चीनी वायरस ( कोरोना) के दौर में आप का अपराध अक्षम्य है
   दिनांक 29-मार्च-2020
चीनी वायरस ( कोरोना) की इस जंग को जीत कर जब भारत पूरी दुनिया में इतिहास रच रहा होगा. ठीक उसी समय, अरविन्द केजरीवाल की ओछी राजनीति का विवरण भी लिखा जा रहा होगा. इस संकट के दौर में भी वह राजनीति करने से बाज नहीं आए. उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के मेहनतकश लोगों को मौत के मुंह में धकेल कर उन्होंने किनारा कर लिया.
 
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अंततः वही हुआ जिसका डर था. भय और भूख पर राजनीति शुरू हो गई. इस महामारी में सभी से उम्मीद थी कि वो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करेंगे. इस महामारी पर विजय प्राप्त करके इतिहास रचेंगे. मगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इस सकंट की घड़ी में भी गंदी राजनीति का एक दाव चला. उन्होंने फैक्ट्री मालिकों, निजी प्रतिष्ठानों के मालिकों एवं किराए पर घर देने वाले मकान मालिकों पर कानून का इकबाल कायम नहीं किया. केवल बयान जारी करते रहे कि मजदूरों को नौकरी से न निकाला जाय, वेतन न काटा जाय और मकान मालिक किराया माफ़ कर दें. इसके समानांतर एक अफवाह फैलाई गई कि यह लॉक डाउन कम से कम तीन महीना तक चलेगा क्योंकि केंद्र सरकार ने सभी राहत तीन महीने के लिए दी हैं. सीएए और एनआरसी की खिलाफत करने वाले गिरोह ने ही यह अफवाह फैलाई. एक तो अरविन्द केजरीवाल ने मजदूरों के हित में सख्ती से कानून लागू नहीं किया. वहीं उनकी पार्टी के लोगों ने अफवाह फैलाई. जब हताश मजदूर सड़कों पर उतर गए तो दिल्ली सरकार ने उन्हें दिल्ली के बार्डर पर पहुंचा कर छोड़ दिया. उनके इस कृत्य से उत्तर प्रदेश , बिहार और पंजाब में जबरदस्त अफरा – तफरी का माहौल है. दिल्ली से आ रहे ये लोग प्रदेश के विभिन्न जनपदों में जायेंगे और इन लोगों को अलग – अलग जनपदों में कैसे एकांतवास में रखा जाएगा. ? यह एक बड़ा सवाल है.
आनन्द विहार में लॉकडाउन की धज्जियां उड़ गईं

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दिल्ली सरकार ने पहले तो 4 लाख लोगों को भोजन और राशन पहुंचाने का वायदा किया था. मगर शनिवार को दिहाड़ी मजदूरों को डीटीसी की बसों में भरकर उत्तर प्रदेश के बार्डर आनंद विहार के पास छोड़ दिया गया. आनंद विहार में मजदूरों की भीड़ हजारों की संख्या में मौजूद है. भीड़ इतनी ज्यादा है कि तिल फेंकने की जगह नहीं है. सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह मजाक बन गया. लॉकडाउन की पूरी तरह धज्जियां उड़ चुकी हैं. आनन्द विहार के पास कुम्भ मेले जैसा नजारा है. लोग एक दूसरे से सटकर खड़े हैं. फुट ओवरब्रिज पर जन सैलाब उमड़ा हुआ है. पूरा फुट ओवरब्रिज जाम हो चुका है.
6 दिन बाद भी जब भोजन नहीं मिला तब मजदूर सड़कों पर उतरे

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इस बार केजरीवाल ने भी माना कि लॉकडाउन के अलावा कोई रास्ता नहीं था. केजरीवाल ने उस समय कहा भी कि "अगर स्थिति खराब हो जाएगी. तब भी लॉकडाउन ही करना पड़ेगा. इसलिए लॉकडाउन का सभी लोग पालन करें. अगर यह संक्रमण फ़ैल गया तो अस्पताल में इलाज के लिए बेड ही नहीं बचेगा." लॉकडाउन 22 मार्च को किया गया था. उसके बाद अगले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस लाक डाउन को लॉकडाउन दिन के लिए बढ़ाया. दिल्ली में दिहाड़ी मजदूरी करने वालों ने 6 दिन तक धैर्य बनाये रखा. कुछ लोगों को नजर अंदाज कर दिया जाए तो अधिकतर मेहनत-मजदूरी करने वाले लोगों ने अपील को माना और अपने घरों में रुके रहे. करीब 6 दिन बीत जाने के बाद भी जब केजरीवाल सरकार, राशन और भोजन उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रही. इसी बीच अफवाह भी फैलाई गई. ऐसी दशा में दिहाड़ी मजदूर सड़कों पर निकल आये और पैदल ही चल दिए. छोटे बच्चों और महिलाओं के साथ ये लोग दिल्ली की सड़कों पर पैदल यात्रा करते हुए निकले. तब केजरीवाल सरकार ने सड़क पर अपने अफसरों और नेताओं को भेजकर इन्हें समझाने का कोई प्रयास नहीं किया. कोई घोषणा नहीं कराई. लोगों को रोकने के बजाय डीटीसी की बसों में भर कर बार्डर पर पहुंचा दिया. केजरीवाल सरकार हमेशा कानून एवं व्यवस्था के लिए केंद्र सरकार पर दोषारोपण करती रही है. मगर इस मामले में जो भी निर्णय लिए जाने थे वह गृह मंत्रालय के अधीन नहीं थे. केजरीवाल ने अपनी नाकामी को बड़ी ही बेशर्मी से अन्य प्रदेशों के सर पर मढ़ दिया.
केवल जबानी जमा खर्च
इन दिहाड़ी मजदूरों का साफ़ कहना है कि जहां काम कर रहे थे. वहां पर वह काम बंद हो गया. वहां के मालिक ने इन मजदूरों को अगले महीने की पगार देने से मना कर दिया और यह कह दिया कि फिलहाल कोई काम नहीं है. जब स्थिति सामान्य होगी तब काम पर आना. फैक्ट्री के जिस परिसर में मजदूर रह रहे थे. उस परिसर को फैक्ट्री मालिक ने खाली करा दिया. जिन मकानों में यह मजदूर किराये पर रह रहे थे. उन मकान मालिकों ने किराये में कोई रियायत नहीं की. कुछ मकान मालिकों ने कोरोना के डर से इन लोगों से मकान खाली करने को कहा. यह सब कुछ बीते 6 दिनों में हुआ. जबकि केजरीवाल सरकार ने कहा था कि “मकान मालिक इन मजदूरों से लॉकडाउन के दौरान मकान का किराया ना लें. फैक्ट्री मालिक और निजी प्रतिष्ठान के मालिक लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों के वेतन में कटौती न करें.” केजरीवाल सरकार की यह सब अपील, सिर्फ जबानी जमा खर्च साबित हुई. उनकी सरकार ने वादा तो किया मगर इसे धरातल पर लागू नहीं कराया. मकान मालिकों और फैक्ट्री मालिकों ने उनके इस आदेश को ठेंगा दिखा दिया और वह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे.
भाजपा नेता मनोज तिवारी ने किया ट्वीट
अब उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन का पालन करने वाले लोग घबराए हुए हैं. लोगों को लग रहा है कि दिल्ली से यह भीड़ अगर उत्तर प्रदेश में आ गई तो संक्रमण की आशंका बढ़ जाएगी. ये लोग उत्तर प्रदेश के जिन-जिन जनपदों में जाएंगे वहां पर सावधानी बरतनी पड़ेगी. उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में इन लोगों को ख़ोज-खोज करके एकांतवास में रखना पड़ेगा. यह एक बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य है. कमोवेश यही स्थिति पंजाब और बिहार की भी होने वाली है.
अफवाह फैलाई गई कि तीन महीने चलेगा लाक डाउन
उत्तर प्रदेश के नोएडा, आगरा, गाज़ियाबाद सरीखे वो जनपद जो दिल्ली से सटे हुए हैं. वहां पर कोरोना संक्रमित मरीज पाए जा रहे हैं मगर अन्य जनपदों में कोरोना के कोई नए मरीज सामने नहीं आये हैं. लखनऊ में भी बीते 5 दिनों में कोरोना का कोई नया मरीज सामने नहीं आया है. लाक डाउन धीरे - धीरे सफल हो रहा था. इस महामारी के बढ़ने की दर में कमी आ गई थी. मगर कुछ देश विरोधी ताकतों ने यह फैलाना शुरू किया कि यह बीमारी 21 दिन में थमने वाली नहीं है. केंद्र सरकार की तरफ से दी जाने वाली तीन महीने की मदद को लेकर यह अफवाह फैलाई गई कि यह लाक डाउन कम से कम तीन महीने चलाया जाएगा. यह वही लोग हैं जिन्होंने सीएए और एनआरसी को लेकर अफवाह फैलाई थी. मनीष सिसोदिया ने कहा था ”वी आर विथ शाहीन बाग़—हम लोग शाहीन बाग़ पर धरना देने वालों के साथ हैं.” यही वजह है कि दिक्कत – परेशानी झेल रहे मजदूरों का सब्र टूट गया और वो सड़कों पर पैदल चल पड़े.