चीनी वायरस से निपट लेगा भारत, दुनिया को भरोसा
   दिनांक 30-मार्च-2020
श्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी निदेशक माइकल जे रयान की निगाहें भारत की ओर हैं. उन्हें पूरा विश्वास है कि कोरोना वायरस की इस वैश्विक महामारी से निपट कर भारत पूरे विश्व का मार्ग प्रशस्त करेगा. यह भारत के लिए एक बार फिर से विश्व गुरु बनने के अवसर जैसा है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी निदेशक माइकल जे रयान ने भारत की तारीफ़ यूं ही नहीं की. उनका यह बयान बेवजह नहीं था कि “भारत कोरोना वायरस से शानदार तरीके से निपट रहा है. हमें पूरी उम्मीद है कि इससे निपटने में भारत पूरी दुनिया को रास्ता दिखाएगा.” दरअसल, भारत ने दो बहुत ही गंभीर बीमारियों को जड़ से खत्म करके पहले भी विश्व को रास्ता दिखाया है. पूरी दुनिया में आबादी में दूसरे नंबर पर होने की वजह से पोलियो और चेचक को समाप्त करना बड़ी चुनौती थी. इन दोनों बीमारियों को विश्व स्वास्थ्य संगठन चाहता था कि पूरी दुनिया से मिटा दिया जाय. भारत ने इन दोनों बीमारियों को समाप्त करने का संकल्प लिया.
 
एक जानकारी के मुताबिक़ करीब 7 करोड़ बच्चों को प्रति वर्ष पोलियो की ड्राप पिलाये जाने का लक्ष्य था. पोलियो की बीमारी के बारे में उस समय एक स्लोगन दिया गया था – “एक भी बच्चा छूटा तो समझो सुरक्षा चक्र टूटा.” इस स्लोगन का तात्पर्य यह था कि जब तक पोलियो का एक भी मरीज पृथ्वी पर रहेगा पोलियो का विषाणु समाप्त नहीं होगा. पोलियो तभी इस देश से समाप्त हो सकता था जब कोई भी बच्चा पोलियो ग्रस्त ना रह जाय. इसके लिए आवश्यक था कि सभी देशवासी अपने-अपने बच्चों को तय समय पर पोलियो का ड्राप पिला दें.
 
 पोलियो का ड्राप पिलाने के बाद भी यह तय होना बहुत जरूरी था कि जिस बच्चे को पोलियो की ड्राप पिलाई गई थी उसे डिहाइड्रेशन तो नहीं हुआ था. कई बार ऐसा होता था कि पोलियो की ड्राप पिला दिए जाने के बाद उस बच्चे को डिहाइड्रेशन हो जाता था और पोलियो ड्राप बेअसर हो जाती थी. कई बार बच्चे के माता - पिता यह सोच कर निश्चिंत रह जाते थे कि पोलियो की ड्राप तो पिला दी गई है मगर वह पोलियो ड्राप डिहाइड्रेशन की वजह से बेअसर हो चुकी होती थी. डिहाइड्रेशन का खतरा इसलिए रहता है कि शहरों में प्रदूषित पानी की आपूर्ति की संभावना बहुत अधिक रहती है. ग्रामीण इलाकों में भी जहां - जहां पर हैण्ड पम्प के आस-पास गंदा पानी एकत्र होता है. उसकी वजह से हैण्ड पम्प का पानी भी प्रदूषित हो जाता है.
 
पहले पोलियो ड्राप पिलाने के लिए रविवार को शिविर लगाया जाता था. बाद में यह निर्णय लिया गया कि हर घर पर जाकर पोलियो ड्राप पिलाया जाय. सरकार के इस अभियान में मुसलमान नई मुसीबत बन कर सामने खड़े हो गए. मुस्लिम इलाकों में यह अफवाह जड़ जमाए बैठी थी कि सरकार पोलियो ड्राप पिलाकर उनकी आने वाली पीढ़ी की प्रजनन क्षमता को समाप्त करना चाहती है. इसलिये चाहे जो हो जाए बच्चों को पोलियो ड्राप नहीं पिलाना है. जब मुस्लिम इलाकों में पोलियो ड्राप पिलाने वाली टीम पहुंची तो उन लोगों के ऊपर जानलेवा हमले किये गए. कई बार पोलियो ड्राप पिलाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम को पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी. ऐसे माहौल में जूझते हुए भारत को पोलियो मुक्त कराया गया.
 
इसी प्रकार, चेचक एक गंभीर समस्या बनी हुई थी. इस बीमारी के साथ हिन्दुस्थान में लोगों की धार्मिक भावना जुड़ी हुई थी. इसलिए चेचक हो जाने के बाद लोग इलाज नहीं कराते थे. ऐसा बताया जाता था कि दवा खाने से चेचक का प्रकोप और बढ़ जाएगा. ऐसे में लोग झाड़ - फूंक का ही सहारा लेते थे. धीरे -धीरे जागरूकता आई. लोगों ने अपने छोटे बच्चों को चेचक का टीका लगवाना शुरू किया. वर्ष 1990 के करीब भारत चेचक की बीमारी से मुक्त हो गया. एक समय था जब प्रसव के दौरान जच्चा - बच्चा की होने वाली मृत्यु दर के मामले में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर था मगर इस दिशा में भी अभियान चलाया गया. लोगों के अन्दर जागरूकता आई. गर्भवती स्त्री की देखरेख और इलाज पर ध्यान दिया गया. करीब वर्ष 2000 के करीब प्रसव के दौरान होने वाली जच्चा - बच्चा की मौत के मामले में भारत की छवि पूरी दुनिया में काफी बेहतर हो चुकी थी.
 
यही वो वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की निगाहें भारत की ओर लगी हुईं हैं. इटली की स्वास्थ्य सेवायें विश्व में दूसरे नंबर पर है मगर फिर भी वहां पर कोरोना वायरस ने सबसे ज्यादा तबाही मचाया और वो लोग इसे नियंत्रित करने में फिलहाल पूरी तरह से फेल साबित हुए हैं. भारत के अन्दर ही वह क्षमता है कि इस महामारी को बेहतर ढंग से नियंत्रित करके विश्व के सामने एक मिशाल पेश कर सकता है. जरूरत है इस देश के नागरिकों को सरकार के साथ संकल्पित होने की.