विदा हो रहा मैं
   दिनांक 06-मार्च-2020
उनके जीवन की कहानी एक शाश्वत व अमर प्रकाश की भांति है, जिसमें इनके जीवन के कालातीत क्षणों की सजीवता है जो अन्य लोगों को जीवन को गुण संगत बनाने के लिए प्रेरित करती है। अपने जीवन का क्षण - क्षण और शरीर का कण - कण समर्पित कर दिया ऐसे कर्म योगी माननीय परमेश्वरन जी अब हमारे बीच नहीं हैं। कभी आराम न मांगने वाले विश्राम न मांगने वाले चरैवेति चरैवेति ऐतरेय उपनिषद का यह मंत्र अपने जीवन में एकात्म करने वाले परमेश्वरन जी हमारी जैसी भावी पीढ़ी के लिए पग पग पर मार्गदर्शक का काम करेंगे। (पी. परमेश्वरन जी की 'विदा हो रहा मैं' शीर्षक से मूलत: मलयालम में लिखी इस कविता का हिन्दी में भावानुवाद प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंद कुमार ने किया )

p prameshwaran _1 &n

विदा हो रहा मैं
 
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब
फिर भी इधर मैं अधिक बसा हूं,
ऐसा लगता आज मुझे है।
पुष्प और सुगंध एक हो
अभिन्न हो कर घर के साथ
इधर अगर अब भी रहना है
विरह और दु:सह्य होगा
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब
* * *
अतिथि गृह ही स्वगृह मानना
ऐसा विभ्रम मन में था
लालन पालन करने वाले
सब को बांधव माना था
मात्र पहनने दिये आभूषण
मेरे हैं ऐसा सोचा
अब जाने इस घर में केवल
मैं अभ्यागत यात्री हूं
उदारता की मर्यादा है
अवश्य यह अतिथि जाने
करुणा के प्रति कृतज्ञ होकर
जाना है मुझको जल्दी
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब
* * *
सुनता हूं मैं सुनता हूं मैं
बुला रहा अब जनमस्थान है
जिनको खोज रहा मैं अब तक
जाग गई हैं विस्मृतियां सब
कोमल और प्रफुल्लित बचपन
आकर मन में नाच रहा
अश्रु बरसाती चक्षु से माता
राह देखती व्याकुल मेरी
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब
* * *
आता हूं मैं पल भर रुककर
खेल और गीत में रमता हूं
आता हूं मैं अंतरदाह भरा
मार्ग देखकर आता हूं
रोको मत अब कृपा कर मुझे
बांध शृंखला अब कोई
नहीं बुलाना वापस फिर से
पीछे से आकर मुझको
नहीं डिगाना मेरे मन को
हंसकर या अश्रु भरकर
सुदूर जलते मेरे घर में
तेजपूर्ण सन्ध्यादीप आज
उसके सामने बैठूं जपते
मंगल मंत्रध्वनि का ताल
वह है मेरा लक्ष्य आज का
खोज जीवन का मोक्षमार्ग
बिना रुके मैं सन्मुख आऊं
रास्ता मेरा दिखता साफ
आज बुलाता पुन: बुलाता
मेरा जन्मगृह मुझे बुलाता
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब।
* * *
शाश्वत है क्या पता नहीं
घर आश्रय वही मगर
वहां पहुंचकर हैं सो सकते
पूर्णशांति से आत्मशांति से
अश्रु नमक के साथ मिलाया
चावल लेना रुचि से मां का
बन्धुजनों के संग बैठकर
संतुष्टि से भोजन लेना
उगते और स्मृति बरसाते
थल से गरमी बांटकर लेटना
आंख मूंदना होगा वह लेकिन
पता नहीं वह खोलेगा कब
निद्रा या जागरण देगा ज्यादा
निश्चित मुझे नहीं पता सच
अनुभव से वे दोनों मिलकर
अभिन्न होगा बाद में शायद
विदा हो रहा मैं, विदा हो रहा मैं
पर्व दिन सब पूर्ण हुए अब।।