शक्ति आराधना का पर्व
   दिनांक 28-मार्च-2020
पूनम नेगी 
 
जैसे कोई शिशु अपनी मां के गर्भ में नौ महीने रहकर एक पूर्ण जीव के रूप में दुनिया में जन्म लेता है। वैसे ही नवरात्र काल की नौ दिवसीय साधना साधक को नवजीवन देती है। नौ दिन में देवी के नौ रूपों की आराधना मनुष्य को आत्म सिद्धि की अवस्था प्रदान करती है। आइए, नवरात्र पर करें देवी का आवाहन
 
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नवरात्र शक्ति के आवाहन का देवपर्व है। शक्ति के अवतरण के लिए आधारभूमि तैयार करने का दिव्य साधनाकाल। कलश स्थापना के साथ सुमधुर घंटा ध्वनि व धूप-बत्ती की सुगंध के साथ नौ दिन तक देवी दुर्गा की स्तुति के नवरात्र काल को अध्यात्म के क्षेत्र में मुहूर्त विशेष की मान्यता प्राप्त है। यह नौ दिवसीय विशिष्ट साधनाकाल मुख्यरूप से साल में दो बार आता है-चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक वासंतिक नवरात्र एवं आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्र। सनातन हिंदू संस्कृति में नवरात्र की संकल्पना बहुत सोच-विचार कर की गयी है। ऋतु परिवर्तन के बोधक चैत्र व आश्विन माह हमारी दो मुख्य फसलों रबी व खरीफ के उत्पादन के होते हैं। नयी कृषि उपज के हवन के द्वारा मां शक्ति की आराधना का विधान हमारे मनीषियों की अनुपम जीवन दृष्टि का परिचायक है। जहां प्रस्तुत वासंतिक नवरात्र से भारतीय नववर्ष (नव संवत्सर) का शुभारम्भ होता है, वहीं शारदीय नवरात्र में देशभर में दुगार्पूजा की धूम रहती है।
 
वैदिक दर्शन के अनुसार पदार्थ अपने मूल रूप में वापस आकर फिर से अपनी रचना करता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने नवरात्र को प्राणों का उत्सव माना है, जिसके द्वारा महिषासुर (जड़ता), शुम्भ-निशुम्भ (अहंकार और शर्म) और मधु-कैटभ (राग और द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है और मनोग्रस्तता (रक्तबीज), तर्क-वितर्क (चंड-मुंड) और कुदृष्टि (धूम्रलोचन) को केवल प्राण ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाकर ही दूर किया जा सकता है। प्रार्थना, उपवास, ध्यान और मौन के माध्यम से नवरात्र का पर्व जिज्ञासु को अपने सच्चे स्रोत की ओर यात्रा कराता है। प्रार्थना से मन निर्मल होता है, ध्यान के द्वारा अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर आत्म साक्षात्कार होता है, उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त होकर स्वस्थ होता है व मौन से हमारे वचनों में शुद्धता आती है। यह आंतरिक यात्रा मनुष्य के बुरे कर्मों का शमन करती है।
 
गायत्री महाविद्या के महामनीषी पं.श्रीराम शर्मा आचार्य ने नवरात्र की प्रासंगिकता की चर्चा करते हुए कहा है कि मानव की चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण; ये तीन प्रकार के गुण व्याप्त रहते हैं। जैसे कोई शिशु अपनी मां के गर्भ में नौ महीने रहकर एक पूर्ण जीव के रूप में दुनिया में जन्म लेता है, वैसे ही नवरात्र काल की नौ दिवसीय साधना साधक को नवजीवन देती है। कारण यह कि नवरात्र के नौ दिन मन, वाणी, कर्म तीनों में शुद्धता लाते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि राक्षसी प्रवृत्तियों का हनन कर यह साधनाकाल आत्मा, मन और शरीर का शोधन करता है। इससे उसकी आंतरिक प्रकृति के तीनों गुण सत्व, रज और तम में संतुलन आ जाता है। यह अवस्था परम आनंद की होती है। इससे जीवन का उद्देश्य साकार हो जाता है। इस देवपर्व की प्रासंगिकता उसकी इसी सदुपयोगिता में निहित है। इसलिए प्रत्येक सनातनधर्मी को नवरात्र की साधना करनी चाहिए।
जाने-माने आध्यात्मिक मनीषी जग्गी वासुदेव के मुताबिक नवरात्र के नौ दिन सत-रज और तम, इन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रह्मांड में सम को साधकर आनन्दित रहने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं। नवरात्र के पहले तीन दिन साधक अपने अंतस के तमोगुण को परखकर उनके विसर्जन को प्रस्तुत होता है वहीं अगले तीन दिन अपने जीवन में रजोगुण को विकसित करते हुए आखिरी के तीन दिन में अपनी आत्मा को सतोगुण से प्रकाशमान करता है। वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है। वे कहते हैं, नवरात्रकाल की नौ रातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि इनमें गहन सूक्ष्म ऊर्जा भरी होती है। मां दुर्गा के नौ रूप और हर नाम में एक दैवीय शक्ति को पहचानना ही नवरात्र उत्सव का मूल उत्स है। उन्होंने मां शक्ति के नौ रूपों की अद्भुत व्याख्या की है।

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शैलपुत्री
मां दुर्गा का पहला ईश्वरीय स्वरूप शैलपुत्री का है। शास्त्रों में शैलपुत्री का हिमराज हिमालय की पुत्री के रूप में उल्लेख है किन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—चेतना की सर्वोच्च अवस्था। जब हम किसी भी अनुभव या भावना के शिखर तक पहुंचते हैं तो दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव करते हैं। यही है शैलपुत्री का वास्तविक अर्थ।
ब्रह्मचारिणी
मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ऐसी ऊर्जा जो अनन्त में विद्यमान होकर भी सतत गतिमान रहती है। ब्रह्म अर्थात् वह जो सर्वव्यापक व सर्वज्ञ हो, जिसका न कोई आदि हो, न अंत। ब्रह्म के इसी स्वरूप में सतत निवास करने वाली शक्ति का नाम है ब्रह्मचारिणी।
चन्द्रघण्टा
देवी मां का तृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा साधक की मानसिक सुदृढ़ता की कारक शक्ति है। चन्द्रमा हमारे मन का प्रतीक है। सामान्य तौर पर मन चंचल व चलायमान होता है। प्राय: हम अपने मन से ही उलझते रहते हैं और नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने और अपने मन को साफ करने के लिये सतत संघर्ष करते रहते हैं। लेकिन समझना होगा कि हम कहीं भी चले जाएं, चाहे हिमालय पर ही क्यों न भाग जाएं; हमारा मन हमारे साथ ही भागेगा। कारण कि यह हमारी छाया के समान है। अत: इन विचारों से पीछा छुड़ाने के संघर्ष में न फंसें। चंद्र हमारी बदलती हुई भावनाओं का प्रतीक है, ठीक वैसे ही जैसे चन्द्रमा घटता व बढ़ता रहता है। एक अस्त-व्यस्त मन जो विभिन्न विचारों, भावों मंस उलझा रहता है, जब एकाग्र होकर ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तब उसके अंतस में ऊपर उठती हुई एक दैवीय शक्ति का उदय होता है जिससे हमारा अस्त-व्यस्त मन एकाग्रचित्त हो जाता है। यही है मां चन्द्रघण्टा का तत्वदर्शन।
कूष्माण्डा
शक्ति के चौथे ईश्वरीय स्वरूप कूष्माण्डा का संस्कृत में अर्थ है गोलाकार कद्दू। मगर यहां इसका आशय प्राणशक्ति से है। भारतीय परंपरा के अनुसार पूर्वकाल में कद्दू का सेवन मात्र ब्राह्मण, महाज्ञानी ही करते थे। कद्दू को सीताफल व गंगाफल के नाम से भी जाना जाता है। इसके गुण के बारे में ऐसा कहा गया है कि यह हमारी प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति को बढ़ाता है, प्राणों को अपने अंदर सोखता है, साथ ही प्राणों का प्रसार भी करता है। इसीलिए इसे धरती पर सबसे अधिक प्राणवान और ऊर्जा प्रदान करने वाली सब्जी कहा गया है। सम्पूर्ण सृष्टि गोलाकार कद्दू के समान है। इसमें हर प्रकार की विविधता पाई जाती है। छोटे से बड़े तक। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का संचार छोटे से बड़े में होता है। बीज से बढ़कर फल बनता है और फिर फल से दोबारा बीज हो जाता है। ऐसे ही जीव अपने जीवन में प्रचुरता और पूर्णता अनुभव करें, साथ ही सम्पूर्ण जगत के हर कण में ऊर्जा और प्राणशक्ति का अनुभव करें। इस सर्वव्यापी, जागृत, प्रत्यक्ष बुद्धिमत्ता का सृष्टि में अनुभव कराने वाली देवी को मां कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है।
स्कंदमाता
मां के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) की माता के नाम से जाना जाता है जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति के समन्वय की सूचक हैं। स्कन्दमाता वह दैवीय शक्ति हैं जो व्यावहारिक ज्ञान को सामने लाती हैं और उस ज्ञान को कर्म में बदलती हैं। स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत का प्रतीक हैं। समस्या या मुश्किल स्थिति में आपके ज्ञान का क्रियात्मक होना जरूरी होता है। स्कंदमाता कर्म व सही व्यावहारिक ज्ञान के सर्वोत्तम समन्वय की प्रतीक हैं।
 
 
कात्यायनी
देवी दुर्गा का छठा रूप मां कात्यायनी क्रोध के उस रूप का प्रतीक है जो सृष्टि में सृजन, सत्य और धर्म की स्थापना करता है। यह दिव्य रूप सूक्ष्म जगत में नकारात्मकता का विनाश कर धर्म की स्थापना करता है। ऐसा कहा जाता है कि ज्ञानी का क्रोध भी हितकर और उपयोगी होता है जबकि अज्ञानी का प्रेम भी हानिप्रद हो सकता है। इस प्रकार मां कात्यायनी क्रोध का वह रूप हैं, जो सब प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
 
कालरात्रि
मां शक्ति का सातवां कालरात्रि स्वरूप ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है।
 
महागौरी
देवी मां का आठवां महागौरी स्वरूप सौन्दर्य का उच्चतम प्रतिमान है। एक ओर मां कालरात्रि जो अति भयावह, प्रलय के समान हैं और दूसरी ओर पूर्ण करुणामयी देदीप्यमान मां महागौरी सबको आशीर्वाद देती हुईं। देवी महागौरी आपको भौतिक जगत में प्रगति के लिए आशीर्वाद देती हैं ताकि आप संतुष्ट होकर अपने जीवनपथ पर आगे बढ़ें।
 
सिद्धिदात्री
देवी का नवां सिद्धिदात्री स्वरूप हमें जीवन में अद्भुुत सिद्धि, क्षमता प्रदान करता है ताकि हम सब कुछ पूर्णता के साथ कर सकें। सिद्धि का अर्थ है विचार आने से पूर्व ही काम का हो जाना। आपके विचारमात्र से ही आपकी इच्छा का पूर्ण हो जाना सिद्धि है। सिद्धि हमें जीवन के हर स्तर में सम्पूर्णता प्रदान करती है। यही है देवी सिद्धिदात्री की महत्ता।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और राष्ट्रीय अस्मिता
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्रभक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले विदेशियों की तिथियों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्मगौरव खो बैठता है। यही वजह है कि हमारी सनातन संस्कृति में भारतीय नववर्ष की पावन तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इसके साथ हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान बेहद गहराई से जुड़ी है। भले ही दो सौ साल की गुलामी से उपजी अंग्रेज मानसिकता के कारण हम कागजों पर अंग्रेजों के ग्रेगेरियन कैलेण्डर का पालन कर रहे हों लेकिन इस सच को भी कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि हम भारतीयों के सभी सामाजिक उत्सव, पर्व-त्योहार व महापुरुषों की जयंतियां आज भी भारतीय कालगणना के हिसाब से ही मनायी जाती हैं।
 
आज से दो हजार वर्ष पहले भारत के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी थी। फिर उन्होंने कोंकण, सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध भाग के प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करवाकर राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोकर एक सशक्त व सुदृढ़ राष्ट्र की बुनियाद रख विक्रमी संवत् का शुभारंभ किया था।
 
सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल तक देश में इसी विक्रमी संवत के अनुसार राजकाज चलता था। बाद में भारत में मुगलों के शासनकाल के दौरान सरकारी क्षेत्र में हिजरी सन् चलता रहा। फिर अंग्रेजों के शासन के दौरान जो ग्रेगेरियन कैलेण्डर लागू हुआ वह आज भी हमारे यहां चल रहा है। यह जानना दिलचस्प होगा कि ग्रेगेरियन कैलण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्ष के अति अल्प समय को दर्शाती है जबकि यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की शुभ तिथि को सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए प्रथम भारतीय पांचांग की रचना की थी।