दिल्ली दंगा: जो दुआ सलाम करते थे उन्होंने ही सब फूंक डाला
   दिनांक 03-मार्च-2020
मुख्य ब्रजपुरी रोड भगीरथी विहार में मेडिकल स्टोर चलाने वाले जितेंद्र शर्मा का कहना है कि उन्मादियों की भीड़ ने उनकी जिंदगी भर की कमाई को आग लगा दी। 22 साल से वह दुकान चला रहे थे, सभी से भाई चारा था लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की

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उन्मादी भीड़ द्वारा जलाए गए अपने मेडिकल स्टोर के सामने खड़े जितेंद्र शर्मा।
24 फरवरी की शाम को ऐसी सुगबुगाहट थी कि कभी भी दंगा हो सकता है, लेकिन इलाके में उनकी दुकान दो दशक से भी ज्यादा होने के चलते सभी से मिलना—जुलना था। आसपास मुसलमानों की दुकानें थीं उन्होंने भी कहा कि पंडित जी चिंता न करो आपकी दुकान पर कोई आंच नहीं आएगी। 24 की शाम को दुकान करने के बाद जब वह घर पहुंचे तो उनके एक परिचित का फोन आया कि वहां पथराव हो रहा है। कुछ देर बाद पुलिस आ गई तो मामला शांत हो गया।
जितेंद्र बताते हैं कि मैंने वहां परिचित मुसलमानों से बात की। सभी ने कहा कि पंडित जी चिंता की कोई बात नहीं है। आप दुकान आराम से खोलना यहां सब ठीक रहेगा। इसी विश्वास के साथ 25 फरवरी सुबह आठ बजे रोजाना की तरह मैंने दुकान खोली। थोड़ी देर बाद ही शोर मचने लगा, ब्रजपुरी रोड पर मस्जिद की तरफ से भीड़ पथराव और आगजनी करती चली आ रही थी। मैंने दुकान का शटर गिराया और पीछे प्लॉट में जाकर छिप गया। दंगा बढ़ता जा रहा था। स्थिति ऐसी हो गई थी कि कहीं से कोई मदद नहीं मिल सकती थी। बाहर अल्लाह हो अकबर के नारे लग रहे थे और मैं दुकान के पीछे बने रिक्शे के गैरेज में छिपा हुआ था। मेरे बराबर में मेरे चाचा के बेटे की वर्कशॉप है। मैंने उसे फोन किया। वह स्कूटी लेकर मुझे लेने के लिए निकला लेकिन जब वह बराबर की गली में पहुंचा तो दंगाइयों की भीड़ उसके पीछे भागी। भागते हुए उसे पत्थर भी लगा लेकिन वह किसी तरह निकलने में कामयाब हो गया। लेकिन मैं गैराज में ही छिपा हुआ था। बाहर से तेज आवाजें आ रही थीं। तभी उन्मादी भीड़ मेरी दुकान का शटर तोड़ने लगी। मैं कई बार पुलिस को फोन करने की कोशिश की लेकिन नंबर नहीं मिला। ​वह कहते हैं भीड़ ने कहा कि यह दुकान हिंदू की है इसे जलाना बहुत जरूरी है। इसके बाद भीड़ ने शटर तोड़कर दुकान को आग लगा दी। चूंकि भीड़ सड़क पर मुख्य मार्ग पर थी इसलिए मुझे पीछे से दीवार कूदकर भागने का मौका मिल गया। मैं वहां से किसी तरह से जान बचाकर दौड़ा, मैं जितनी तेजी से दौड़ सकता था, उतनी तेजी से गलियों होता हुआ हिंदुओं के इलाके में आ गया तब जाकर जान में जान आई। अगले दिन जब दंगा थमने के बाद अपने साथ कुछ लोगों को लेकर मैं दुकान पर पहुंचा तो दुकान पूरी तरह जलकर खाक हो चुकी थी। वह बताते हैं कि मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे साथ ऐसा होगा। आसपास मुस्लिम बहुल इलाका था लेकिन कभी कोेई दिक्कत नहीं हुई। सभी से दुआ सलाम थी, लेकिन इसके बाद भी दुकान को नहीं बख्शा गया। वहीं आसपास जितनी भी मुसलमानों की दुकान थी वह सब सलामत थी, किसी ने एक पत्थर भी उनके घरों और दुकानों पर नहीं फेंका। 22 सालों में जो बनाया था वह सबकुछ लुट गया।
यह पूछने पर भी अब क्या करेंगे, जितेंद्र कहते हैं कि उन्होंने 1995 में फार्मेसी की थी, कर्जा लेकर तब दुकान शुरू की थी। आय का वही स्रोत था। दुकानों में लाखों रुपए का सामान था। अब दोबारा दुकान शुरू करने की न उनमें सामर्थ है न ही पैसा, इसलिए अब फिर से कहीं पर एमआर की नौकरी तलाश करेंगे क्योंकि परिवार तो किसी तरह चलाना ही है।