बेकसूर राहुल अफसर बनना चाहता था पर उन्मादी भीड़ ने मार डाला
   दिनांक 05-मार्च-2020
ब्रजपुरी में रहने वाले रेलवे पुलिस फोर्स (आरपीएफ) में नौकरी करने वाले दिलीप सिंह ठाकुर जगाधरी वर्कशॉप में तैनात हैं। उनके बेटे राहुल को 25 फरवरी को उन्मादी भीड़ ने गोली मार दी, गोली दिल के पार हो गई 
 
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राहुल का सपना सरकारी अफसर बनने का था लेकिन 25 फरवरी को उन्मादी भीड़ ने उसे मार डाला।
जब हम उनके घर पहुंचे तो दिलीप सिंह अपनी डेढ़ साल की पोती को गोद में लिए हुए घर के चबूतरे पर बैठे थे। शायद बेटे को खोने के बाद पोती को गोद में लेकर उसके साथ खेल रहे थे। शायद अपने जवान बेटे को खोने का गम कम करने की कोशिश कर रहे थे। परिचय दिया तो उन्होंने अंदर आने को कहा, आवाज दी तो ऊपर से एक बच्चा आया और बच्ची को लेकर चला गया।
दंगों के बारे में हमने बात शुरू की तो उनकी आंखें भर आई। उनके मुंह से सिर्फ यह निकला कि मेरे बेटे का तो कोई कसूर नहीं था, उसने तो कभी किसी से तेज आवाज में बात तक नहीं की आखिर उसे क्यों मार डाला।
कुछ पलों के लिए कमरे में एकदम सन्नाटा हो गया। हम स्तब्ध थे या यू कहें नि:शब्द थे। खैर हिम्मत जुटाकर थोड़ी देर बाद बेटे के गम में भर्राए गले से रुंधी हुई आवाज में दिलीप ने बताया कि वर्तमान में उनकी तैनाती जगाधरी वर्कशॉप में है। फोर्स की नौकरी के कारण उनकी कंपनी को जगह—जगह जाना पड़ता है, इसलिए वह घर पर नहीं रह पाते। वह अपने बच्चों को बचपन ही सही से नहीं देख पाए। बड़ा बेटा बहुत अच्छे से पढ़ लिख नहीं पाया तो उसको उन्होंने मंदिर के पास पूजा का सामान बेचने की दुकान करवा दी, छोटा बेटा राहुल पढ़ाई में होशियार था। हाल ही में उसने ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद 'कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल की' परीक्षा दी थी। कुछ ही दिनों में उसका परीक्षा परिणाम आने को था। दिलीप कहते हैं कि बड़े बेटे की शादी के बाद उन्हें छोटे बेटे राहुल की प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम का इंतजार था, इसके बाद वह खुद भी नौकरी छोड़कर घर आने की सोच रहे थे, ताकि परिवार को पूरा समय दे सकेें, लेकिन ऐसा हो सका।
दिलीप कहते हैं कि मैं रोजाना सुबह और शाम घर पर फोन करके बच्चों और परिवार का हाल—चाल लेता था। सुबह आठ बजे और शाम को करीब सात बजे रोजाना घर पर फोन करता था, यह तो पता ही था कि दिल्ली में दंगे हो रहे हैं। मैंने रोज घर पर फोन करता था और कहता था कि बेटे घर से निकलने की कोई जरूरत नहीं है। 25 फरवरी को मन कुछ बेचैन था तो मैंने साढ़े पांच बजे ही राहुल के फोन पर फोन मिलाया, फोन किसी लड़के ने उठाया उसने कहा कि राहुल भैया को गोली लग गई है और उन्हें जीटीबी अस्पताल लेकर गए हैं।
जैसे ही मैंने यह सुना मेरे पैर लड़खड़ा गए। मैं तत्काल वहां से निकला, सुबह सीधे अस्पताल पहुंचा तो मेरा बेटा कफन में लिपटा हुआ मुर्दाघर में रखा हुआ था। कभी ऐसा नहीं सोचा था। डॉक्टरों से बताया कि उसको सामने गोली मारी गई जो उसके दिल के निचले हिस्से में लगी। अस्पताल पहुंचने से पहले ही वह दम तोड़ चुका था। दिलीप कहते हैं कि अब बस मेरी यही इच्छा है कि मेरे बेटे के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। दिलीप के पड़ोसी सुरेंद्र शर्मा ने बताया कि 25 फरवरी को दंगा हो रहा था। मुस्तफाबाद से आई मुसलमानों की भीड़ पथराव, आगजनी और पथराव करती हुई हिंदुओं के घरों की तरफ बढ़ रही थी। थोड़ी देर पहले ही भीड़ ने अरुण मॉडल स्कूल को फूंका था, स्कूल की अलमारियां लेकर भीड़ सड़कों पर थी। लोहे की अलमारियों की ओट लेकर उन्मादी भीड़ फायरिंग कर रही थी। मोहल्ले के सभी लोग गली के कोने पर जमा थे, फोर्स तब तक नहीं आई थी तो उनके फेंके हुए पत्थर उठाकर भीड़ को गली में घुसने से रोकने की कोशिश कर रहे रहे थे। इस बीच राहुल गोली मार दी गई। हम उसे लेकर अस्पताल पहुंचे लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।