दिल्ली दंगा: जिसने रोटी कमानी सिखाई उसी को बर्बाद कर दिया
   दिनांक 04-मार्च-2020
मुख्य ब्रजपुरी रोड भगीरथी विहार में ऑटोमोबाइल की वर्कशॉप और ऑटोपार्ट्स की दुकान करने वाले शेखर शर्मा की दुकान और वर्कशॉप को उन्हीं ने जला दिया जिनको उन्होंने औजार पकड़ना सिखाया था

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मुसलमानों द्वारा जलाई गई अपनी जली हुई वर्कशॉप और दुकान दिखाते शेखर।
जिनको मैंने हाथों औजार थमाकर रोजी रोटी कमानी सिखाई उन्होंने ही मुझे बर्बाद कर दिया। मेरा सबकुछ लुट गया। बरसों की मेहनत को खाक करने में उन्हें एक पल भी नहीं लगा। यह कहते हुए शेखर भावुक हो जाते हैं। शेखर की भगीरथी बिहार में ऑटोमोबाइल की वर्कशॉप और ऑटोपार्ट्स की दुकान थी। करीब 20 सालों से वहां दुकान चलाने वाले शेख्र शर्मा कहते हैं, पहले इलाके में इतने मुसलमान नहीं थे। धीरे—धीरे उनकी आबादी बढ़ने लगी। हमें कभी किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई।
सभी से अच्छी पहचान थी, आते—जाते सभी दुआ सलाम करते थे, पिछले 20 वर्षों में कितने ही मुसलमानों के बच्चों को मैंने औजार पकड़ना सिखाया।
इस क्षेत्र में जो काम सिखाता है उसे उस्ताद जी कहा जाता है तो मुझे भी मेरे यहां काम सीखने बच्चे उस्ताद कहते थे। यहां से काम सीखकर कितने ही बच्चे गए और बाद में उन्होंने अपना काम खोला। मेरे यहां रहकर बरसों तक बहुत सारे मुस्लिमों ने काम किया। जो भी काम सीखने आता था मैं उसे मना नहीं करता था। बहुतों को काम सिखाया लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरे साथ ही ऐसा होगा।
शेखर बताते हैं, कि 24 फरवरी दोपहर से से माहौल बिगड़ने लगा था, भजनपुरा, करावलनगर और चांद बाग से हिंसा की लगातार खबरें आ रही थीं, लेकिन यहां पर ऐसा कुछ नहीं था। लगातार घर से फोन आ रहे थे तो मैं पांच बजे ही वर्कशॉप बंद करके घर चला गया। थोड़ी देर बाद किसी परिचित का फोन आया कि इलाके में चुनचुनकर हिंदुओं की दुकानों को निशाना बनाया जा रहा है। मैंने उन लड़कों को भी फोन किया जिन्होंने मेरी दुकान पर कभी काम सीखा था लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। इसके बाद दुकान पर पथराव कर दिया गया। देर रात दुकान और वर्कशॉप दोनों का शटर तोड़ दिया गया, जितना सामान लूटा जा सकता था लूट लिया गया। सारे औजार लूट लिए गए। इसके बाद दुकान में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी गई। 26 फरवरी को जब मैं दुकान पर पहुंचा तो सबकुछ बर्बाद हो चुका था। वहीं आसपास स्थित मुसलमानों की दुकानों पर एक पत्थर तक नहीं फेंका गया था। मैंने उन लोगों से बात की जिनसे बरसों पुराने संबंध थे तो सभी यह कहना था कि हमने आपकी दुकान को बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन दंगाइयों ने किसी की नहीं सुनी। शेखर कहते हैं कि मुझे इस बात पर जरा सा भी विश्वास नहीं है कि किसी ने उनकी दुकान को बचाने की कोशिश की होगी, यदि ऐसा होता तो उनकी दुकान बच गई होती। वह कहते हैं कि 'मैंने दर्जनों मुस्लिम बच्चों को हाथों में औजार पकड़ने सिखाए, वे मेरी ऑटोपार्ट्स की दुकान से सामान लेने भी आते थे, सभी आसपास के ही रहने वाले थे लेकिन किसी ने उनकी दुकान और वर्कशॉप को बचाने की कोशिश नहीं की।' यह पूछने पर भी अब क्या फिर से वहीं पर वर्कशॉप खोलेंगे तो उनका कहना था कि सवाल ही नहीं उठता। अब वह वहां किसी सूरत में दोबारा से अपना काम खड़ा नहीं करेंगे। वह यहां से दूर हिंदू आबादी के बीच जाकर नया काम शुरू करेंगे।