मध्यप्रदेश: शिवराज फिर बने सीएम, कमलनाथ ने ने इस्तीफा देकर जान बचाई, भारी पड़ती बहस
   दिनांक 24-मार्च-2020
सोमवार रात 9 बजे शिवराज सिंह चौहान से चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। कमलनाथ और स्पीकर एनपी प्रजापति को सर्वोच्च न्यायालय ने खरी-खरी सुनाकर बहुमत परीक्षण करवाने का आदेश दिया तो कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया

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शिवराज फिर से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं, शिवराज इस्तीफा देकर पहले ही विदा हो चुके हैं, इससे पहले वह लगातार यही कहते रहे कि
“बहुमत है, साबित कर देंगे..”. वह यह दावा भी करते रहे वो इस्तीफा नहीं देंगे, न ही विश्वास मत प्रस्तुत करेंगे और यदि भाजपा की हिम्मत है तो अविश्वास प्रस्ताव लाकर दिखाए.
भारी पड़ती बहस...
कमलनाथ ने इस्तीफा दिया, दरअसल यदि विधानसभा में शक्ति परीक्षण होता तो विपक्ष को बोलने का मौक़ा मिलता और कांग्रेस की खासी फजीहत होती. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतने के लिए जो आसमानी वादे किए थे, उनका हिसाब देना उसके गले की फांस बन गई है.
किसान कर्ज माफी – 15 साल बाद सत्ता में लौटने को बेताब कांग्रेस ने पहला दांव किसानों पर चला था. कर्जमाफी को लेकर राहुल गांधी ताबड़तोड़ वादे और दावे कर रहे थे. दो लाख तक के कर्जे माफ़ करने का आश्वासन देते हुए राहुल ने कहा था कि “यदि कांग्रेस की सरकार बनने के 10 दिन के अंदर ये वादा पूरा नहीं हुआ तो हम मुख्यमंत्री बदल देंगे.” सरकार बनी तो ये बात हवा-हवाई साबित हुई. और किसानों को 25 रूपए , 80 रूपए , डेढ़ सौ रुपए की कर्जमाफी के चेक मिले. किसानों को ये एक क्रूर मजाक की तरह लगा.
2. गेहूं खरीद पर बोनस का बोगस वादा – किसानों को दूसरा चुनावी वादा गेहूं खरीद पर 150 रुपए प्रति टन बोनस देने का था. यह वादा भी भूसे का ढेर साबित हुआ. उल्टा गेहूं और धान खरीदी का पैसा भी किसानों को समय पर नहीं चुकाया गया.
3. दूध उत्पादन पर प्रति लीटर 5 रुपए बोनस का वादा- दूध उत्पादकों के लिए यह बहुत बड़ा वादा था, लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने इस पर चुप्पी साध ली.
4. पेट्रोल डीजल की कीमतें घटाने का वादा- ये वादा पूरा करने से उलट कमलनाथ सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर सितंबर 2019 में 5% का अतिरिक्त वैट लगा दिया. वजह बताई कि भारी बारिश से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना जरूरी है मानो केवल मध्यप्रदेश में अतिवृष्टि हुई थी. परिणाम ये कि मध्य प्रदेश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें देश में सबसे ज़्यादा हो गई हैं.
5. हर गांव में गोशाला – यह मध्यप्रदेश में जन भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है. “बीफ ईटिंग” की समर्थक कांग्रेस के इस वादे ने सभी को हैरत में डाल दिया था. चुनाव के बाद सरकार की बयानबाजी के अलावा कुछ नहीं मिला.
6. आईटी क्षेत्र में 1 लाख रोजगारों के सृजन का वादा – लगता है ये वादा कांग्रेस के आईटी सेल को ध्यान में रखकर किया गया था. यह सच है कि 15 महीने में आईटी क्षेत्र में रोजगार पैदा नहीं होता, लेकिन इस दिशा में कोई हलचल तक नहीं दिखाई दी, न ही कोई रोडमैप बतलाया गया कि ऐसा किस तरह किया जाएगा.
7. लड़कियों की शादी पर 51 हजार रुपए - पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार के दौरान मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियों की शादी पर 25 हजार रुपए दिए जाते थे, कांग्रेस ने इसे बढ़ाकर 51 हजार रुपये करने का ऐलान किया था. लेकिन ये भी सिर्फ घोषणा साबित हुई. नवविवाहित लड़कियों को वो 25 हजार की रकम भी नहीं मिली जो पिछली सरकार के दौरान दी जा रही थी.
8. स्कूल-कॉलेजों में अतिथि शिक्षकों को नियमित करना – कमलनाथ सरकार इस वादे से पीछे हट गई. अतिथि विद्वान् और शिक्षक हड़ताल पर उतर आए. उनके प्रतिनिधिमंडल ने ज्योतिरादित्य सिंधिया से मुलाकात कर इस मुद्दे को उठाया था. सिंधिया ने भी इसे लेकर सरकार से सवाल पूछा था.
9. नर्सरी से पीएचडी तक लड़कियों को मुफ्त शिक्षा – चुनाव में कांग्रेस ने नर्सरी से पीएचडी तक लड़कियों को मुफ्त शिक्षा के अलावा 12वीं में 70 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप और कॉलेज जाने वाली लड़कियों को दुपहिया वाहन के लिए ब्याज सब्सिडी देने के वादे भी किए थे. वादा पूरा नहीं हुआ. कमलनाथ ने जवाब में कहा कि कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इन वादों पर अमल हो जाएगा. लेकिन नेतृत्व की अक्षमता के चलते कार्यकाल 15 माह में ही समाप्त हो गया.
10. तबादला उद्योग- अधिकांश विभागों में तबादलों का उद्योग शुरू हो गया जिससे सरकारी कर्मचारी नाराज हो गए. कमलनाथ सरकार के गिरने पर राज्य सरकार के कर्मचारी खुशी व्यक्त करते देखे गए. सरकार की आर्थिक दशा का हाल ये हो गया था कि कर्मचारियों को वेतन देने की समस्या खड़ी हो गई. कमलनाथ के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया में चुटकुला चला “सरकार का आखिरी ट्रांसफर : कमलनाथ वापस छिंदवाडा पहुँचे.”
11. ग्रामीण विद्यालय खाली- सरकार ने शिक्षा विभाग में अविवेकपूर्ण ढंग से तबादले किए. आज परिणाम ये है कि गांवों के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों का भारी अभाव पैदा हो गया है.
12. वसूली माफिया- व्यापारी, व्यवसायी, उद्योगपति “वसूली रैकेट” की शिकायत करते देखे गए. व्यवसाय जगत में ये बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका था.
13. शराब बेचकर खजाना भरने की तैयारी - जब खजाना खाली हो गया तो कांग्रेस सरकार ने शराब के ठेकों के “उपठेके” जारी करने का फैसला लिया. फिर उच्च न्यायालय में याचिका दायर हुई,और अदालत द्वारा रोक लगा दी गई. तब कमलनाथ ने महिलाओं के लिए अलग से शराब की दुकानें खोलने का फैसला किया. इन दुकानों पर विदेशी ब्रांड्स की शराबों को बिना टैक्स के बेचा जाने वाला था. इसके पीछे का खेल कमलनाथ ही जानें. कमलनाथ सरकार ने घोषणा की कि उनकी सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में वाइन फेस्टिवल भी आयोजित करेगी. इस पर शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट किया था कि लगता है कि कुछ दिनों में कमलनाथ सरकार मध्यप्रदेश का नाम बदलकर 'मदिराप्रदेश' कर देगी.
14. बिजली का झटका – केजरीवाल के बिजली-पानी स्टंट का चमत्कार कांग्रेस को भी लुभा गया. बिजली सब्सिडी शुरू हो गई, लेकिन इसके चलते जल्दी ही सरकार का आर्थिक संकट और गहरा गया.
ये सारे मुद्दे कमलनाथ को विधानसभा में बहुत भारी पड़ते. आजके सोशल मीडिया के जमाने में जब सदन कार्रवाई की विडियो क्लिप्स मिनटों में वायरल हो जाती हैं, कमलनाथ ने इस्तीफा देकर पिंड छुड़ाने का विकल्प चुना.
काम न आई चालबाजी....
विधानसभा स्पीकर एनपी प्रजापति कांग्रेस के हैं, इसलिए कोरोना के नाम पर चंद दिन और सत्ता के गलियारों में जमे रहने की जुगत भिड़ाई गई, लेकिन अदालत ने झटका दिया और विधानसभा में फ्लोर टेस्ट करवाने का आदेश दिया. सिंधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफा दे देने से सदन का आकार छोटा हो गया था और सरकार अल्पमत में आ गई थी. स्पीकर ने मामले को लटकाने के लिए बागी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार नहीं किए और कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी अदालत में दलील दे रहे थे कि फ्लोर टेस्ट की माँग करना स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में दखल है. इस पर न्यायालय ने कहा कि “बागी विधायकों के त्यागपत्र पर (स्पीकर द्वारा) फैसला न लेने की स्थिति में फ्लोर टेस्ट में देरी नहीं की जा सकती. हमने देरी करने की इजाज़त कभी नहीं दी. हॉर्स ट्रेडिंग (खरीद फरोख्त) रोकने के लिए तुरंत फ्लोर टेस्ट करवाया जाए.” इसके पहले राज्यपाल ने भी कमलनाथ सरकार और स्पीकर से कहा था कि सदन में बहुमत परीक्षण करवाया जाए, लेकिन स्पीकर ने इस निर्देश की अवहेलना की और कोरोनावायरस के नाम पर विधानसभा स्थगित कर दी (जबकि कांग्रेस विधायक दल की बैठक यथावत हुई, उसे कोरोना से ख़तरा नहीं था ). सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर के फैसले को अनुचित मानते हुए राज्यपाल के आदेश पर अपनी मुहर लगाई.
नहीं चल पाई “व्हिप” की चाल....
स्पीकर द्वारा बागी विधायकों का इस्तीफा स्वीकार न करने के पीछे एक सोची समझी रणनीति थी. जब तक स्पीकर इन बागियों का इस्तीफा स्वीकार नहीं करते तब तक ये विधायक तकनीकी रूप से कांग्रेस के ही सदस्य कहलाते. ऐसी स्थिति में जब कांग्रेस अपने विधायकों के लिए व्हिप जारी करती तो बागियों के लिए भी उसका पालन करना अनिवार्य होता. जब ये विधायक कांग्रेस के समर्थन में वोट नहीं करते तो पार्टी व्हिप उल्लंघन के चलते उन्हें अयोग्य करार दे दिया जाता. अदालत ने इस पर आपत्ति जताते हुए अभिषेक मनु सिंघवी से कहा “अगर आपने इस्तीफा नामंजूर किया तो ये विधायक व्हिप से बंध जाएंगे और आप उन्हें अयोग्य करार दे सकते हैं. इसे रोका जाना चाहिए.” जब अदालत ने दो टूक फैसला दे दिया और अगले दिन 20 मार्च को फ्लोर टेस्ट की ठहर गई, तो स्पीकर ने सभी 22 बागियों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए, भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने विधायकों को व्हिप जारी कर दिए. रात डेढ़ बजे मत विभाजन के लिए कार्यसूची जारी हुई. सुबह सारे अखबार अदालत के फैसले और होने जा रहे फ्लोर टेस्ट की खबर से रंगे हुए थे. तभी खबर चलनी शुरू हो गई थी कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया है.