काल के प्रस्तर पर अमिट शिलालेख
   दिनांक 30-मार्च-2020
चाइनीज वायरस त्रासदी के बाद देशबन्दी ने सम्पर्क और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ा दीं। किन्तु हमने निर्णय लिया कि परिस्थितियां जो भी हों वाकणकर जी पर केंद्रित विशेषांक को उनके जन्मशताब्दी वर्ष में ही पूरा कर पाठकों को सौंपना पाञ्चजन्य का कर्तव्य है

panchjanya _1  
यह सामान्य नहीं है कि व्यक्ति एक नहीं अनेक प्रतिभाओं का पुंज भी हो और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने वाला प्रतीक भी। डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर जी का जीवन जिज्ञासा, प्रेरणा और घनीभूत ज्ञान का ऐसा ही अनुपम-असामान्य मिश्रण है। ऐसा कृतित्व जिसने भारतीय इतिहास के विमर्श की दिशा बदली और आने-वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक चेतना को वैज्ञानिक दृष्टि से लैस किया।
 
एक पुरातत्वविद, सिद्धहस्त कलाकार, भाषा-लिपियों का जानकार, इतिहास का वैज्ञानिक विमर्शकार और संस्कृति का गहरा अनुरागी-अध्येता और भी न जाने क्या-क्या! वाकणकर जी का जीवन सही अर्थों में प्रतिभा का इंद्रधनुष है।
माना जाता है कि विज्ञान आस्था पर चोट करता है किंतु उन्होंने वैज्ञानिक तार्किकता की छैनी से समय की शिला पर संस्कृति के शिलालेख लिख डाले। आर्य आक्रमण के ‘गल्प सिद्धान्त’ को बहा ले जाने वाला सरस्वती के प्रवाह का अनुसंधान, ग्रीनविच ‘मीन टाइम’ को चुनौती देता ठीक कर्क रेखा पर बैठा उज्जैन का डोंगला या भीमबैठका शैलचित्रों की कार्बन डेटिंग, यह संस्कृति को स्थापित करता विज्ञान नहीं तो और क्या था?
विशेष बात यह कि गहन-गम्भीर शोध-अध्ययन में डूबकर भी वे न रूखे हुए न समाज से कटे! देश-विदेश में स्नेहपूर्ण सम्पर्क और विविध क्षेत्रों में शिष्यों का सुदीर्घ विस्तार बताता है कि किस प्रकार एक दीप हजारों दीपक जगमगाकर चला गया।
वाकणकर जी के जीवन के विविध आयामों को साप्ताहिक के किसी एक अंक में समेटना सहज नहीं था फिर चाहे वह अंक विशेषांक ही क्यों न हो, इस पर वुहान वायरस त्रासदी के बाद देशबन्दी ने सम्पर्क और तकनीक से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ा दीं। किन्तु हमने निर्णय लिया कि परिस्थितियां जो भी हों वाकणकर जी पर केंद्रित विशेषांक को उनके जन्मशताब्दी वर्ष में ही पूरा कर पाठकों को सौंपना पाञ्चजन्य का कर्तव्य है। वाकणकर जी नाम से लिये इस संकल्प का प्रताप इतना था कि इस आयोजन में वाकणकर जी के निकट सानिध्य को पाने वाले, उनके अध्ययन को विविध रूप में जानने वाले जुड़ते गए। 1987 में ‘हरिभाऊ ’ के योगदान को रेखांकित करने के लिए प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में संकलित लेखों, विशेषकर स्वयं वाकणकर जी के मिथ्या धारणाएं तोड़ते शोध लेखों, से भी इस कार्य में महत्वपूर्ण सहायता मिली।
डॉ. वाकणकर का जीवन बताता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तथा जीवन-आचरण पारदर्शी, तो शरीर के थक जाने, व्यक्ति के थम जाने के बाद भी उसकी यात्रा नहीं रुकती। देशबन्दी के थमे हुए, महामारी से सहमे माहौल में और जो कुछ कम हुआ हो पठन-पाठन के लिए समय अवश्य बढ़ गया है। पढ़िये और बताइए कि पाञ्चजन्य का यह अंक तथा ई-संस्करण का अनुभव आपको कैसा लगा!