
कांग्रेस ने हमेशा न्यायपालिका को राजनीति की ओर धकेला और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाई। इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ही आपात काल के दौरान न्यायपालिका को कमजोर करने का सिलसिला शुरू किया था
 
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पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्य सभा के लिये मनोनयन होने के बाद से कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी दल और कुछ पूर्व न्यायाधीश समूचे देश को नैतिकता और शुचिता का पाठ ऐसे पढ़ा रहे हैं कि मानो एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश को संसद के उपरी सदन के लिये मनोनीत किए जाने से समूच न्यायपालिका की स्वत़़ंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ गई है।
कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दल तथा कुछ पूर्व न्यायाधीश आज भले ही न्यायपालिका को कमजोर करने या उसे अपने अनुरूप चलाने के आरोप मोदी सरकार पर लगा रहे हों लेकिन इस सत्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस ने कैसे न्यायपालिका को राजनीति की ओर धकेला और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाई।
इस संबंध में कांग्रेस के नेता बहरूल इस्लाम की नियुक्ति,इस्तीफा, चुनाव लड़ना और फिर उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनना ही नहीं बल्कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा को राज्य सभा का सदस्य बनाने की घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है।
यही नहीं, उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त करने वाली न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी को सेवानिवृत्ति के बाद 25 जनवरी, 1997 को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था। न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ने राज्यपाल के रूप में राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की मौत की सजा के मामले में दायर दया याचिकाएं खारिज की थीं।
विपक्षी दल भले ही राज्य सभा के लिये न्यायमूर्ति गोगोई के मनोनयन को अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, राफेल सौदा विवाद, सीबीआई के शीर्ष अधिकारियों के बीच हुये विवाद जैसे प्रकरणों में उनकी अध्यक्षता वाली पीठ के फैसलों से जोड़ कर पेश कर रहे हैं।
विपक्ष की यह दलील भले ही पूरी तरह गले नहीं उतरे लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि देश के एक अन्य पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। यह भी एक तथ्य है कि 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद देश में हुए सिख विरोधी दंगों की जांच का काम 1985 में न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता वाले आयोग को सौंपा गया था और उन्होंने इस जांच में कांग्रेस को पाक साफ बताया था।
रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिर्पोट के आलोक मे क्या यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस को क्लीन चिट देने की वजह से ही उन्हें राज्य सभा का सदस्य बनाया गया था।
इसी तरह, एक अन्य पूर्व प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम को सेवानिवृत्ति के बाद केरल का राज्यपाल बनाये जाने का प्रकरण सोशल मीडिया में उठा। यह पहला अवसर था जब किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश को राज्यपाल नियुक्त किया गया था।
न्यायमूर्ति पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाये जाने पर कांग्रेस और उसके सहयोगी तथा समर्थक संगठनों ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश को राज्यपाल नियुक्त करने के औचित्य पर सवाल उठाए थे तो कुछ संगठनों ने उनके चुनिंदा फैसलों को विवाद में घसीटने का प्रयास किया था।
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के राज्य सभा में मनोनयन की आलोचना करते हुए कांग्रेस के नेताओं ने यह कहने में भी गुरेज नहीं किया कि उन्हें न्यायपालिका और खुद की ईमानदारी से समझौता करने वाले व्यक्ति के रूप में हमेशा याद किया जायेगा। अगर यही तर्क तो फिर कांग्रेस के दिग्गज नेता क्या यह बताने का साहस करेंगे कि उनकी पार्टी ने मई 1993 में भ्रष्टाचार के आरोपों में शीर्ष अदालत के न्यायाधीश वी. रामास्वामी को पद से हटाने के प्रस्ताव पर लोकसभा में मतदान में हिस्सा क्यों नहीं लिया था। रामास्वामी को पद से हटाने के लिये लोकसभा में हुई बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ही इन न्यायाधीश का सदन के बार से बचाव किया था।
इसी तरह, कांग्रेस और वामपंथी दल नहीं चाहते कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले अयोध्या के राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर शीर्ष अदालत अपना फैसला सुनाए। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर दबाव बनाने में सफलता नहीं मिलने पर कांग्रेस के नेतृत्व में ही तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पद से हटाने के लिये राज्य सभा में याचिका दायर की गई थी।
सभापति एम वेंकैया नायडू ने इसे दोषपूर्ण पाते हुये अस्वीकार कर दिया था। हालांकि, कांग्रेस और वाममोर्चा के नेता प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने के प्रस्ताव से संबंधित नोटिस अस्वीकार करने के सभापति के फैसले को असंवैधानिक और गैरकानूनी बताते रहे।
देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संभवतः सबसे पहले इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ही आपात काल के दौरान न्यायपालिका को कमजोर करने का सिलसिला शुरू किया था।
कांग्रेस सरकार ने ही अपनी हठधर्मी की वजह से जनवरी 1977 में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाघीश न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के लिये बाध्य किया था।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पद से हटाने के लिये जनवरी, 2019 में नया हथकंडा अपनाया गया था। इस बार, शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ प्रधान न्यायाधीश के सार्वजनिक हुए मतभेदों को अपना हथियार बनाया गया।
इस प्रकरण में विपक्ष की भूमिका उस समय प्रत्यक्ष रूप से सामने आ गई जब न्यायमूर्ति चेलामेश्वर के आवास पर हुई प्रेस कांफ्रेन्स के दौरान ही कम्युनिष्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता डी राजा भी वहां नजर आए। कांग्रेस और उसका साथ दे रहे विपक्षी दलों के इस कदम से न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता तार तार हो गयी थी।
उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद नयी जिम्मेदारियां सौंपे जाने पर लंबे समय से सवाल उठ रहे हैं। कई बार तो अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी नियुक्तियों को न्यायाधीश के रूप में संबंधित उनकी कार्यशैली से जोडने का भी दुस्साहस किया जा चुका है।
कई बार यह सुझाव भी दिया गया है कि न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होने के बाद एक न्यूनतम अवधि के लिये उन्हें कोई नया पद स्वीकार नहीं करना चाहिए और सरकार को भी इस दिशा में उचित कदम उठाने चाहिए। लेकिन इस तरह की आदर्श वाली बातें सिर्फ जनता के लिए होती हैं और हकीकत इसके विपरीत होती है।
न्यायपालिका में कई बार तो ऐसा हुआ है कि उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश की उनके सेवानिवृत्त होने से पहले ही किसी आयोग या अधिकरण में नियुक्ति की घोषणा कर दी गई। ऐसे मामलों की वजह से ही इन नियुक्तियों को ‘राजनीतिक संपर्क‘ जैसे जुमलों से सुशोभित भी किया गया है।
न्यायमूर्ति सदाशिवम की नियुक्ति तो अप्रैल 2014 में उनके सेवानिवृत्त होने के बाद सितंबर 2014 में की गयी थी जबकि न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति डी के जैन की नियुक्ति की घोषणा उनके उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने से पहले ही हो गई थी। यही नहीं, न्यायमूर्ति गोगोई को न्यायपालिका पर एक धब्बा बताने वाले और अपनी विवादास्पद टिप्पणियों के लिये चर्चित न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू को सेवानिवृत्त होते ही भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष और न्यायमूर्ति आफताब आलम को दूरसंचार विवाद निबटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसी तरह, उच्चतम न्यायालय के ही एक अन्य न्यायाधीश सी के प्रसाद को सेवानिवृत्त होने के बाद न्यायमूर्ति काटजू के स्थान पर भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था।
ये कुछ ऐसे दृष्टांत हैं जो संकेत देते हैं कि कांग्रेस ने न्यायपालिका को राजनीति की ओर ढकेलने या इसके सदस्यों को किसी न किसी तरह से प्रभावित करने का हमेशा प्रयास करती रही है।