चायनीज वायरस से ग्रस्त भारतीय मीडिया
   दिनांक 29-मार्च-2020
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देशविरोधी ताकतों का फर्जीवाड़ा बंद हो। चीनी पैसे पर चीन के दुष्प्रचार और फर्जी खबरें परोसने वालों पर हो कड़ी कार्रवाई

collage china_1 &nbs
जिस बात का डर था वही हुआ, चीन से फैली महामारी आखिरकार लगभग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले चुकी है। भारत में भी संकट बढ़ रहा है। महामारी से तो देश निपट भी लेगा, लेकिन असली महामारी वे अफवाहें हैं जिन्होंने इसे फैलाने में भरपूर सहायता की। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने जिस तरह की गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग की वह चिंताजनक है। अब तक हम राजनीतिक और सामाजिक मामलों में झूठी खबरें देखा करते थे। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि मीडिया का वही जाना-पहचाना वर्ग महामारी को लेकर भी फेक न्यूज फैला रहा है। यह खतरनाक स्थिति है, जिसके भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं। लेकिन शायद इसके पीछे की मंशा ही यही है कि अराजकता की स्थिति पैदा हो। एक तरफ झूठी खबरें और दूसरी तरफ चायनीज वायरस को लेकर चीनी दुष्प्रचार। यह साफ-साफ देखा जा सकता है कि कुछ भारतीय मीडिया समूह चीन के हितों की रक्षा में जोर-शोर से जुटे हैं। उन्हें इस बात की ज्यादा चिंता है कि इसे कोरोना वायरस कहा जाए, न कि चायनीज वायरस। क्या यह पत्रकारिता का धर्म नहीं है कि इस संकट के लिए जिम्मेदार षड्यंत्रों को उजागर किया जाए?
जिस चायनीज वायरस दुनिया भर में फैला वही अब झूठी खबरें भी फैला रहा है। इस अभियान का वाहक भारतीय मीडिया और पत्रकारों का एक बहुत बड़ा वर्ग बन रहा है। यह वह वर्ग है जो लंबे समय से कभी वामपंथ तो कभी कुछ दूसरे नामों से चीन की एजेंसियों द्वारा उपकृत होता रहा है। चीन की मीडिया ने एक झूठ फैलाया कि अभी तक यह साफ नहीं हो सका है कि वायरस कहां से फैला, हो सकता है कि इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई हो। हैरानी की बात यह रही कि यह दावा जस का तस भारतीय मीडिया में छा गया। इसे चीन के दावे के तौर पर नहीं, बल्कि नए खुलासे की तरह बताया गया। बात सिर्फ यहीं तक होती तो भी चल जाता। भारतीय मीडिया का यह वर्ग चीन की तरफ से धमकी देता हुआ भी दिखाई दे रहा है। आउटलुक पत्रिका ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख पोस्ट किया, जिसमें चेतावनी दी गई कि अगर भारत ने कोविड-19 को चायनीज वायरस कहने की कोशिश की तो उसे भारी नुकसान झेलना पड़ेगा और ये भारत के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती बनकर सामने आएगा। इस लेख में जो दलीलें दी गईं वे वही थीं जो आमतौर पर वामपंथी दुष्प्रचार तंत्र के पत्रकार हमेशा से देते रहे हैं। संक्षेप में यही कि ‘चीन एक महाशक्ति और आदर्श देश है और भारत की भलाई इसी में है कि उसकी हां में हां मिलाए’।
देश के खिलाफ कोई अभियान चल रहा हो और उसमें एनडीटीवी शामिल न हो ऐसा हो नहीं सकता। एनडीटीवी ने चीन के राजदूत का विस्तृत बयान दिखाया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि हमने न तो वायरस को बनाया और न ही इसे फैलाया। इस खबर की हेडलाइन जानबूझकर ऐसी रखी, ताकि लगे कि वह बयान किसी भारतीय अधिकारी ने दिया है। कुछ लोग मान सकते हैं कि चैनल की नीयत चीन के पक्ष को भी दिखाने की रही होगी, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। इस खबर में बड़ी सफाई से बताया गया कि चीन की ‘त्वरित कार्रवाई से बीमारी नियंत्रित हो गई है’।
यह रिपोर्ट एक तरह का विज्ञापन था कि भारत को भी अगर बीमारी को नियंत्रण में करना है तो वह चीन से मेडिकल किट आयात करे। साथ ही यह छिपी धमकी भी कि अगर भारत ने इसे चीनी वायरस कहने की हिम्मत की तो उसे ऐसा करना भारी पड़ सकता है। एनडीटीवी ने ही अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनीवर्सिटी के हवाले से झूठी रिपोर्ट दी कि ‘भारत में अगले कुछ हफ़्तों में 25 करोड़ लोग इस वायरस की चपेट में आने वाले हैं’। लेकिन पोल खुलने के बाद एक खेद जताने की औपचारिकता तक जरूरी नहीं समझी।
कई पत्रकारों ने ट्विटर और फेसबुक के जरिए यह लिखना शुरू कर दिया कि चायनीज वायरस नहीं बोला जाना चाहिए। एनडीटीवी की एक पत्रकार ने लिखा कि इसे चायनीज वायरस बोलना ‘नस्लवादी’ और ‘घृणित’ है। सवाल उठता है कि अपने देश को असहिष्णु और अंधविश्वासी बताने वाले ये पत्रकार चीन की छवि को लेकर अचानक इतने चिंतित क्यों हो उठे हैं? चीन ने पिछले कुछ साल में अपने यूसी ब्राउजर और टिकटॉक जैसे एप के जरिए पूरे विश्व में एक अलग तरह का दुष्प्रचार तंत्र विकसित किया है। इसमें भारत भी शामिल है। कई जाने-माने पत्रकारों से लेकर नई पीढ़ी के छात्र-छात्राएं और आम लोग भी जाने-अनजाने इस तंत्र में शामिल हैं। कांग्रेसी इकोसिस्टम के कई पत्रकारों ने तो बाकायदा नौकरी छोड़कर यूसी ब्राउजर के लिए ही लिखना शुरू कर दिया है। आश्चर्य है कि इतने भर से उनकी खर्चीली जीवनशैली चल जाती है। ये सभी पत्रकार बड़े-बड़े सेमिनारों में विदेश जाते रहते हैं। यूसी ब्राउजर और टिकटॉक पर रोक की लंबे समय से मांग की जाती रही है, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में ये बार-बार बचते रहे हैं। उनके बचाव में बड़े-बड़े वकील खड़े हो जाते हैं। चायनीज वायरस के मामले में भी इन दोनों ने झूठ और भ्रामक जानकारियां फैलाने में पूरी भूमिका निभाई। फेक न्यूज और देशविरोधी दुष्प्रचार के लिए हमेशा चर्चित रहने वाले विवादित पत्रकार शेखर गुप्ता ने अपने न्यूज पोर्टल पर चीन की प्रशंसा में रिपोर्ट प्रकाशित की। लिखने वाले भी संभवत: चीन के ही पत्रकार थे। बताया गया कि ‘देखो इतने बड़े संकट से चीन कितनी जल्दी उबर गया’।
भारतीय मीडिया में चीन का ये स्तुतिगान तब चल रहा है जब पूरा देश चीन के ही कारण इस महामारी की चपेट में तेजी से फंसता जा रहा है। शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने ही इस साल फरवरी की शुरुआत में रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि अमेरिका इस वायरस को लेकर दुनिया भर में बिना वजह घबराहट पैदा करने की कोशिश कर रहा है। इसमें भारत के प्रयासों को भी अमेरिका से प्रभावित बताने की कोशिश की गई थी। क्या यह समझना बहुत मुश्किल है कि उनकी पत्रकारिता किसके हितों को सुरक्षित रखने के लिए है? महत्वपूर्ण यह है कि कई पत्रकारों ने यह बात बताई कि उन पर चायनीज वायरस न लिखने और चीन के हितों वाले लेख लिखने का भारी दबाव है। कुछ ने तो ऐसा न करने पर अपनी हत्या होने की भी आशंका जताई।
चायनीज वायरस के मामले में ‘द क्विंट’ की भूमिका भी बेहद संदिग्ध है। इस विवादित न्यूज पोर्टल ने एक तथाकथित डॉक्टर के हवाले से रिपोर्ट दी कि भारत में महामारी तीसरे चरण में पहुंच चुकी है और भारत सरकार इस बात को छिपा रही है। लोगों ने जांच की तो पाया कि वह मेडिकल डॉक्टर नहीं, बल्कि पीएचडी वाला डॉक्टर है। खबर सही लगे इसके लिए ‘द क्विंट’ ने उस व्यक्ति को सरकारी टास्क फोर्स का सदस्य बता डाला। इस फेक न्यूज की रिपोर्टर वही है, जिसने कुछ समय पहले एक सैनिक का झूठा स्टिंग आॅपरेशन किया था और बदनामी के डर से उस सैनिक ने आत्महत्या कर ली थी। संदिग्ध फंडिंग वाले ऐसे ढेरों न्यूज पोर्टल के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं के कई
चैनलों और अखबारों ने भी चीनी दुष्प्रचार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
चायनीज वायरस को लेकर भारत में पश्चिमी मीडिया की भूमिका भी अजीबोगरीब है। बीबीसी हिंदी भले ही ब्रिटेन के करदाताओं के खर्चे पर चलता है, लेकिन उसमें बैठे कॉमरेडों ने उसे चीन का हितैषी बना रखा है। इसने रिपोर्ट प्रकाशित की कि कैसे खुद संकट से उबरने के बाद चीन ‘मानवता की सेवा’ कर रहा है। सबूत के तौर पर उसने बताया कि कैसे उसने स्पेन को मेडिकल किट मुहैया कराई है। जबकि ये किट एक व्यापारिक सौदे के तहत मोटी कीमत लेकर दी गई थीं और उनमें से 80 प्रतिशत से ज्यादा खराब निकल चुकी हैं। स्पेन की मीडिया में यह समाचार होने के बावजूद बीबीसी के पत्रकारों तक यह बात नहीं पहुंची? ऐसी जानकारी आ रही है कि अपने पक्ष में प्रचार कराने के लिए चीन भारत में बड़े पैमाने पर पैसे खर्च कर रहा है। कई तथाकथित सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और कई ब्लॉगर भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में जुटे हैं। ये सभी आपको बताते मिलेंगे कि कैसे वुहान से वायरस का संक्रमण शंघाई तक न पहुंचना एक सामान्य घटना है और चीन को बेवजह शक से नहीं देखा जाना चाहिए। दरअसल हम जिन पत्रकारों को अक्सर पाकिस्तान के पक्ष में लिखते और बोलते पाते हैं, उन सभी की फंडिंग का जरिया वास्तव में चीन से होकर आता है। चीन उन्हें समय-समय पर अपने यहां सरकारी भ्रमण पर ले जाता है। वहां उनके ऐशो-आराम का बंदोबस्त होता है।
2009 में भारतीय पत्रकारों का एक दल चीन गया था जिसे तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश से लगे इलाकों में भी ले जाया गया था। कई ऐसे बांधों पर भी घुमाया गया था जिनके बारे में माना जाता है कि वे भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। लौटकर इन सभी पत्रकारों ने जो रिपोर्ट छापी थीं उन्हें देखें तो कहानी समझ में आ जाती है। एक देश जिसकी नीयत हमेशा संदेहास्पद रही है, उसका ऐसा महिमामंडन बिना कारण नहीं हो सकता। सिर्फ महिमामंडन हो तो भी चलेगा लेकिन अगर ऐसी रिपोर्ट में बताया जाए कि ‘चीन सर्वशक्तिशाली है और भारत उसके आगे कहीं भी नहीं टिकता’, तो समझ में आ जाता है कि उद्देश्य कुछ और है।
चायनीज वायरस के इस संकट से देश कैसे बाहर आएगा यह अगले कुछ सप्ताह में स्पष्ट हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि अगर इसे लेकर फर्ज़ी खबरों और झूठे विमर्श को नहीं रोका गया तो जोखिम बढ़ता जाएगा। यह नहीं होना चाहिए कि देशविरोधी ताकतें और शत्रु राष्ट्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में खुलेआम अपनी गतिविधियां जारी रखें और हम उन्हें चुपचाप ऐसा करते देखते रह जाएं।