हिंगलाज की महिमा
   दिनांक 28-मार्च-2020
अरविन्द
 
बलूचिस्तान में हिंगलाज की पहाड़ियों पर स्थित हिंगलाज माता का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसकी महिमा ऐसी है कि यहां मुसलमान भी सिर नवाते हैं। कहते हैं कि यहां माता सती का शीश गिरा था

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बलूचिस्तान स्थित माता हिंगलाज मंदिर। 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है 
 
 
ओरमारा (हिंगलाज) से इफ्तिखार
 
बलूचिस्तान की धरती पर हिंदुओं का एक बड़ा तीर्थ है-हिंगलाज मंदिर। यहां हिन्दुस्थान से बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु माता के दर्शनार्थ आते हैं। यह माता सती से जुड़े 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिंगलाज माता को मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी माना जाता है। यहां मुसलमान भी बड़ी संख्या में जियारत करने आते हैं।
 
बलूचिस्तान की सबसे लंबी नदी है हिंगोल। 358 मील लंबी इस नदी का उद्गम सुराब घाटी के मुहाने से होता है जो लासबेला जिले के मकरान के उत्तर-पूर्व भाग तक जाती है। इसके बाद यह जमीन के अंदर के तमाम माध्यमों के जरिए अरब सागर में जाकर मिल जाती है।
 
अरब सागर के इसी इलाके में है हिंगोल नेशनल पार्क। हिंगलाज मंदिर इसी पार्क में है। हिंगोल नदी को अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। हिंगलाज मंदिर के पास से गुजरने पर यह अघोर कहलाती है। मंदिर के दोनों ओर हजार फुट ऊंची हारा की पहाड़ियां हैं। इन्हीं पहाड़ियों की बीच मिट्टी की प्राकृतिक गुफा में यह मंदिर स्थित है।
 
यहां खास तौर से हर साल मार्च-अप्रैल में लोग दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर की बार्इं ओर पक्के मुसाफिरखाने हैं, जहां लोगों के ठहरने की व्यवस्था है। माता के दर्शन कर चुके लासबेला के भक्त दास कहते हैं, ‘‘सती के आत्मदाह करने के व्यथित और क्रोधित भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे। तब दुनिया को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने शिव का मोह भंग करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। तब माता का सिर यहीं गिरा था। यहां माता विग्रह रूप में हैं।
हिंदुओं के लिए यह बहुत बड़ा तीर्थ है और सभी शक्तिपीठों में यहां की मान्यता सबसे अधिक है। नवरात्र के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। प्रकृति की सुरम्यता के बीच स्थित इस मंदिर में अलौकिकता का अनुभव होता है। माता हिंगलाज का ऐसा प्रताप है कि सच्चे दिल से जो भी मांगो, वे उसे पूरा करती हैं।’’ पहले मन्नत मांगने का तरीका थोड़ा अलग था। श्रद्धालुओं को मंदिर के सामने जलते अंगार पर चलते हुए मन्नत मांगनी होती थी।
 
इस शक्तिपीठ को मुसलमान ‘नानी का मंदिर’ कहते हैं। माता हिंगलाज को ‘नानी’ कहने के पीछे वजह शायद ईरान से इसका जुड़ाव है। बहुत पहले ईरान के लोग ‘ननईया’ नामक पीर की इबादत करते थे, जिनकी तस्वीर ईरान के सिक्कों पर मिलती है। वैसे भी, पुराने बलूचिस्तान का एक तिहाई हिस्सा ईरान में पड़ता है। इसलिए ईरान से सटे होने के कारण इन इलाकों का एक-दूसरे की परंपराओं पर काफी असर था।
 
भक्त दास बताते हैं कि मंदिर परिसर में ही एक ब्रह्मकुंड है। इसमें पानी कहां से आता है, कोई नहीं जानता। मान्यता है कि कुंड में नारियल फेंकने पर पानी में जो तरंग उठती है, उससे व्यक्ति के जीवन में आने वाले सुख-दुख का पता चलता है। गोलाकार तरंग का दायरा जितना बड़ा होगा, नारियल फेंकने वाले व्यक्ति के जीवन में उतनी ही अधिक खुशियां होंगी। लेकिन दायरा जितना छोटा होगा, उसके जीवन में उतना ही दुख होगा।
 
इस मंदिर के बारे में एक और मान्यता प्रचलित है। कहते हैं कि ‘नानी मंदिर’ में दर्शन के लिए आने वाले व्यक्ति की नीयत साफ होनी चाहिए, नहीं तो उसके साथ ऐसी कोई न कोई घटना घट जाती है जिससे उसे अपनी गलती का एहसास हो जाता है। मलिन मन के साथ आने वाले लोगों के साथ क्या-क्या हुआ, इससे भी जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। वे कहते हैं कि यह मंदिर औरतों का सम्मान करने का संदेश भी देता है।
 
भक्त दास कहते हैं, ‘‘बहुत साल पहले यहां एक रियासत थी। रियासत का राजा औरतों पर बहुत अत्याचार करता था। लेकिन वह देवी का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी भक्ति से देवी को प्रसन्न किया। जब देवी प्रकट हुर्इं तो उसने अमरता का वरदान मांगा, लेकिन देवी ने ऐसा वरदान देने से इनकार करते हुए कहा कि तुम ऐसा वर मांग सकते हो कि तुम्हारी मौत मुश्किल से आए।
तब उसने कहा कि मां मुझे ऐसा वर दो कि मेरी मृत्यु ‘नानी’ के हाथों ही हो, वह भी ऐसी जगह जहां रोशनी न पहुंचती हो। बाद में उसके अत्याचार से औरतों को बचाने के लिए ‘नानी’ ने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धरा। एक दिन राजा की निगाह उस रूपसी पर पड़ी और वह उसका पीछा करने लगा। देवी उसे एक गुफा में ले गर्इं और उसका वध कर दिया। इसी तरह, हिंगलाज माता से जुड़ी कई कथाएं और किंवदंतियां प्रचलित हैं। यह ऐसा जागृत तीर्थस्थल है जो न केवल लोगों की मनोकामनाएं पूरी करता है, बल्कि उनकी सोच को भी पवित्र करता है।’
 
हिंगलाज माता मंदिर कितना पुराना है, इस बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसकी मान्यता बहुत अधिक है। एक स्कूल शिक्षक मेहराब बेजेन्जो कहते हैं, ‘‘प्रकृति ने बलूचिस्तान को भरपूर संपदा से नवाजा है। यही नहीं, यहां हजारों साल पहले भी जो लोग रहते थे, वे भी सभ्य थे। मेहरगढ़ का इलाका बलूचिस्तान में ही है। यहां हुए उत्खनन से साबित हो चुका है कि आज से तकरीबन सात हजार साल पहले भी यह इलाका आबाद था।
 
यानी यहां की सभ्यता हड़प्पा और मोएंजोदरो से भी पुरानी है। इसी तरह, हिंगलाज माता का मंदिर कितना पुराना है, इसके बारे में हमने पता लगाने की कभी कोशिश नहीं की। आज हमारे पास तमाम नए तरीके हैं जिनसे किसी भी जगह के बारे में काफी-कुछ जाना जा सकता है। लेकिन जिस मुल्क में जहालत का ऐसा आलम हो कि हुकूमत बलूचिस्तान की संस्कृति को खत्म करने पर आमादा हो, वहां क्या उम्मीद की जा सकती है?’’
 
मंदिर में मुसलमानों के जियारत करने के बारे में मेहराब कहते हैं,‘‘बात जब हजारों साल पहले की हो तो जाहिर है, इसका मतलब यह इस्लाम के वजूद में आने से पहले से है। बुतपरस्ती को हराम बताने वाले लोग अगर नानी मंदिर में सिर नवाते हैं, लाल कपड़े बांधते हैं, चिराग रोशन करते हैं। इसकी जड़ें इस्लाम से पहले की उनकी रवायतों तक जाती हैं।
 
मुस्लिम शासकों ने तो कई बार इस मंदिर को नष्ट करने की कोशिशें कीं, लेकिन बलूचिस्तान के लोगों ने इसका विरोध किया और हर बार इसे नष्ट होने से बचाया।’’ बलूचिस्तान की धरती ने सभी का स्वागत किया है, चाहे वह किसी भी मत-पंथ या मजहब का हो। हिंगलाज माता मंदिर उसी संस्कृति का नमूना है। यह आईना है उस दौर का जब इस इलाके में रहने वाले अलग-अलग कबीलों के लोगोंके बीच यह एक-दूसरे की पहचान को बनाए रखने का एक विशेष स्थान था।