चीनी वायरस (वुहान) से दुनिया लॉकडाउन हवा हुआ प्रदूषण

    दिनांक 29-मार्च-2020   
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प्रदूषण को कम करने का जो कार्य अब तक सभी देश मिलकर भी नहीं कर पा रहे थे, आज कुछ समय के लिए ही सही,पर वह संभव हो रहा है, यह लॉकडाउन की स्थिति न केवल मानव जाति को चीनी वायरस (वुहान) से सुरक्षित कर रहा है, अपितु धरती को मानवों से भी

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इटली वेनिस की नहरों में लौटे हंस, साफ हुआ वेनिस की नहर का पानी
आजकल फ़ुर्सत ज़रा पहले से ज्यादा रहती है। अब सुबह नींद गाड़ियों के हॉर्न या निर्माण स्थल की ठक-ठक से नहीं बल्कि पक्षियों की आवाज़ से टूटती है। आसमान पहले से कुछ ज़्यादा साफ़ और नीला नज़र आता है। हालांकि यदि नवंबर 2019 में कोई मुझे कहता कि दिल्ली का एक्यूआई स्तर मार्च 2020 में 42 हो जाएगा, तो मैं उसका सिर सहला कर उसे आशावादी घोषित कर देती।
परंतु आज चीनी वायरस (वुहान) के चलते स्थिति कुछ भिन्न नज़र आ रही है। वुहान वायरस ने समग्र विश्व में भय और चिंता का वातावरण बना दिया है।इस वायरस से अब तक 28,000 से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है और लगभग 451,983 लोग अभी भी इस महामारी से संक्रमित हैं। भारत व कई अन्य देश इस महामारी से बचने के लिए लॉकडाउन में जा चुके हैं।
ऐसे में यदि इन दुर्भाग्य के काले बादलों में आशा की कोई सुनहरी किरण छिपी नज़र आ रही है, तो वह है पर्यावरण की सुधरती स्थिति। ऐसा केवल मेरा मानना नहीं है, अपितु भारत व विश्व के विभिन्न भागों में रह रहे लोगों ने पिछले कुछ दिनों में ऐसा महसूस किया है। बहुत से पर्यावरण विशेषज्ञों व संस्थानों का भी यही कहना है।
ऐसा कहा जा सकता है की पिछले कुछ समय से एक तिहाई विश्व लॉकडाउन में ही है। ऐसे में मोटर वाहनों का उपयोग घटा है। बहुत से कल-कारखाने बंद हुए है और हवाई जहाजों की सेवा भी कम हुई है। इसी कारण CO2 व NO2 जैसी गैसों की मात्रा घटी है और प्रदूषण में भी कमी आई है।
नासा द्वारा जारी की गयी एक सैटेलाइट इमेज के अनुसार जनवरी और फरवरी के बीच चीन से निकलने वाली NO2 गैस बहुत कम मात्रा में पायी गई।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर मार्शल बुर्के का इस पर कहना है कि,“इस आर्थिक व्यवधान की वजह से चीन में वायु प्रदूषण में कमी से, चीन में बीस गुना अधिक जान बची है, जो उस देश में वायरस के संक्रमण के कारण वर्तमान में हुई मौतों से बहुत अधिक है।” मार्शल की बात यदि आप समझ न पाये हों, तो शायद WHO का यह आंकड़ा आपकी मदद कर दे, जो कहता है कि प्रत्येक वर्ष वायु प्रदूषण से विश्व में 70 लाख लोगों की मृत्यु होती है।
यूरोप में भी प्रदूषण का स्तर इसी तरह से कम होता दिख रहा है। वहीँ न्यूयॉर्क में भी वाहनों के उपयोग में 35% कमी आने के कारण प्रदूषण 5-10% तक कम हुआ है। भारत की स्थिति कुछ अलग नहीं है। 23 मार्च को प्रयागराज का AQI 24 था। विशेषज्ञों ने बताया की पिछले कई दशकों में यह संगम शहर का सबसे कम AQI था।

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 उत्तराखंड में शहर की सड़कों पर टहलते दिखाई दिए हिरण
अर्थात् हम यह मान सकते हैं की प्रदूषण को कम करने का जो कार्य अब तक सभी देश मिलकर भी नहीं कर पा रहे थे, आज कुछ समय के लिए ही सही,पर वुहान वायरस के कारण वह संभव हो रहा है। और यह प्रभाव केवल वायु तक ही सीमित नहीं है। जल, जीव-जंतुओं पर भी इस लॉकडाउन का असर नज़र आ रहा है। एक तरफ पर्यटकों की कमी से वेनिस की मशहूर नहर साफ़ होती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ, इटली कोस्टलाइन में डॉलफिन की भी वापसी हुई है।
 जहां वुहान के लोगों का कहना है कि उन्होंने इतने वर्षों में पहली बार पंछिर्यों की आवाज़ सुनी है। वहीँ जापान के नारा पार्क में पर्यटक न होने की वजह से हिरण जापानी स्नैक सेनबई नहीं, बल्कि अपना असल खाना, घास खाते हुए पाये गए। आश्चर्य की बात यह है कि वहां के बहुत से लोगों को यह देख कर ताज्जुब हुआ। शायद सेनबई खिलाते-खिलाते वे भूल गए थे की हिरण का असली खाना क्या होता है।
भारत में भी ऐसे कुछ दृश्य सामने आये। दिल्ली एनसीआर के नोएडा के जीआईपी मॉल के एक सेक्टर के पास एक नील गाय और उत्तराखंड में कुछ हिरण सड़कों पर घूमते दिखाई दिए। लोगों ने इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किए। हालांकि ऐसे में कुछ वीडियो गलत जानकारी के साथ भी शेयर हो रहे हैं। जैसे कुछ दिनों से एक वीडियो में 1990 से न देखी गई क्रिटिकली एनडेंजर्ड मालाबार सीविट के होने का दावा किया जा रहा था, जब की वह एक इंडियन सीविट थी।
बात चाहे हमारे देश की हो, या पूरे विश्व की, एक बात साफ़ है। यह लॉकडाउन की स्थिति न केवल मानव जाति को वुहान वायरस से सुरक्षित कर रहा है, अपितु धरती को मानवों से भी।
मेरी मां मुझे बचपन से कहा करती है कि घर उसमें रहने वाले लोगों से बनता है और हम इंसान धरतीको अपना घर ही तो कहते हैं। ये कैसा घर है जो उसमें रहने वालों के न होने से ज़्यादा खुशहाल है?
कुछ तो गलती ज़रूर है हम इंसानों की। हम यह भूल जाते हैं कि इस घर में रहने वाले हम अकेले नहीं हैं। अगर हमें यहां रहना है, तो सभी प्राणियों के साथ मिलकर रहना सीखना होगा। आज फिर हमारे पास यह मौका है सोचने का, समझने का और अपनी गलती को सुधारने का।
( लेखिका पर्यावरण विज्ञान की छात्रा हैं )