काबुल हमला:शाहीन बाग से लेकर काबुल तक मानसिकता एक
   दिनांक 30-मार्च-2020
ले. कर्नल (सेवानिवृत्त) आदित्य प्रताप सिंह
पिछले दिनों काबुल के गुरुद्वारे में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों द्वारा किए गए हमले में 25 से ज्यादा सिखों की जान चली गईं तो वहीं दर्जनों घायल हुए। लेकिन भारत के सेकुलरों के मुंह पर ताला जड़ा रहा। शाहीन बाग की मानसिकता वाले कथित सेकुलरों को काबुल के गुरुद्वारे में निर्दयता पूर्वक मारे गए सिखों का खून नहीं दिखा। लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की बात आते ही इनकी भावनाएं उफान मारने लगती हैं।

kabul _1  H x W
आतंकी हमले में अपने परिवार को खोने के बाद बिलखता बच्चा
बीती 25 मार्च को प्रातः 7 बजे जब पूरा विश्व कोरोना महामारी से लड़ रहा था तब इस्लाम के जिहादी काबुल के एक गुरुद्वारे में काफिरों (सिख नरसंहार) के कत्लेआम को अंजाम दे रहे थे। 25 सिख तत्काल काल के ग्रास बन चुके थे। अनेक आहत हुए, जिनमें से कुछ बाद में मृत घोषित किए गए। हरेन्द्र सिंह का पूरा परिवार ही इस हमले में मारा गया। हमले के बाद भारत ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की। विदेश मंत्रालय ने कहा,‘‘ हम मृतकों के परिवार वालों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं. भारत अफगानिस्तान के हिंदू और सिख समुदाय के प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता देने के लिए तैयार है। कोरोना वायरस महामारी के समय में अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थानों पर इस तरह के कायरतापूर्ण हमले, अपराधियों और उनके आकाओं की शैतानी मानसिकता दिखाते हैं।’’इसके अलावा बयान में कहा गया कि जिस तरह ने अफगान सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई की है इसके लिए भारत सरकार उनकी तारीफ करती है. भारत देश की शांति और सुरक्षा लाने के अपने प्रयासों में देशवासियों, सरकार और अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों के साथ एकजुटता के साथ खड़ा हैै।
जारी है अघोषित युद्ध

kabul 2_1  H x
 
 इस्लाम का हिंदुओं और अन्य मत-पंथों के विरुद्ध जारी अघोषित युद्ध सातवीं सदी से चलते हुए आजतक अबाध गति से चलता रहा है। तब से अब तक करोड़ों हिंदुओं का नरसंहार, उससे अधिक का कन्वर्जन और अपहरण किया गया। प्राचीन अखंड भारत और वर्तमान पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और अनेक दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश के सभी मुसलमान इसी कन्वर्जन का परिणाम हैं। यह भी हिन्दू नरसंहार ही था जो हत्या, कन्वर्जन, धर्मस्थल विखंडन, जजिया और धर्मग्रंथ अग्निसात जैसे बर्बर कृत्यों द्वारा सम्पन्न किया गया। इस्लाम ने तलवार के भय से शुरूआती सौ वर्षों में विश्व के एक बड़े भूभाग पर कब्जा किया। स्पेन से लेकर सिंध तक उस काल के सबसे क्रूरतम नरसंहार को जिहादियों ने अंजाम दिया। मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन महानतम सभ्यताओं को सदा-2 के लिए धरा से विलीन कर दिया गया। हिन्दू सभ्यता की जीवटता ने उसे नष्ट नहीं होने दिया। परंतु इस महान सभ्यता का क्षय अवश्य हुआ और इसके एक बड़े भाग को शनै-शनै इस्लाम निगलता चला गया। पाकिस्तान और अफगानिस्तान जो आज इस्लामिक राष्ट्र हैं कभी हिन्दुत्व के केंद्र होते थे। सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र थे।
अब कुछ ही सिख बचे हैं अफगानिस्तान में
 
kabul 3_1  H x
अफगानिस्तान में सिख जो 1990 तक लगभग 50000 थे आज एक अनुमान के अनुसार 3000 ही शेष बचे हैं। तालिबान राज में भी अनेक सिखों की हत्याएं और धर्मस्थलों पर हमलों से लेकर लड़कियों और महिलाओं को जबरन अगवा कर उनका कन्वर्जन किया गया। गैर इस्लामिक जनसंख्या का नरसंहार इस्लाम में सही माना जाता है। इसीलिए इन इस्लामिक राष्ट्रों में यह विषय सरकारों के लिए भी उनके वरीयताक्रम में निचले पायदान पर है। 1 जुलाई, 2018 को भी एक आत्मघाती हमले में अफगानिस्तान के जलालाबाद में 19 सिख मार दिए गए थे। यह हिन्दू नरसंहार बड़ा सुनियोजित और इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान की भू-रणनीति का हिस्सा है, जिसमें इस क्षेत्र का प्रत्येक काफिर विदेशी एजेंट है जो पाकिस्तान के हितों के विरुद्ध काम करता है और उसका मरना पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित में है। वैसे भी इस्लामिक सिद्धान्त के अनुसार दारुल इस्लाम में काफिरों के जीवन का कोई मूल्य नहीं। अतः यह नरसंहार इस्लामिक हिंसा चक्र का एक हिस्सा है। इस हिंसा के बाद अफगानिस्तान में सिखों का बने रहना मुश्किल है। वैसे भी अमेरिका और तालीबान के मध्य 29 फरवरी को सशर्त शांति समझौता होने के बाद अफगानिस्तान में पाकिस्तान सक्रिय हो चुका है। ऐसे में वह अफगानिस्तान में निर्णायक भूमिका में रहना चाहता है।
हमले में पाकिस्तान की भूमिका
पाकिस्तान किसी भी सूरत में भारत को अफगानिस्तान में एक शक्तिशाली घटक के रूप में नहीं देख सकता। अफगानिस्तान 1979 से विश्व की सामरिक रणनीति का केंद्र एवं परीक्षण स्थल बना हुआ है। इस्लामिक आतंकवाद की वैश्विक जन्मस्थली और शरणस्थली भी है जिसका संरक्षक 4 दशकों से अविवादित रूप से पाकिस्तान ही बना हुआ है। 25 मार्च को काबुल के नरसंहार के पीछे भी अफगान सूत्रों द्वारा पाकिस्तान का ही हाथ माना जा रहा है। यह समय सामरिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से इसलिए उपयुक्त था क्योंकि पूरे विश्व समुदाय का ध्यान अभी कोरोना से लड़ने में लगा है। मीडिया तक कोरोना के अतिरिक्त किसी अन्य विषय पर ध्यान नहीं दे रहा है। पाकिस्तान का अनुमान भी सत्य ही साबित हुआ क्योंकि इस विषय पर मीडिया से लेकर वैश्विक पटल के किसी भी मंच पर समुचित चर्चा तक नहीं हुयी। पाकिस्तान का काफिरों को भयाक्रांत करने का उद्देश्य भी पूरा हुआ। पाकिस्तान इस घटना को बिना चीन और उसके इस्लामिक राष्ट्र के भू-रणनीतिक सहयोगियों की सहमति के अंजाम दे सकता था। तुर्की, मलेशिया जैसे इस्लामिक राष्ट्र अब खुलकर पाकिस्तान के पक्षधर हो चुके हैं। इस्लामिक राष्ट्रों के संघ का नेतृत्व आजकल तुर्की ही कर रहा है जो अब पूर्ण रूप से राष्ट्रपति एर्डोगन के नेतृत्व में एक नया कट्टर इस्लामिक राष्ट्र बन चुका है। पाकिस्तान, चीन, मलेशिया और तर्की का नापाक गठबंधन भारत के लिए भविष्य में और भी मुश्किल पैदा करने वाला हो सकता है, विशेषकर अफगानिस्तान में। किसी भी स्थान पर सामरिक और राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए वहां पर आपकी समर्थक और हितैषी जनसंख्या का होना बहुत आवश्यक होता है, जो सबसे बड़ी सामरिक पूंजी होती है। परंतु अफगानिस्तान से सिखों के पलायन के बाद भारत का सशक्त जनाधार भी जाता रहेगा।
 
आतंकियों के मददगार इस्लामिक देश
इस्लामिक स्टेट जिसने इस सिख नरसंहार की जिम्मेदारी ली है, वह इस्लामिक राष्ट्रों द्वारा ही वित्त पोषित है और उनके हितों का पोषण करते प्रतीत होता है। इस संगठन ने अफगानिस्तान में नाटो सैन्य संगठन के विरुद्ध आक्रामक मोर्चा खोला वह इसके उद्देश्यों को उजागर करने के लिए हैं। यह आतंकी संगठन इस्लाम के उन मध्ययुगीन लक्ष्यों को पूरा करता है जो आज के युग में कोई भी मुख्यधारा का इस्लामी राष्ट्र पूरी करने की सैन्य या राजनीतिक शक्ति रखता है। आतंक जैसे छद्म युद्ध द्वारा इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान जैसे राष्ट्रों को सैन्य गुणात्मक शक्ति देता है और अपनी हिंसात्मक रणनीति द्वारा अफगानिस्तान में पाकिस्तान के सामरिक और रणनीतिक आधार को सुदृढ़ कर रहा है। क्योंकि अफगानिस्तान में जितनी हिंसा बढ़ेगी और विधि प्रक्रिया कमजोर होती जाएगी पाकिस्तान की उपयोगिता उतनी ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में बढ़ेगी। इस्लामिक स्टेट की पूरे विश्व में बढ़ी स्वीकार्यता इस्लाम की हिंसात्मक वृत्ति का परिचायक है। भारत जैसे पंथनिरपेक्ष राष्ट्र तक में मुस्लिम युवक और युवतियां इस्लामिक स्टेट में सम्मिलित होने के लिए सीरिया, इराक, तुुर्की और अफगानिस्तान गए। अनेक आतंकी वहां मारे गए तो कुछ वापस आए और कुछ वापसी के इच्छुक हैं। इस्लामिक राजनीतिक वर्चस्व की स्थापना के लिए आतंक और हिंसा उनका मजहबी सिद्धांत है। ऐसे में कटृटरपंथी अपने समय सिद्ध हथियार का भला क्यूूं परित्याग करें।
सीएए आखिर इन पीड़ितों के लिए बना
भारत में अब नागरिकता संशोधन अधिनियम की सार्थकता और भी बढ़ गई है। पड़ोसी देशों के हिन्दुओं को देश में आसरा देना उसका सास्वत विचार है, जिसे मोदी सरकार ने पूरा भी किया है।
भारत में इस अधिनियम का विरोध करते आए इस्लामी-वामी समुदाय को यह हिन्दू नरसंहार देखना चाहिए। लेकिन वह इसे देख कर अनदेखा करेंगे। क्योंकि उनके स्वार्थ कुछ और हैं। उनका दिमाग में पाकिस्तानी इस्लामिक अलगाववादी मानसिकता ने कब्जा जो कर रखा है। शाहीन बाग वालों को बांग्लादेशी घुसपैठिये और रोहिंग्या का दर्द तो दिखाई देता है लेकिन इन हिन्दू-सिखों पर होते हमले पर अपना मुंह सिल लेते हैं।