कांग्रेस के पालतू वैचारिक वायरस हैं हर्ष मंदर जैसे लोग
   दिनांक 05-मार्च-2020
हर्ष मंदर सोनिया गांधी के दुलारे हैं. माओवादियों के भी खास हैं. भीमा कोरेगांव हिंसा से करीबी तार जुड़े हैं. यह व्यक्ति एक एक्टिविस्ट का चोला ओढ़ा ऐसा देशद्रोही है, जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खराब करने की कोशिश करता है.

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एक हैं मिस्टर हर्ष मंदर. कांग्रेस के पाले-पोसे अरबन नक्सल. इस बात का सटीक उदाहरण कि कैसे कांग्रेस अपने इन प्यादों को अदालत को गुमराह करने से लेकर सड़क पर हिंसा फैलाने के लिए इस्तेमाल करती है. गौर कीजिएगा, हर्ष मंदर एक ऐसा व्यक्ति है, जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार को मार्गदर्शन के लिए बनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का संस्थापक सदस्य रहा है. वह दिल्ली की सड़कों पर खुले-आम कहता है कि हमें सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास नहीं. हम फैसला सड़कों पर करेंगे. लेकिन साथ ये वैचारिक वायरस कोर्ट को मैनुप्लेट करने की भी कोशिश करता है. वह सड़कों पर भड़काऊ भाषण देता है, सर्वोच्च अदालत की अवमानना करता है और साथ ही कोर्ट में याचिका दाखिल करता है कि भाजपा के कतिपय नेताओं के खिलाफ भड़काऊ भाषण मामले में कार्रवाई की जाए.
अब दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से हर्ष मंदर के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की इजाजत मांग ली है. हर्ष मंदर सोनिया गांधी के दुलारे हैं. माओवादियों के भी खास हैं. भीमा कोरेगांव हिंसा से करीबी तार जुड़े हैं. यह व्यक्ति एक एक्टिविस्ट का चोला ओढ़ा ऐसा देशद्रोही है, जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को खराब करने की कोशिश करता है. वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद से हर्ष मंदर काफी सक्रिय रहा है. दुनिया भर के संचार माध्यमों में उसने आपत्तिजनक लेख लिखे. भीमाकोरेगांव हिंसा पर सोनिया गांधी के इशारे पर नक्सलियों के पक्ष में बयान देता रहा, लेख लिखता रहा. लेकिन अब हर्ष
मंदर अपने ही जाल में फंस चुका है. मंदर दोहरा खेल खेल रहा था. उसने अदालत में याचिका दाखिल की कि भाजपा के कतिपय नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए हैं. दिल्ली हिंसा के परिप्रेक्ष्य में इनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए. मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा. लेकिन यहां बाजी पलट गई. मुख्य न्यायाधीश एस. ए. बोबड़े की खंडपीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी. सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि हर्ष मंदर ने खुद दिल्ली में भड़काऊ भाषण दिया है. मंदर ने महमूद पार्चा के साथ मिलकर एक जनसभा को संबोधित किया था. इसमें मंदर ने कहा कि हमें अब सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा नहीं रह गया है. सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर मामले और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के मसले पर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने में विफल रहा है. अब हमें फैसला सड़कों पर करना होगा.
 
 
आप समझ सकते हैं कि यह किस किस्म का दोमुंहा नाग है. एक तरफ भाजपा नेताओं के खिलाफ अदालत को इस्तेमाल करता है, दूसरी तरफ उसी अदालत पर सवाल उठाते लोगों को भड़काता है कि फैसला सड़कों पर होगा. दिल्ली हिंसा, इसे भड़काने में कांग्रेस की भूमिका के मद्देनजर आप समझ सकते हैं कि मंदर सड़कों पर किस तरह के फैसले की बात कर रहा है. यानी वह डायरेक्ट एक्शन की बात कर रहा है. जिसका जिहादी नमूना अभी देश ने दिल्ली में देखा है.
जब सॉलीसिटर जनरल ने अदालत को इस बात से अवगत कराया न्यायालय ने तत्काल कहा कि पहले हम इसी मामले पर सुनवाई करेंगे. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर आप अदालत के बारे में ऐसा महसूस करते हैं, तो हम आपको नोटिस जारी करते हैं. अदालत ने एसजी से उस वीडियो के बारे में भी पूछा, जिसमें मंदर ये सब कह रहा है. एसजी ने बताया कि ये तो पब्लिक डोमेन पर है. मुख्य न्यायाधीश इस बात पर बहुत नाराज दिखे. उन्होंने मंदर के वकील करूणा नंदी से कहा कि अगर आपकी अदालत के बारे में यही राय है, तो हमें यह तय करना होगा कि आपके साथ क्या किया जाए. मंदर के वकील के पास भी कोई पुख्ता जवाब नहीं था. उन्होंने कहा कि हमें इसकी कोई प्रतिलिपि नहीं दी गई है. सरकार की ओर से जवाब दिया कि ये तो आपके मुवक्किल ही कह रहे हैं. अदालत ने तुषार मेहता को आदेश दिया कि मंदर के उस भाषण की ट्रांसक्रिप्ट मुहैया कराई जाए. दिल्ली पुलिस ने भी इस मामले में अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की इजाजत मांगी है.
तुषार मेहता ने अदालत को याद दिलाया कि हर्ष मंदर इसी तरीके से एक बार पहले भी अदालत के साथ पैंतरेबाजी कर चुके हैं. तब मामला असम के घुसपैठियों जैसा संवेदनशील था. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई उसकी सुनवाई कर रहे थे. मंदर बतौर वादी ये मांग कर डाली थी कि इस मामले की सुनवाई से मुख्य न्यायाधीश गोगोई स्वयं को अलग कर लें. मंदर की हिम्मत देखिए, उसने अदालत में दलील दी कि मुख्य न्यायाधीश इस मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकते हैं. ये बातें अदालत को बहुत नागवार गुजरी थीं.
अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा था कि हम किसी को भी प्रतिष्ठान को नुकसान पहुंचाने की छूट नहीं देंगे. अपने किस्म के अनूठे कदम में अदालत ने बतौर वादी मंदर का नाम तक याचिका से खारिज कर दिया था. बताया जाता है कि मंदर माहौल देखते हुए विदेश भाग गया है. दशकों तक देश के तमाम सिस्टम को अपने हिसाब से मैनुप्लेट करने वाले ये वायरस सोच ही नहीं सकते थे कि उनकी पोल इस तरह खुल जाएगी. इस समय चौतरफा मांग हो रही है कि मंदर की गिरफ्तारी की जाए. सुप्रीम कोर्ट के तेवर को देखते हुए भी लगता नहीं कि मंदर एंड कंपनी इस मामले में सस्ते में छूट पाएगी.