रविंद्र नगर के स्वयंसेवकों ने छेड़ी चीनी वायरस के खिलाफ जंग
   दिनांक 28-मार्च-2020
संघ स्वयंसेवकों द्वारा तराशे गए यूपी के लखीमपुर जिले में स्थित रविंद्र नगर गांव को आज किसी पहचान की जरूरत नहीं है। भारत सरकार सहित यूनीसेफ ने भी यहां के अनूठेपन पर डाक्युमेंट्री बनाई है। गांव के लोग जागरूक होकर चीनी वायरस के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं

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उत्तर प्रदेश स्थित लखीमपुर जिले में स्थित रविंद्र नगर गांव की आबादी 5 हजार के करीब है। लेकिन जब चारों तरफ आज अफरातफरी मची हुई है, लोग घरों में रह कर नेटफिल्कस पर फिल्में देख रहे हैं, शतरंज खेल रहे या अन्य मनोरंजन के साधन से अपना टाइम पास कर रहे हैं तब इस गांव के पुरुष और महिलाएं चीनी वायरस(कोरोना) को हराने की मुहिम में लगी हुई हैं।
सामान्य परिवार की यह महिलाएं सेनेटाइजर बना रही हैं, मास्क बनाकर बंटवा रही हैं, जनप्रतिनिधियों को जरूरत परक सामग्री उपलब्ध करा रही हैं और गांव के पुरुष उन सभी घरों की हर तरह की चिंताएं कर रहे हैं जिनके बच्चे कमाने के लिए बाहर हैं। ऐसे परिवारों को राशन से लेकर अन्य कोई असुविधा न होने पाए, कार्यकर्ता उन तक हर संभव मदद पहुंचा रहे हैं।
संघ ने बनाया इसे अनूठा गांव
रविंद्र नगर गांव को आज किसी पहचान की जरूरत नहीं है। भारत सरकार सहित यूनीसेफ ने भी यहां के अनूठेपन पर डाक्युमेंट्री बनाई है। लेकिन आज गांव के लोग अगर जागरूक होकर चीनी वायरस (कोरोना) के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं तो इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मेहनत है। संघ ने इस गांव को इतना तराशा कि आज यह गांव न केवल राज्य के लिए अपितु देश और समाज के लिए किसी मिसाल से कम नहीं है। दरअसल पिछले वर्ष फरवरी माह में ग्राम विकास की अखिल भारतीय बैठक इस गांव में आयोजित की गई थी। बैठक के मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने यहां तीन दिन तक प्रवास किया था।
लेकिन इस गांव को अनूठा गांव बनाने की कहानी 2008 से शुरू होती है जब लोकभारती के संयुक्त क्षेत्र संगठन मंत्री, उत्तर प्रदेश—उत्तराखंड श्री प्रेम शंकर अवस्थी का केंद्र गोला हुआ करता था; उस समय वह अवध प्रांत के ग्राम विकास प्रमुख थे। वे बताते हैं कि यह गांव आज मास्क या सेनेटाइजर बनाकर चीनी वायरस (कोरोना) से जंग लड़ रहा है तो इसके पीछे संघ का योगदान है। संघ कार्यकर्ता आज समय पर वह सब कर रहे हैं जिसमें समाज की भलाई है। लेकिन इसके पहले भी यह गांव कैसे अनूठा बने, उसके लिए बराबर प्रयत्नशील रहे हैं।
वह बताते हैं कि जब मेरा केंद्र गोला हुआ तो यह गांव भी संपर्क में आया। यहां संघ की शाखा पहले से ही चल रही थी। यहां अधिकतर वह हिन्दू परिवार रहते हैं जो 7 मई, 1965 को पूर्वी बांग्लादेश से विस्थापित होकर यहां आ गए। मैंने यहां धीरे—धीरे संपर्क बढ़ाना शुरू किया। उनमें देश—समाज के प्रति जागरूकता लाई। यकीनन इससे उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा।
मैंने ग्राम विकास की दृष्टि से कुछ प्रयोग किए जो सफल हुए और गांव का विकास होना शुरू हो गया। विभिन्न कार्यक्रम होने शुरू हो गए। गोमती यात्रा निकली तो गांव के लोगों ने बड़ी सहभागिता की। गोग्राम मंगल यात्रा में बड़ा अच्छा दृश्य तब दिखाई दिया जब बारिश के कारण यह तय हुआ कि गांव तक यह यात्रा नहीं जा पाएगी। तब गांव वालों ने कहा ऐसा नहीं होगा। यह यात्रा गांव में जरूर आएगी और हम इसे लेकर जाएंगे। इसके लिए गांव वालों ने तुरंत लगकर 3 किलोमीटर का रास्ता बनाया। यह अपने आप में अनूठी बात थी। इसी रास्ते से रथ गांव तक पहुंचा। इस रास्ते में भी रथ जब नहीं जा पा रहा था तो गांव के लोगों ने उसे डोली की भांति इसे अपने कंधों पर उठा लिया और गांव तक ले आए। गांव के लोगों की ऐसी भक्ति और समर्पण देखकर सभी को अच्छा लगा।
इसी बीच वर्ष 2016 में ग्राम संस्कृति उत्सव कराया गया। इसमें कनेरी मठ के महाराजश्री का आगमन हुआ। गांव के लोगों को ऐसे कार्यक्रमों के जरिए न केवल जागरूक किया गया बल्कि स्वरोजगार से लेकर देश—समाज के प्रति उनका क्या कर्तव्य क्या है, बताया जाने लगा। इससे बड़ा परिवर्तन आना शुरू हुआ। इस तरह के कार्यक्रमों और जागरण का फल यह हुआ कि गांव के लोगों ने सुबह प्रभातफेरी निकालना शुरू किया। यहां जो विद्यालय है, उसमें पढ़ाई लिखाई उत्कृष्ट हो, इसकी चिंता गांव के लोग करने लगे। आज इसका प्रतिफल है कि यह स्कूल राज्य के अच्छे विद्यालय में से एक है।
इसके अलावा प्रत्येक साल 72 घंटे का संकीर्तन होता है जो वर्षों से चला आ रहा है। यह संकीर्तन आनंदकारी हो, इसके लिए बाहर से भजन—कीर्तन करने वालों की टोली आती हैं और फिर इनके बीच प्रतियोगिता होती है। इसमें मृदंग, झांझ, डोलक, हरमोनियम, गीत—संगीत शामिल होता है। गांव के लोग गोशाला चलाते हैं जो अपने आप में अनूठी है। यह सब ग्रामीणें के सहयेाग से संपन्न होता है।
संघ अधिकारियों के प्रवास ने बदला लोगों का मन
वैसे तो 2008 से गांव को अनूठा बनाने का जतन संघ की ओर से चल रहा था और धीरे परिवर्तन भी आया। लेकिन ग्राम विकास की बैठक के बाद इसमें और परिवर्तन नजर आया। लोगों में जागरूकता आई। गांव में संघ के कार्यकर्ता तपन विश्वास बताते हैं कि यकीनन आज जो भी गांव में बदलाव नजर आ रहा है उसमें संघ की ही भूमिका है। उसके अथक प्रयासों ने गांव के लोगों का जीवन स्तर बदला है। आज यहां पर सिलाई—कढ़ाई केंद्र, स्वयं सहायता समूह, अंग्रेजी माध्यक स्कूल है। यहां के लोग इतने सजग हो चुके हैं कि गली—मोहल्ले तक गाय के गोबर से लेपन करते हैं, साफ—सफाई की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। सुबह के पाचं बजे गांव में प्रवेश करते ही घंटी, शंख की चहुंओर से आती आवाजें सुनाई देगी तो दूसरी ओर नौजवानों की व्यवस्थित शाखा लगती है। यह सब बातें इस गांव को अनूठा बनाती है।
चीनी वायरस(कोरोना) से लड़ने के लिए बनाई निगरानी समिति

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कैसे एक गांव उदाहरण बनता है, रविंद्र नगर से सीखना चाहिए। गांव के लोगों ने लॉक डाउन की घोषणा के बाद कोरोना से लड़ने के लिए निगरानी समिति का गठन किया है। इसके तहत पांच विभागों को कार्यकर्ताओं ने बनाया। अनुशासन विभाग,सुरक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, आपूर्ति विभाग, वित्त विभाग। हर विभाग में दस—दस स्वयंसेवक कार्य कर रहे हैं। सुरक्षा विभाग के लोगों ने खुद पर जिम्मेदारी लेकर गांव की चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी है। न कोई बाहर का यहां आ पाए और न गांव का बाहर कोई जा पाए, ताकि लॉक डाउन का सही पालन हो। इसी तरह अनुशासन विभाग में लगे कार्यकर्ता गांव के लोगों को जागरूक करते हुए संयम और स्च्छता से रहने की अपील कर रहे हैं और किसी की कोई समस्या है तो उसे सुलझा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कार्यकर्ता कार्यालय में हैं तो बाकी के लोग गांव में भ्रमण करते हैं। अगर इस दौरान किसी को स्वास्थ्य संबंधी समस्या है तो उसका निराकरण करना इनकी जिम्मेदारी है। आपूर्ति विभाग से जुड़े कार्यकर्ता गांव—घर में रसद की चिंता कर रहे हैं और वित्त विभाग से जुड़े कार्यकर्ता ऐसे लोगों को पहचान कर रहे हैं और उनको राहत पहुंचाने का काम कर रहे हैं जिनके सामने मुसीबत आन पड़ी है।