कोरोना से बड़ी आफत हैं पाक फौज और उसके प्यादे
    दिनांक 27-मार्च-2020
कोरोना पाकिस्तान की कमर तोड़ सकता है, और जिस हलके तरीके से इमरान और पाक फौज मामले को ले रहे हैं, ये बड़ी मानवीय त्रासदी बन सकती है.कश्मीर कोरोना पर हावी है. फौज और हाफ़िज़ सईद मुल्क चला रहे हैं, इमरान कटोरा लेकर सारी दुनिया में घूम रहे हैं.

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कोरोना के शक में शिया समुदाय के लोगों को टेंटों में रहने को किया जा रहा मजबूर।
इमरान खान पर, 10 माह तक उनकी बेगम रहीं रेहम खान, ने आदतन नशेड़ी होने का आरोप लगाया था. रेहम के अनुसार इमरान कोकेन, एक्सटेसी जैसे मादक पदार्थों की भारी मात्रा का सेवन करने के आदि हैं. आज पाकिस्तानियों को ये महसूस होने लगा है पाकिस्तान की गाड़ी बहकते हाथों और धुंधली नज़रों के साथ एक अंधी खाई में उतर रही है.
ताजा खबर ये है कि जब कोरोना के खिलाफ कमर कसती दुनिया पूर्ण लॉकडाउन कर रही है, उस वक्त इमरान और उनके फौजी सुल्तान “अगर-मगर, किन्तु-परन्तु” में उलझे हैं. कोरोना मरीजों की सरकारी संख्या (25 मार्च तक एक हज़ार) भी बढ़ती जा रही है. वास्तविक संख्या तो इमरान ही जानें. मौत के आंकड़े आने शुरू हो गए हैं. उधर इमरान वो कर रहे हैं, जो करने में पाकिस्तान के सभी हुक्मरान और फौजी जनरल सदा से अव्वल रहे हैं. इमरान कोरोनावायरस के नाम पर अपना कटोरा लेकर दुनिया के सामने हाजिर हैं. ये एक ऐसा तंत्र है जो सब कुछ बेचना जानता है. ये जिहाद बेचकर डॉलर और पेट्रो डॉलर कमाना जानते हैं. अब ये कोरोना के नाम पर लाशें बेचने चले हैं. तक़रीर ये कि, दुनिया में अगर शराफत है तो हमारे क़र्ज़ का ब्याज माफ़ करे, क़र्ज़ माफ़ करे. वो क़र्ज़ जो पाकिस्तान के आवाम के नाम पर लेकर, चुराई गई और कुछ भीख में मिली तकनीक से एटमबम बनाने में, संसार के भ्रष्टतम फौजी तंत्र को पोसने में और भ्रष्टाचार में खर्च किया गया है.
मरने के लिए छोड़ दिया.....
ईरान में कोरोना कहर बरपा रहा है. 25 मार्च तक 25 हजार मामले और दो हजार के लगभग मौतें हो चुकी थीं. कुछ हफ़्तों से ईरान की सीमा पर तम्बू तने हुए हैं. ये कोरोना शिविर (क्वारंटाइन कैम्प) हैं. वीरान रहने वाले इस खुश्क और बेहद ठंडे इलाके में महिलाएं-बच्चे और पुरुष अमानवीय हालात में मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं. हथियारों से लैस फौज इन्हें यहां से हिलने भी नहीं दे रही है. ये लोग पाकिस्तान के शिया हैं जो जियारत (तीर्थ) करने ईरान जाते हैं. वापस लौटने पर उन्हें यहीं रोक लिया गया है.लोगों के टेस्ट नहीं हुए, केवल ईरान से लौटने के जुर्म में ये लोग यहां गिरफ्तार हैं, और घबराए हुए हैं कि उन्हें कोरोना न पकड़ ले. हालात काबू से बाहर हैं. जांच-इलाज तो दूर दिन में एक बार इन लोगों को पानी नसीब हो जाए तो बड़ी बात है. इनके मरने जीने से न फौज को फर्क पड़ता है न इमरान को. उधर इमरान बार-बार दोहराए चले जा रहे हैं कि “हम गरीब मुल्क हैं, लॉकडाउन करने की हमारी हैसियत नहीं है.लोग भूखे मर जाएंगे ” कराची को लॉकडाउन किया गया है. पंजाब के चंद शहर, ढील-ढाले लॉकडाउन के साथ तबाही की ओर बढ़ रहे हैं. जिन थोड़े से लोगों को कोरोना के भयंकर खतरे की समझ है वो बेचैन हो रहे हैं. इमरान, खाकी की सरपरस्ती में, चापलूसों से घिरे बैठे हैं, और अपनी नई “पीर” बेगम के टोटकों में व्यस्त हैं.
नाकारा वजीर ए आज़म और पिंडी की बादशाहत
“हम पावर में आये तो किसी से इमदाद (मदद) नहीं मांगेंगे... हमें शर्म आनी चाहिए कि दुनियाभर में पाकिस्तान पैसे मांगता घूमता है... हम हाथ नहीं फैलाएंगे..” ये डायलॉग इमरान खान के चुनावी भाषणों का अनिवार्य हिस्सा हुआ करते थे. थोड़े से पाकिस्तानियों ने इसे गंभीरता से लिया, बाकी फौजी आकाओं के रहमो-करम से हो गया. इमरान खान पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री बन गए. फौज ने अपनी अब तक की सबसे अच्छी कठपुतली को गद्दी पर बिठा दिया था. सत्ता में आते ही इमरान को आटे-दाल का भाव समझ आ गया और उन्होंने तत्काल अपने पूर्ववर्तियों का कटोरा झाड़-पोंछकर निकाल लिया. चीन, अमेरिका, सउदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, जो सामने आया झोली फैला दी. कहीं से कुछ टुकड़े मिले और कहीं से दुत्कार. इधर पाकिस्तान की माली हालत बिगड़ती चली गई.
इमरान खान नियाज़ी को वज़ीर ए आज़म बनने का शौक चढ़ा और सालों तक हाथ-पैर मारते रहे. फिर उनके भाग से छींका फूटा. हुआ यूं कि रावलपिंंडी वाले, नवाज़ शरीफ को पूरी तरह निपटाने में लगे थे. शरीफ सींखचों के पीछे थे. फौज ने शरीफ का इंतजाम तो कर दिया था लेकिन वो ये नहीं चाहती थी कि नवाज़ के मैदान से हटने का फायदा आसिफ अली ज़रदारी उठा ले जाएं. पाक फौज दोनों पार्टियों, पाकिस्तान मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी, को गद्दी से दूर रखने का ठान चुकी थी, क्योंकि उसे न शरीफ खानदान पर भरोसा था न भुट्टो वंश पर ऐतबार. दोनों ही दलों का नेतृत्व कश्मीर पर वैसा कठोर रुख नहीं दिखा रहा था जितना फौज चाहती थी. भारत से बेवजह उलझते रहना ठीक नहीं, इस प्रकार की सोच दोनों खेमों से यदा-कदा निकलकर बाहर आ जाती थी. शरीफ और भुट्टो खानदान अपने कद के कारण फौज को कभी-कभार नज़र अंदाज़ करने की हैसियत भी रखते हैं. इसलिए फौज ने इमरान खान नियाज़ी को उबारने का फैसला किया.
प्यादे का चुनाव

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इमरान बिकने को तैयार बैठे थे. पाकिस्तान इलेक्शन कमीशन को समझा दिया गया कि चुनावों में गड़बड़ी हो सकती है,“रॉ-मोसाद-सीआईए वगैरह मिलकर पाकिस्तान के आम चुनावों में दहशतगर्दी फैलाना चाहते हैं”, इसलिए चुनाव में हर बूथ पर फौज तैनात रहेगी, और फौज की तैनाती का तगड़ा किराया भी देना पड़ेगा. इस तरह पाक फौज ने हर बूथ पर वोटिंग अपने हिसाब से हो ये सुनिश्चित किया और उसके बदले में अरबों की कमाई भी की. स्वाभाविक है कि ये पैसा आवाम की जेब से निकाला गया और बदले में उसे दिया गया इमरान खान नियाज़ी.
इमरान को सत्ता के “एक चक्कर” का मज़ा चाहिए था. फौजियों को गुमान है कि वो पाकिस्तान चलाना जानते हैं, उन्हें बस अर्थव्यवस्था चलाने वाला आदमी चाहिए, जिसे दुनिया के सामने खड़ा करके पैसे ऐंठे जा सकें. जिससे भाषण दिलवाए जा सकें. इमरान उनकी बुद्धि को जंच गए. मशहूर प्लेबॉय रहे इमरान खुद को पठान बताते हैं और खैबर पख्तून ख्वा (केपीके) में पश्तूनों को रिझाने में कामयाब भी रहे थे. पश्चिमी जीवन शैली में रचे बसे इमरान ने इस इलाके के तालिबान समूहों, मध्ययुगीन इस्लामी कबीलों और पश्तो युवाओं को अपनी इस्लामी निष्ठा का भरोसा दिला दिया था. केपीके की सत्ता में आने के बाद अपने संकीर्ण प्रतिगामी फैसलों और तालिबान की वकालत के कारण वो तालिबान खान कहलाने लगे. फौज के लिए ये अच्छा मिश्रण था. ग्लैमर जगत को जानने वाला, पश्चिमी तौर तरीकों से वाकिफ, हर समझौता करने को तैयार सफाचट दाढ़ी-मूछ वाला तथाकथित पठान. केपीके ही वो प्रांत है जिसके लिए फौज को राजनैतिक पहल की ज़रूरत लगातार महसूस हो रही है, ख़ास तौर पर ऑपरेशन ज़र्ब ए अज्ब के बाद से, जिसने ये साबित कर दिया कि पश्तूनों में से तालिबान का जिन्न पैदा करना तो बहुत आसान था, लेकिन इस जिन्न को नियंत्रण में रखना असंभव है. शेष पाकिस्तान की फौज को चिंता नहीं है. पंजाब के लिए उसके पास हाफ़िज़ सईद और लखवी हैं. सिंध में उनके लिए सिर्फ नोट छापने वाला कराची मायने रखता है जिसे वो पाक रेंजर्स, तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान, सिपह ए सहाबा और आईएसआई की मदद से चला रहे हैं. बलूचिस्तान को संभालने के लिए उनके पास टैंक, तोपें और मशीनगनें हैं.
पिट गया प्यादा
पिंडी वालों ने सोचा था कि इमरान तिकड़म लगाकर यहां-वहां से कुछ जुगाड़ कर लेंगे. अर्थव्यवस्था चलती रहेगी. इमरान ने पाकिस्तान से वादा किया कि वो पाकिस्तान को “रियासत ए मदीना” जैसा बनाएंगे, और कुर्सी पर आने के बाद इमरान ने पाकिस्तान की माली हालत को सुधारने के लिए “रियासत ए मदीना “ के जमाने के ही नुस्खे निकालने शुरू किए. मुर्गियां, अंडे और गधे बेचने के उनके विचार पाकिस्तान के लिए कोई क्रांति पैदा नहीं कर सके. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था फिसलती जा रही है. इमरान जब आए थे तब बैंकों की ब्याज दरें 6.3 प्रतिशत थीं, अब 13 और 14 प्रतिशत हैं. इस ब्याज दर पर उद्योग व्यवसाय पनप नहीं सकते. जीडीपी गिर रही है. 1 डॉलर की कीमत 160 पाकिस्तानी रुपया हो गई है. हालात इतने खराब हैं कि सिर्फ एक महीने में 80 लाख नए लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए हैं. इमरान आईएमएफ के पास क़र्ज़ मांगने पहुंचे तो गारंटी के लिए आईएमएफ ने 55 हजार करोड़ रुपए की राजस्व वसूली करके दिखाने के लिए कहा. इमरान ने जोश के साथ “हां” कह दी लेकिन जल्दी ही समझ आ गया कि पाकिस्तान जैसी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था में, जहां आबादी में से सिर्फ 1 प्रतिशत करदाता हैं वहां यह लक्ष्य पाना असंभव है. इस पर भी जो पैसा आता है उसका ज्यादा से ज्यादा फौज डकार जाती है. फिलहाल तो फौज का खर्चा भी क़र्ज़ लेकर चलाया जा रहा है. जब ये लक्ष्य असंभव दिखा तो इमरान ने टैक्स दरें बढ़ा दीं, ताकि जो लोग टैक्स देते हैं उन्हें ही और निचोड़ा जाए, लेकिन इससे व्यापारी और उद्योग जगत हड़ताल पर उतर आया. अब आम पाकिस्तानी इमरान को गालियों से नवाज़ रहा है. मंहगाई आसमान छू रही है. जीडीपी से ज्यादा रफ़्तार से जनसंख्या बढ़ रही है. 50 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक शिक्षा नहीं ले पा रहे हैं. बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है. ये सब लोग जिहादी तंजीमों का चारा बनेंगे ये भी तय है.
"न लायकी है, न जज्बा..."
ऐसे में कोरोना पाकिस्तान की कमर तोड़ सकता है, और जिस हलके तरीके से इमरान और पाक फौज मामले को ले रहे हैं, ये बड़ी मानवीय त्रासदी बन सकती है. पाकिस्तान के एक टीवी चैनल की बहस इस बारे में बहुत कुछ बयान करती है. एक भागीदार क्रोध में बोल रहा है "एक आदमी महीने में 4 सौ लोगों को इन्फेक्ट करता है.. दुनिया लॉक डाउन कर रही है, इस मुल्क का पता नहीं क्या है, क्यों नहीं कर रहे हैं... क्यों भूखे मर जाएंगे? आप फौज को क्यों नहीं लगाते ? ..गरीब लोगों की चिंता है तो उनको महीने भर का राशन क्यों नहीं देते ? आप हालत देख रहे हैं इटली की..." दूसरा, कहता है "पैसा हो भी तो वो मैकेनिज़्म नहीं है इनके पास. लायकी नहीं है. वो जज़्बा नहीं है कि इससे लड़ सकें.. लॉकडाउन तो छोडिए, यहां तो आज भी शादियां हो रही हैं, ज़ायरीन (तीर्थयात्री ,ज़ियारत करने वाले ) नियाज़ बांट रहे हैं.. इस्लामाबाद में ये हो रहा है अभी भी बड़े बड़े आयोजन हो रहे हैं. चीफ जस्टिस की शपथ का भव्य समारोह हुआ,.. क्यों हुआ ?.. अकेले शपथ नहीं ले सकते थे ?... मंत्री खुद दफा 144 की धज्जियां उड़ा रहे हैं..”
कोरोना से पहले कश्मीर 
लेकिन इमरान, फौज की बीन पर डोल रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कोरोना पर बुलाई गई दक्षेस की बैठक में वो खुद नहीं शामिल हुए, और वहां भी अपने राज्य मंत्री द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठवाया. इप्सॉस नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने पाकिस्तान में एक बृहद सर्वेक्षण किया जिसमें मात्र 1 प्रतिशत पाकिस्तानियों ने कश्मीर को प्रमुख मुद्दा माना, जबकि शेष के लिए गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य-शिक्षा, आधारभूत ढांचा मुख्य मुद्दा था. अर्थात कश्मीर आम पाकिस्तानी के लिए कोई मुद्दा नहीं है, तब भी इमरान को कोरोना से ज्यादा कश्मीर की फ़िक्र है क्योंकि फौज ये चाहती है. दरअसल फौज की पाकिस्तान पर निर्बाध और सवालों से परे सत्ता, भारत विरोध या हिंदुओं के प्रति नफ़रत के आधार पर ही टिकी है. इसलिए कश्मीर कोरोना पर हावी है. फौज और हाफ़िज़ सईद मुल्क चला रहे हैं, इमरान कटोरा लेकर सारी दुनिया में घूम रहे हैं.