भारत की साख बढ़ी, उन्मादी बौखलाए
   दिनांक 02-मार्च-2020
 
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा ऐतिहासिक ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के भ्रम तोड़ने वाला है। यह दौरा इसलिए भी याद किया जाएगा कि अमेरिका, जिसे लोग एक महाशक्ति के तौर पर, दुनियाभर में चौधराहट कायम करने की इच्छुक शक्ति के तौर पर देखते हैं; इस दौरे में अमेरिका की वह छवि टूटती दिखाई देती है। भारत के साथ 3 अरब डॉलर का अपाचे और रोमियो हेलीकॉप्टर सौदा या मिसाइल प्रतिरक्षा कवच की खरीद की बातचीत अगर एक ओर रख दें तब भी ऊर्जा, चिकित्सा एवं अंतरिक्ष के क्षेत्र में तथा मादक पदार्थ व आतंकवाद से मिलकर लड़ने को लेकर जो बातें हुईं, उसने बताया कि भारत और अमेरिका तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में एक तय दिशा में निर्णायक रूप से बढ़ने के लिए कदम बढ़ा रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे को दो तरह से देखा जा सकता है-पहला, भारत या अमेरिका के संदर्भ में इसका असर तथा दूसरा, भारत-अमेरिका की दोस्ती को देखने की विश्व दृष्टि-खासकर, उन देशों के संदर्भ में जो भारत के पड़ोसी अथवा अमेरिका के प्रतिस्पर्धी अथवा लाभार्थी हैं। इस संदर्भ में चीनी सरकार के आधिकारिक समाचारपत्र ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट महत्वपूर्ण है। समाचारपत्र इस बात से आशंकित दिखता है कि अमेरिका-भारत संबंधों का नई ऊंचाई पर पहुंचना एशिया के क्षेत्रीय समीकरण को बदल सकता है। इससे चीनी दावे की सत्यता भी पता चलती है कि उसकी हसरतें साम्राज्यवादी नहीं हैं, क्योंकि एशिया में दूसरे देशों का असर, उनका परस्पर व्यवहार नए समीकरण तय करे और उसमें चीन की भूमिका न हो, यह चीन को बर्दाश्त नहीं है। इसलिए अमेरिका द्वारा भारत को सामरिक-राजनीतिक महत्व देना चीन को रास नहीं आ रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा खरीद में लगातार बढ़ोतरी को लेकर भी चिंता जताई गई है। वहीं, पाकिस्तानी मीडिया में इस दौरे को लेकर नकारात्मकता और बाद में जो सन्नाटा पसरा रहा, यह भी देखने योग्य है।
इस दौरे की एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम के बाद यह दूसरा अवसर है, जब वैश्विक मंच के किसी प्रतिष्ठित नेता ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और अपार जनसमूह के सामने इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्द पर मुहर लगाई। इस्लामिक आतंकवाद ऐसा विषय है, जिससे अब कतरा कर नहीं निकला जा सकता। इस समस्या से निपटे बिना या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नए समीकरणों को इससे अलग रखकर सोचना अब संभव ही नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून और कश्मीर पर अमेरिकी राष्ट्रपति की राय, स्पष्टता तथा भारत में मुसलमानों की मजहबी आजादी, इन तीनों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी यह साफ करने के लिए काफी हैं कि पीएफआई, वाम-सेकुलर गठजोड़, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने के लिए काम कर रहे थे और जिन्होंने उपद्रव के लिए यह समय चुना, का षड्यंत्र धराशायी हो गया। दुनिया इन मुद्दों पर भारत के साथ चलती दिखती है।
ट्रंप ने अंतरिक्ष विज्ञान और सूचना तकनीक के क्षेत्र में भारत की उपलब्धि को अभूतपूर्व बताते हुए भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों एवं दवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार खोलने की बात की है। दोनों देशों के बीच चिकित्सा के क्षेत्र में पहले से ही कई कार्यक्रम चल रहे हैं। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग ऊर्जा क्षेत्र को भी नई ऊंचाई प्रदान करेगा। अमेरिकी कंपनी एक्सॉन भारत के दूर-दराज के क्षेत्रों में पाइपलाइन से गैस पहुंचाने में इंडियन आॅयल की सहायता करेगी। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार 20 अरब डॉलर का है। चीन से इतर अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है। ट्रंप का दौरा भू-रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने प्रशांत क्षेत्र में भारत के साथ तालमेल और बढ़ाने की बात कही है।
आज जब ट्रंप कहते हैं कि आप हमारे यहां रोजगार दीजिए, हम आपके यहां रोजगार देंगे तो इसमें कई दशकों से चला आ रहा अमेरिका का दाता भाव और भारत का याचक भाव अतीत की बातें हो जाती हैं। यहां समानता से एक-दूसरे के लिए अवसर तैयार करने और साथ बढ़ने की बात दिखाई देती है। याद कीजिए, अमेरिकी डेमोके्रट राष्ट्रपति बराक ओबामा का समय, जब अमेरिका को भारतीयों की थाली में पोषण बढ़ने पर भी चिंता हो जाती थी। बढ़ता भारत, पोषण पाता भारत तब अमेरिका की चिंता था। अब अमेरिका का रुख बदला है। साथ ही यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि अमेरिका में वामपंथी राजनीति का प्रतिनिधित्व डेमोक्रेट दल करते हैं और अधिकतर अश्वेत, अप्रवासी एवं ज्यादातर भारतीय मूल के लोगों का झुकाव अमेरिका में डेमोक्रेट दल की ओर रहा है। ऐसे मेंं ट्रंप का यह दौरा राजनीतिक तौर पर अमेरिका की राजनीति का भी नया समीकरण गढ़ सकता है। विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम में भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति और अमेरिका में रहने वाले करीब 40 लाख भारतीय, जिनके तार परस्पर जुड़े हुए हैं, वे क्या रिपब्लिकन पार्टी के समीकरणों को प्रभावित करने की ताकत नहीं रखते? यह बात अमेरिका की राजनीति के जानकार जानते हैं, ट्रंप भी इसे समझते हैं। इसीलिए अमेरिका में उनके दौरे को विशेष महत्व दिया गया।
दूसरी बात यह है कि चीनी चिंताओं का ग्लोबल टाइम्स में आना मामूली बात नहीं है। चीन को सोचना होगा कि अगर भारत और अमेरिका किसी एक दिशा में बढ़ रहे हैं तो क्या उसकी भी कोई साझी दिशा हो सकती है? या भारत की चिंताओं को देखते हुए वह अपने सबसे सहज पड़ोसी को अपने लिए और सुगम भी बना सकता है? अगर वह अपनी रणनीति में बदलाव लाता है तो दोनों देशों के बीच आक्रामकता घट सकती है। अगर ऐसा होता है तो वैश्विक राजनीति में सबके लिए अच्छे समीकरण बन सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या कहिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, धार्मिक स्वतंत्रता के पैरोकार हैं, यह बात ट्रंप ने भी मानी है। इतना ही नहीं, दोनों देशों के बीच संबंधों का भावनात्मक आधार भी है। इसीलिए चाहे आतंकवाद की बात हो या हाफिज सईद, मसूद अजहर जैसे आतंकियों की, अमेरिका ने हमेशा भारत की चिंताओं का समर्थन किया है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे को लेकर पूर्व में नकारात्मक माहौल बनाने की खबरें आर्इं और उसी समय देश में उपद्रव का जो ताना-बाना रचा गया, वह बताता है कि कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने और देश के भीतर अव्यवस्था, अशांति फैलाते हुए खतरनाक तरीके से संगठित हो रहे हैं। स्थितियां अभी पूरी तरह सुधरी नहीं हैं और कट्टरपंथियों द्वारा की गई हत्याओं का आंकड़ा बढ़ सकता है। परंतु इससे कुछ बातें साफ हो गर्इं- एक तो सीएए का विरोध केवल विरोध नहीं है और प्रदर्शन के नाम पर लगा जमावड़ा भी शांतिप्रिय नहीं है, भले ही उनके हाथों में तिरंगा, गांधी या बाबा साहब की फोटो दिखाई देती हो। इन तस्वीरों और संवैधानिक प्रतीकों के पीछे हिंसक, असंवैधानिक भावनाएं पोसी जा रही हैं, जिनके निशाने पर इस देश की सभी संस्थाएं, न्याय व्यवस्था और स्वयं संसद है। जिहादी मंसूबों को प्रदर्शन मान लेना या इसी रूप में मीडिया रिपोर्टिंग, दोनों ही खतरनाक हैं।
प्रशासनिक तौर पर दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश भले ही देर से दिया गया, लेकिन सही आदेश है। साथ ही, इस मामले में गहन छानबीन की आवश्यकता है, क्योंकि जिस तरह से देश में जगह-जगह चिंगारियां सुलगाई जा रही हैं और एक कदमताल के साथ यह आंदोलन आगे बढ़ रहा है उससे लगता है कि गैर राजनीतिक चेहरे वाला और संगठित न दिखने वाला, छिटका हुआ दिखने पर भी यह वैसा नहीं है। आंदोलन के सूत्रधार और चेहरे आपस में मिले हुए हैं और एक साझा रणनीति के तहत काम कर रहे हैं।
यह समय संयम के साथ प्रशासनिक सख्ती, गहन जांच और दोषियों को दंडित करने का है। पीड़ित परिवारों को सांत्वना या राहत राशि देने भर से काम चलने वाला नहीं है। दोषियों को कठोर दंड मिले, यह सुनिश्चित करने के साथ ही सभी जुड़े हुए तारों को एक साथ सामने लाना होगा। भारत के टुकड़े करने का मंसूबा पालने वालों की मंशाओं को पूरी तरह धराशायी करना होगा। जब तक यह काम पूरा नहीं होगा सारी बातें अधूरी रहेंगी।
भारत स्थिर है। बहुआयामी विकास के अंतरराष्ट्रीय रास्ते खुल रहे हैं, लेकिन अलग-अलग रूप में सामने आने वाले आंतरिक उपद्रवों का समूल नाश जरूरी है, क्योंकि कुछ बहुरूपियों की आंखों में नागरिकता संशोधन कानून नहीं, बल्कि बढ़ता भारत खटक रहा है।