सुकमा नक्सली अटैक: नक्सलियों से कांग्रेस का पुराना नाता रहा है!
   दिनांक 23-मार्च-2020
यदि कुछ तथ्यों पर गौर किया जाए तो आप पाएंगे कि नक्सलवाद को जन्म देने और उसके बाद उसे पालने पोसने में कांग्रेस की भूमिका हमेशा रही है

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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में सीआरपीफ के 17 जवान शहीद हो गए सुरक्षा बलों की 10 एके-47 समेत 15 ऑटोमैटिक राइफल्स गायब हैं। हाल ही में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्यसभा में नक्सल हिंसा से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए उपायों के बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि नक्सली हिंसा की गतिविधियों में वर्ष 2014 के मुकाबले वर्ष 2019 में खासी कमी आई है और यह गिरावट 38% से ज्यादा देखी गई है। इसके कुछ दिन बाद ही नक्सलियों ने हमले को अंजाम दे दिया।
यदि कुछ तथ्यों पर गौर किया जाए तो आप पाएंगे कि नक्सलवाद को जन्म देने और उसके बाद उसे पालने पोसने में कांग्रेस की भूमिका हमेशा रही है। पश्चिम बंगाल के जिस नक्सलवाड़ी से इसकी शुरुआत हुई, वहां उस समय कांग्रेस की ही सत्ता थी. जिस अविभाजित मध्य प्रदेश के बस्तर-सरगुजा आदि में नक्सलियों ने पांव फैलाए, वहां भी कांग्रेस ही सत्तासीन थी. जिस छत्तीसगढ़ में बाद में उसे आश्रय मिला तब नए छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के अजीत जोगी की सरकार थी, यहां तक की आश्रय की तलाश में जब वे कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में बस्तर में घुसे तब भी आंध्र में भी कांग्रेस की ही सरकार तो थी. और तो और... बस्तर में विकास नहीं होने, आदिवासियों के शोषण और उनके पिछड़ेपन को बहाना बनाकर जब नक्सली छत्तीसगढ़ में
आए तो उन्हें पिछड़ेपन का ‘बहाना’ भी तो कांग्रेस ने ही उपलब्ध कराया न ? कौन नहीं जानता कि केंद्र में विभिन्न कांगेसी सरकारों, मध्य प्रदेश की भी इसी दल की सरकारों ने हमेशा उपनिवेश जैसा बना कर रखा था इस क्षेत्र के संसाधनों को लूट कर भोपाल और दिल्ली में कांग्रेसियों के बंगले सजते रहे और बस्तर और ज्यादा वंचित होता गया.
कांग्रेस हमेशा नक्सलवाद से अपने संबंध का विरोध करते हुए अक्सर जीरम हमले का उदाहरण देती है। यह सच है कि उस दर्दनाक और क्रूर हमले में कांग्रेस के दर्ज़न भर नेता समेत काफी लोग मारे गए थे।
हालांकि उसी हमले में अनेक कांग्रेस नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई थी। 2018 में छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के प्रचार के लिए गए राहुल गांधी ने बिलासपुर में संपादकों के साथ हुई बैठक में साफ़ तौर पर कहा था कि – ‘वे दावे से कह सकते हैं कि नन्द कुमार पटेल को माओवादियों ने नहीं मारा। हमारे मौजूदा लीडरशिप को भी यह पता है।’ जिस नृशंस घटना की जांच के लिए राहुल गांधी की ही मनमोहन सरकार ने एनआईए जांच का आदेश दिया था, उस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा बिना जांच पूरी हुए ही माओवादियों को क्लीन चिट देना क्या माओवादी गठजोड़ का उदाहरण नहीं माना जाए?
 
और भी तथ्य हैं, जब भीमा-कोरेगांव में शहरी नक्सली गिरोह के शामिल होने का खुलासा हुआ तो  सुप्रीम कोर्ट तक ने उस कार्रवाई को सही ठहराया लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर भीमा-कोरेगांव मामले में अर्बन नक्सलियों को जी-जान से समर्थन दिया था। उन्होंने उन आरोपियों को पकड़ने के लिए शासन की भर्त्सना की थी। भीमा-कोरेगांव हिंसा के संबंध में एक पत्र के सामने आया था जिसमें अर्बन नक्सलियों की मदद के लिए कांग्रेस पार्टी के जिक्र के साथ एक मोबाइल नंबर लिखा था, यह फोन नंबर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का था।
जीरम हमले के समय भी दिग्विजय ने नक्सलियों को आतंकवादी के बदले भ्रमित विचारक कहा था। वाम उग्रवादियों के मुद्दे को वास्तविक और प्रासंगिक कहा था। यहां तक कि उन्हें जनता का प्रतिनिधि ही कहा था. एक तरफ जहां खुद कांग्रेस इस समस्या को आंतरिक सुरक्षा पर सबसे बड़ा ख़तरा मानती है वहीं उसी के एक गुट इसे सामाजिक—आर्थिक समस्या मानते हैं. कांग्रेस की इन ‘ढुलमुल’ नीतियों को गठजोड़ नहीं तो क्या कहेंगे आप ?