अब किस मुंह से सिखों को भारत बुलाने की बात कर रहे कैप्टन !

    दिनांक 30-मार्च-2020   
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सीएए को देश के संविधान की मूल भावना के खिलाफ बता विधानसभा में प्रस्ताव पास करने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह काबुल में गुरुद्वारे पर हुए हमले के बाद सिखों को भारत लाने के लिए विदेश मंत्री को किस मुंह से ट्वीट कर रहे हैं

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गत 25 मार्च को काबुल के शेर बाजार में स्थित गुरुद्वारे पर जिहादी आतंकियों ने हमला कर 27 सिख श्रद्धालुओं की निर्मम हत्या कर दी। हत्यारों ने न तो बच्चों को देखा न महिला या बूढों को जो भी सामने आया उसे गोलियों का निशाना बनाते रहे। इस घटना के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लोगों से मृतकों की आत्मिक शांति के लिए अरदास करने की अपील की है और विदेश मंत्री को ट्वीट कर कहा है कि ‘प्रिय एस जयशंकर, अफगानिस्तान में ऐसे बहुत से सिख परिवार हैं जो भारत आना चाहते हैं। आपसे अनुरोध है कि शीघ्र-अतिशीघ्र उन्हें वहां से निकालें। संकट के समय ये हमारा धर्म है कि हम उनकी मदद करें।’
कांग्रेस पार्टी के लोकप्रिय नेता कहे जाने वाले ये वही मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने 17 जनवरी को विधानसभा में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से प्रताड़ित हो कर आने वाले हिंदू-सिख व अन्य अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा लाए गए नागरिकता संशोधन कानून-2019 के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते हुए कहा था कि ‘यह देश के संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और हम ऐसे किसी कानून का समर्थन नहीं कर सकते।’ रोचक बात है कि कैप्टन सरकार के इस प्रस्ताव के पक्ष में पंजाब में विपक्षी दल आम आदमी पार्टी ने भी सरकार की हां में हां मिलाई थी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के घटक दल शिरोमणि अकाली दल को सलाह दी थी कि इस कानून के विरोध में वह केंद्रीय मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल को मोदी मंत्रिमंडल से हटा लें।
काबुल की घटना के बाद इनके मुंह सिल गए हैं परन्तु प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से अवश्य पूछ रही है कि वे काबुल में मारे गए निर्दोष सिखों की आत्मिक शांति के लिए किस मुंह से अरदास करेंगे? अफगानिस्तान के काबुल में मारे गए सिखों का कसूर सिर्फ यह था कि वह सिख थे और इस्लामिक आतंकियों की नजर में काफिर थे।

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हमारे पड़ोसी इस्लामिक देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान में हिंदू-सिखों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों पर इस तरह की अत्याचार की घटनाएं न तो नई हैं और ही आखिरी। ऐसे ही पीड़ित लोगों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार नागरिकता संशोधन कानून लेकर आई जिसके तहत प्रताडि़त हिंदू, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध व पारसियों को भारतीय नागरिकता दी जानी है। लेकिन भारत में ही मौजूद जिहादी व नक्सली संगठनों ने इस कानून का विरोध करना शुरू कर दिया और शाहीनबाग जैसे कई जगहों पर अभी तक विरोध प्रदर्शन चलता रहा। दूसरी ओर दुखद आश्चर्य है कि पंजाब के अधिकतर नेता जिनमें मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान और यहां तक कि सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त के जत्थेदार हरप्रीत सिंह ने भी जिहादी-नक्सली षड्यंत्र को पहचानने की जहमत नहीं उठाई और सीएए विरोध को समर्थन दे दिया। कैप्टन अमरिंदर सिंह न तो विधानसभा में सीएए के विरोध में प्रस्ताव तक पारित करवा दिया। केवल इतना ही नहीं लगभग पूरा पंजाबी मीडिया जिहादियों-नक्सलियों के समर्थन में बोलता नजर आया और यह प्रभाव देने का प्रयास किया कि जैसे सीएए देश में मुसलमानों के खिलाफ लाया गया कानून है और ये सभी मिल कर मुसलमानों को बचा कर धर्मनिरपेक्षता की परंपरा का पालन कर रहे हैं। काबुल हमले के बाद अब इन सबकी आंखें खुलनी चाहिएं और इस्लामिक देशों से पीडि़त हो कर आए हिंदू-सिखों को भारतीय नागरिकता देने के मार्ग मे कांटे बिछाने का काम बंद होना चाहिए।
सिखों पर इस हमले का चुनाव इस्लामिक स्टेट के मुजाहिद उस वक्त किए जब अफगानिस्तान के हिन्दू और सिख वैशाख पर्व मनाते हैं। इस पर्व को अफगानिस्तान के हिन्दू और सिख बहुत ही उत्साह से मनाते हैं। हालांकि, यह अफगानिस्तान के सिखों और हिन्दुओं पर कोई पहला हमला नहीं है। इसके पूर्व वर्ष 2018 में इसी तरह से इस्लामिक स्टेट के मुजाहिदों ने अफगानी राष्ट्रपति से मिलने जा रहे हिन्दू और सिखों से भरे हुए बस को बम से उड़ाकर 20 लोगों की जघन्य हत्या कर दी थी। इस हत्या का मकसद बेशक जिहाद तो है ही लेकिन इसका एक मायना यह भी है कि इस्लामिक स्टेट के जिहादी इस बात से खफा हैं कि अफगान सरकार और तालिबान के बीच चल रहे शांति समझौते के लिए सरकार ने इस्लामिक स्टेट को क्यों नहीं आमंत्रित किया।

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अफगानिस्तान में तालिबान व मुजाहिद दो तरह के जिहादी सक्रिय हैं। मुजाहिद वो हैं जिसने रूस के विरुद्ध अमरीका और पाकिस्तान के संरक्षण में जंग की। मुजाहिद मुजाहिद, जिहाद के लिए लडऩे वाले लड़ाके हैं। समय-समय पर इन मुजाहिदों ने अफगानिस्तान के हिन्दू और सिखों को निशाना बनाया क्योंकि ये बहुत धनवान थे। इन पर हमला करके इनको मालो-असबाब तो मिलता ही था, साथ ही साथ काफिरों की हत्या का मजहबी लुत्फ उठाकर ये जन्नत की गारंटी भी ले लेते थे। इन मुजाहिदों के मजहबी हमले का ये असर हुआ कि जहाँ 1970 तक काबुल और उसके आसपास के क्षेत्रों में 7 लाख के आसपास हिन्दू और सिख रहते थे, 1990 तक इनकी जनसंख्या कुछ हजारों में सिमट गई। मुजाहिदों के इस बेरहम हमले से सिख और हिन्दू बिरादरियों के मंदिर और गुरूद्वारे बुरी तरह तबाह हो गए और ज्यादातर हिन्दू और सिख अफगानिस्तान के अपने कारोबार समेट कर दूसरे देशों का रुख कर लिए। दूसरी तरफ तालिबानी अफगानिस्तान में शरिया लागू करने के पक्षधर हैं। इनका विचार भी मुजाहिदों की ही तरह है लेकिन सर्वहारा विचारों की वकालत करने वाले तालिबानियों ने काबुल की जगह अपना ठिकाना कंधार को बनाया। तालिबानियों के इसी शासनकाल में हिन्दुओं और सिखों को अपने घर और बदन पर पीला कपड़ा बांधने को कहा गया था और उनसे जजिया भी वसूला जाता रहा।
पूरी दुनिया में सभ्यताओं के बीच संघर्ष चल रहा है और कुछ सिरफिरे इस्लाम के नाम पर दुनिया भर में शरिया लागू करने का कभी न पूरा होने वाला ख्वाब लिए काम कर रहे हैं। इस तरह की मानसिकता के लोग पूरी दुनिया में फैले हैं, इस्लामिक देशों में यह काम बंदूक-बमों से हो रहा है तो भारत में शाहीनबाग जैसे आयोजनों के माध्यम से। राजनीतिक विरोध या धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इन शक्तियों का साथ देने से पहले पंजाब के नेताओं को सौ बार सोचना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि नागरिकता संशोधन कानून-2019 के विरोध में प्रस्ताव लाते समय पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने शाही परिवार की उन परम्पराओं को भी दरकिनार कर दिया जिसमें शरणागत को हर कीमत पर शरण दी जाती है। उनकी माताश्री राजमाता मोहिंदर कौर ने विभाजन के समय पाकिस्तान से उजड़ कर आए हजारों हिंदू-सिखों को न केवल शरण दी बल्कि उनके पुनर्वास का भी उचित प्रबंध किया। इसके बारे में पांचजन्य विस्तार से रिपोर्ट प्रकाशित कर चुका है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि एक अच्छे नेता की रही है क्योंकि बालाकोट हवाई हमले से लेकर कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा पाकिस्तानी जनरल जावेद कंवर बाजवा को गले लगाने तक वे पार्टी की लाइन से हट कर देश का समर्थन करते रहे हैं परन्तु नागरिकता संशोधन कानून को लेकर वे जाने अनजाने गच्चा खा गए और देशहित की बजाय दलहित को प्राथमिकता देते दिखे।
काबुल हमले का केरल कनेक्शन
काबुल के गुरुद्वारा साहिब पर हुए हमले का केरल से कनेक्शन जुड़ता जा रहा है। ताजा हुए खुलासे में यह बात सामने आई है कि गुरुद्वारे में हुए आत्मघाती हमले में मारा गया एक जिहादी अबु खालिद अल हिंदी उर्फ अब्दुल खैयाम उर्फ मोहम्मद साजिद कुट्टीरूमल का केरल से संबंध है। अफगानिस्तान की ऑनलाइन न्यूज सर्विस खामा प्रैस ने यह जानकारी दी है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इसकी तस्वीर जारी की थी। एनआईए ने साल 2017 में आईएस से संबंध होने को लेकर केस दर्ज किया था और एनआईए ने सीरिया में इसे ट्रेस किया था। गुरुद्वारा साहिब पर हमले के बाद आईएस ने ही इसकी जिम्मेवारी ली है और इस हमले में मारा गया एक आरोपी अबु खालिद अल हिंदी उर्फ अब्दुल खैयाम उर्फ मोहम्मद साजिद कुट्टीरूमल ही है। वह केरल के के पडनी इलाके का रहने वाला बताया गया है।