छत्तीसगढ़: कांग्रेस की विश्वविद्यालय पर कब्जे की जंग
   दिनांक 26-मार्च-2020
 संजय द्विवेदी
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर का नाम बदलने की छत्तीसगढ़ सरकार की कोशिशों ने विवादों का एक नया पिटारा खोल दिया है। पंद्रह वर्ष सत्ता में रहने के दौरान भाजपा अगर नेहरू परिवार के सभी लोगों के नाम पर स्थापित संस्थानों का नाम बदल देती तो कांग्रेस को कैसा लगता ?

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भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी के करकमलों से प्रारंभ हुए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर का नाम बदलने की छत्तीसगढ़ सरकार की कोशिशों ने विवादों का एक नया पिटारा खोल दिया है। विश्वविद्यालय से कुशाभाऊ का नाम हटाकर चंदूलाल चंद्राकर का नाम जोड़ने का फैसला विश्वविद्यालय से जुड़े हर पक्ष को उद्वेलित कर गया। यही नहीं देश के बुद्धिजीवी,लेखक, राजनेता, शिक्षाविद् इस कुटिल और राजनीतिक अशिष्टता भरे फैसले के विरुद्ध सामने आ गए हैं। वे इसके परिणामों के बारे में भी चेताने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने तो मुख्यमंत्री से साफ पूछा कि “पंद्रह वर्ष सत्ता में रहने के दौरान भाजपा अगर नेहरू परिवार के सभी लोगों के नाम पर स्थापित संस्थानों का नाम बदल देती तो कांग्रेस को कैसा लगता?” यानी यह विवाद यहीं थमने वाला नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि “पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलकर प्रदेश सरकार ने शैक्षणिक जगत में भी अपने राजनीतिक दुराग्रह का परिचय देकर गलत परम्परा की शुरुआत की है।” यानी तलवारें खिंच चुकी हैं।
यह चौंकाने वाली बात है कि माओवादी आतंकवादियों के हमले में छत्तीसगढ़ की जमीन लहूलुहान हो रही थी, पिछले हफ्ते 17 जवानों की लाशें गिन चुकी प्रदेश सरकार माओवादी आतंक और करोना की वैश्विक विपदा से जूझने के बजाए अपनी कैबिनेट की बैठक में विश्वविद्यालयों के नाम बदलने पर विमर्श कर रही थी। सरकार शायद ‘मानसिक करोना’ की शिकार थी, इसलिए सामने मौजूद संकटों पर विचार कर जनता को राहत देने के बजाए विश्वविद्यालयों पर राजनीतिक शिकंजा कसने के लिए राज्यपाल के अधिकारों की कटौती करने की जुगत भिड़ा रही थी।
नाम से क्या होगा
लोगों को इंतजार था इस कैबिनेट से जनता को राहत देने वाले कुछ फैसले सामने आएंगे लेकिन सूचना आई कि दो विश्वविद्यालय के नाम बदलने का प्रस्ताव पास हुआ है और कुलपतियों की नियुक्ति में अब राज्य सरकार की स्वीकृति अनिवार्य होगी। यह सीधे तौर पर राज्यपाल के अधिकारों और कुलाधिपति के नाते उनकी शक्तियों में हस्तक्षेप था। लेकिन जिस सूचना ने देश भर के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और लेखकों को आंदोलित कर दिया वह थी कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर का नाम बदलकर श्री चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर किया जाना। इसके साथ ही दुर्ग के कामधेनु विश्वविद्यालय का नाम बदलकर बासुदेव चंद्राकर के नाम पर किया गया। वासुदेव चंद्राकर दुर्ग जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं।
जहां तक चंदूलाल चंद्राकर की बात है वे दुर्ग जिले से पांच बार कांग्रेस के सांसद, राष्ट्रीय महासचिव, प्रवक्ता, मप्र कांग्रेस के अध्यक्ष और दो बार केंद्र सरकार में राज्य मंत्री भी रहे। वे ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के संपादक भी रहे। राज्य सरकार के इस फैसले ने साबित कर दिया है विश्वविद्यालय का नाम चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर रखकर वह उनके नाम को विवादों में ही डाल रही है। मुख्यमंत्री भूपेश बधेल एक बड़ी लकीर खींच सकते थे किंतु लगता है उन्हें चंदूलाल जी का सम्मान नहीं, तपस्वी राजनेता कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाना ज्यादा प्रिय लगा होगा। मृत्यु के बाद कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता पूरे समाज का होता है। राजनीतिक आस्थाओं के नाम पर उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। समाज के प्रति उसका प्रदेय सब स्वीकारते और मानते हैं। शायद स्वयं चंदूलाल जी यह पसंद नहीं करते कि उनकी स्मृति में ऐसा काम हो, जिसके लिए किसी का नाम मिटाना पड़े।
राज्य के लोग मानते हैं कि कुशाभाऊ जी एक सात्विक वृत्ति के राजनीतिक नायक थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की अहर्निश सेवा की। उनका नाम एक विश्वविद्यालय से हटाकर उसी अतिवाद को पोषित किया जा रहा है जिसके तहत कुछ लोग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदलने की बात करते हैं। नाम बदलने की प्रतियोगिता अगर शुरू हुई तो यह कहां जाएगी कहा नहीं जा सकता। यह देश की संस्कृति नहीं है। राज्य के बुद्धिजीवी वर्ग की साफ राय है कि भूपेश सरकार और कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि सत्ता आजन्म के लिए नहीं होती। काल के प्रवाह में पांच साल कुछ नहीं होते। कल अगर कोई अन्य दल सत्ता में आकर चंदूलाल जी का नाम इस विश्वविद्यालय से फिर हटाए तो क्या होगा ? हम अपने नायकों का सम्मान चाहते हैं या उनके नाम पर राजनीति यह आपको सोचना है। इस बहाने शिक्षा परिसरों को हम अखाड़ा बना ही रहे हैं, जो वस्तुतः अपराध ही है। जाने माने साहित्यकार श्री कैलाश चंद्र पंत का कहना है कि “इस कदम से न तो चंदूलाल जी का मान बढ़ा और न ही ठाकरे जी जैसे निस्पृही राजनेता का सम्मान घटा। मुख्यमंत्री के मन का घटियापन जगजाहिर हो गया।”
राजनीतिक सौजन्य को तिलांजलि
तथ्य यह हैं कि डा. रमन सिंह की सरकार ने राज्य में तीन विश्वविद्यालय साथ में खोले थे स्वामी विवेकानंद टेक्नीकल विश्वविद्यालय, पं. सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय। इनमें सुंदरलाल शर्मा आजन्म कांग्रेसी रहे, जिनसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी प्रभावित थे। इससे क्या डा. रमन सिंह का कद घट गया। चंदूलाल चंद्राकर जी के नाम पर जनसंपर्क विभाग के पुरस्कार दिए जाते रहे, पंद्रह साल राज्य में भाजपा की सरकार रही तो क्या भाजपा ने उनके नाम पर दिए जा रहे पुरस्कारों को बंद कर दिया। नायक मृत्यु के बाद राजनीति का नहीं, समाज का होता है। तत्कालीन रमन सरकार ने इसी भावना को पोषित किया। इसके साथ ही महाकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए राजनांदगांव में डा. रमन सिंह ने जो कुछ किया, उसकी देश के अनेक वामपंथी साहित्यकारों ने सराहना की। इसी तरह मध्यप्रदेश में स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी को घोषणा को क्रियान्वित करने का काम भाजपा की सुंदरलाल पटवा सरकार ने किया और भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय हुआ। माखनलाल जी भी आजादी के बाद कांग्रेस के मध्यप्रदेश में अध्यक्ष रहे। किंतु महापुरुष विचारधारा के नहीं, समाज के होते हैं। इस तरह की सौजन्य की भूमि पर यह राजनीतिक कटुता और तमाशे निराश करते हैं। सवाल उठता है कि क्या हम अपने नायकों को भी दलगत राजनीतिक का शिकार बन जाने देगें। छत्तीसगढ़ के साहित्यकार गिरीश पंकज कहते हैं- “यह नाम बदलना नहीं है, यह एक तरह से बदला लेना है। इसलिए बेहतर तो यही होता कि कांग्रेस सरकार उदारता दिखाती और कुशाभाऊ ठाकरे के नाम से ही विश्वविद्यालय चलने देती। ऐसा नहीं है कि भाजपा सरकार ने पहले से चल रहे किसी विश्वविद्यालय का नाम बदलकर कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर कर दिया।एक नया विश्वविद्यालय बना, तो उसका नाम उन्होंने अपने पितृपुरुष की स्मृति में रख दिया।”
विश्वविद्यालय में कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में ठाकरे जी की प्रतिमा भी स्थापित है। अनेक वर्षों में सैकड़ों विद्यार्थी यहां से अपनी डिग्री लेकर जा चुके हैं। उनकी डिग्रियों पर उनके विश्वविद्यालय का नाम है। इस नाम से एक भावनात्मक लगाव है। 25 जनवरी, 2005 को छत्तीगढ़ विधानसभा के एक्ट से बने इस विश्वविद्यालय के साथ लंबे समय से कुछ ठीक नहीं हो रहा है।
खिसियाहट से बनी नापाक योजना
इस मामले के पीछे राज्य सरकार की खिसियाहट साफ समझी जा सकती है। सत्ता में आने के बाद अपने नासमझ सलाहकारों की राय पर बघेल सरकार ने विश्वविद्यालय के अधिनियम को बदल दिया और कुलपति की नियुक्ति के लिए 20 वर्ष पत्रकारिता के अनुभव को प्रमुख बना दिया। इसके पहले 10 साल तक प्रोफेसर के पद पर रहना अनिवार्य नियम था। जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित है। बताया जाता है कि राज्य सरकार किसी वामपंथी पत्रकार को यहां बिठाना चाहती थी। कुलपति चयन समिति में कुलदीप चंद्र अग्रिहोत्री, ओम थानवी और एक सरकारी अफसर शामिल थे। राज्यपाल ने पैनल में पहले क्रम के नाम प्रो. बल्देव भाई शर्मा के नाम पर मुहर लगा दी। शर्मा की छवि एक भारतीयता के पोषक पत्रकार के रूप में है। वे दैनिक भास्कर, अमर उजाला, स्वदेश, पांचजन्य जैसे संस्थानों के संपादक भी रह चुके हैं और हाल तक नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष भी रहे।
शर्मा की कुलपति पद पर नियुक्ति से सरकार और उसके चतुर सुजान सलाहकार सकते में आ गए और बदला भंजाने की मानसिकता में लग गए। अपने स्वभाव के अनुसार मुख्यमंत्री इस झुंझलाहट को छिपा नहीं सके और कहा “राज्यपाल ने अपना काम किया अब हम अपना काम करेंगे।” इसी खिसियाहट में विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तन और राज्यपाल के अधिकारों में कटौती के सूत्र खोजे जाने लगे। 2005 में स्थापित यह विश्वविद्यालय आज भी अव्यस्थाओं से जूझ रहा है। यहां 60 एकड़ जमीन में परिसर तो बना है किंतु छात्रों की संख्या आज भी 500 तक नहीं पहुंची। कुल सात अध्यापकों के भरोसे यहां 6 विभाग चलाए जा रहे हैं। ऐसे में इस संस्था को शक्ति देने, संसाधन देने के बजाए विवादों में लाया जा रहा है। एक बीमार संस्था को स्वस्थ करने के बजाए मुख्यमंत्री चंदूलाल चंद्राकर जैसे बड़े कद के कांग्रेस नेता के नाम पर इसे समर्पित करना चाहते हैं। इससे समझा जा सकता है कि उनके मन में चंद्राकर के लिए इज्जत कम भाजपा के पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे का नाम हटाकर विवाद खड़े करने की मंशा ज्यादा है। सरकार के कुछ नादान समर्थक कह रहे हैं कि पत्रकारों की मांग पर ऐसा किया गया जबकि इस प्रायोजिकता का कोई मूल्य नहीं है, इसे सब जानते हैं।
गांधी परिवार पर हमले के लिए अवसर
बताया जाता है कि मुख्यमंत्री अपने कुछ वामविचारी सलाहकारों की सलाह पर काम करते हैं और उनका खुद का कोई विचार नहीं है। जबकि उनके‘विद्वान सलाहकार’ मुख्यमंत्री जी को सच नहीं बताएंगे क्योंकि उनकी प्रेरणाभूमि भारत नहीं है, नेहरू और गांधी नहीं हैं। प्रतिहिंसा और विवाद पैदा करना उनकी राजनीति है। आज वे कांग्रेस के मंच पर आकर यही सब करना चाहते हैं, जिसके चलते उनकी समूची वामपंथी विचारधारा पुरातात्विक महत्त्व की चीज बन गयी है। वे मुख्यमंत्री जी को यह नहीं बताएंगें कि ऐसे कृत्यों से आपकी सरकार गांधी- नेहरू परिवार के अपमान के लिए नई जमीन तैयार कर रही है। देश में अनेक संस्थाएं पं. जवाहरलाल नेहरू,श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री फिरोज गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री संजय गांधी के नाम पर हैं। इस बहाने गांधी परिवार के राजनीतिक विरोधियों को इनकी गिनती करने और मृत्यु के बाद इन पर हमले करने का अवसर मिलेगा। यह एक ऐसी गली में प्रवेश है, जहां से वापसी नहीं है। छत्तीसगढ़ के अनेक नायकों के लिए सरकार को कुछ करना चाहिए। पं. माधवराव सप्रे,कवि-पत्रकार-राजनेता श्रीकांत वर्मा,सरस्वती के संपादक रहे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रंगकर्मी सत्यदेव दुबे जैसे अनेक नायक हैं. जिनकी स्मृति का संरक्षण जरूरी है। लेकिन यह काम किसी का नाम पोंछकर नहीं होना चाहिए। अब कांग्रेस के नेता तर्क दे रहे हैं कि कुशाभाऊ ठाकरे का पत्रकारिता से क्या लेना देना। जवाब में भाजपा छत्तीसगढ़ के मुखपत्र ‘दीपकमल’ के संपादक पंकज झा पूछते हैं “राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड और इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार क्या राजीव के खेल योगदान और इंदिरा जी के पर्यावरण क्षेत्र में योगदान के लिए नामित हैं। वे यह भी पूछते हैं कि ऐसी तमाम संस्थाएं जिनके नाम से बनी हैं जिससे उनका लेना- देना नहीं है तो क्या सबको बदला जाएगा। फिर तो सिर्फ हवाई अड्डों के नाम ही राजीव गाँधी के नाम पर लिखे जा सकेंगे, क्योंकि वे पायलट थे।” खैर यह ऐसी बहस है जिसका अंत नहीं किंतु इस बहाने कांग्रेस सरकार की कटुता, वैमनस्य और राजनीतिक विद्वेष की तीक्ष्णता सबके सामने आ गयी है, जिसका छत्तीसगढ़ की राजनीति में हाल फिलहाल कोई उदाहरण देखे नहीं मिलेगा।