ये हैं वो चेहरे जिनके कारण भड़के दंगे और जली दिल्ली !
   दिनांक 07-मार्च-2020
कपिल मिश्रा के सड़क खाली करने वाले बयान को दंगे की वजह बतलाया जा रहा है. सड़क खाली करने को तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था. दिल्ली की सारी जनता कह रही थी. इसका दंगे से क्या लेना-देना? वो सारे नेता जो बिना सबूत, झूठे आरोप लगाकर सीएए को मुस्लिम विरोधी बतलाते रहे, देश की संसद, न्यायालय, पुलिस और प्रशासन पर मुस्लिमों के साथ अन्याय करने वाला चित्रित करते रहे, वो सब इन दंगों के जिम्मेदार हैं. उकसाने वाले बयानों की टाइमलाइन इस प्रकार है. 
दिल्ली को सुलगाने वाले लोग कह रहे थे “इस पार या उस पार का फैसला करने का वक्त आ गया है.. कायर नहीं कहलाना है.. जहां खड़े हैं, वहीं नमाज़ पढेंगे, वही मस्जिद है... लाखों लोग डिटेंशन सेंटर में बंद है.. मुल्क में शरिया (इस्लामी क़ानून) लाएंगे... सुप्रीम कोर्ट ने मानवता की रक्षा नहीं की.. देश और राष्ट्रवाद हमारे दुश्मन है.. बर्बाद करने पर आए तो छोड़ेंगे नहीं”
 
14 दिसंबर 2019, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा

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14 दिसंबर को सीएए विरोधी रैली में पूरा सोनिया गांधी परिवार लोगों को उकसा रहा था. सीएए – एनआरसी के खिलाफ झूठ फैलाते हुए कांगेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भड़काया “कभी-कभी ऐसा वक्त आता है कि इस पार या उस पार का फैसला लेना पड़ता है. आज वही वक्त आ गया है. ..” राहुल गांधी “दबाए जाने- कुचले जाने” का जिक्र करते हुए बोले “जिम्मेदारी आपकी भी है. जब आपको दबाया जाता है, धमकाया जाता है, कुचला जाता है, आप पर आक्रमण होता है, तो ये हिंदुस्तान की आत्मा पर आक्रमण हो रहा है. डरो मत . आपके साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी है... जो आज डर है, डर का माहौल है, इस माहौल को हिंदुस्तान की जनता कांग्रेस पार्टी सब मिलकर मिटा डालेंगे,..” प्रियंका ने कायर कहलाने की चुनौती दी . बोलीं “..ऐसे कानून बनाए जाते हैं जिससे लाखों नागरिक बंदी की तरह रखे जाते हैं. जो आज अन्याय के खिलाफ नहीं लड़ेगा, वो इतिहास में कायर कहलाएगा. इस देश की मिट्टी प्यारी है तो मन बना लो. साहस बांधो...” तीनों मिलकर मानो किसी फौज को जंग लड़ने के लिए ललकार रहे थे.
16 दिसंबर 2019, हर्ष मंदर

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सभी कम्युनिस्ट नेता, छद्म सेक्युलर दलों के प्रमुख और इनकी कमान में इनके छुटभैये, शहर दर शहर माहौल बिगाड़ने में अपना योगदान देते रहे. ‘इकोसिस्टम’ भी पूरी ताकत से सक्रिय था. हर्ष मंदर ने 16 दिसंबर 2019 को जामिया मिलिया इस्लामिया में भाषण दिया - “CAA के विरोध कि लड़ाई न तो अब संसद में लड़ी जाएगी न ही सुप्रीम कोर्ट में. क्योंकि हमने सुप्रीम कोर्ट को देखा है पिछले कुछ वक्त से एनआरसी के मामले में, अयोध्या के मामले में, कश्मीरे के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने इंसानियत, समानता और सेकुलरिज्म की रक्षा नहीं की है. हम ........ अब ये फैसला न संसद में न सुप्रीम कोर्ट में होगा... आप सब नौजवान हैं.... ये फैसला कहां होगा; ये फैसला सड़कों पर होगा ” इसके पहले असम एनआरसी के मामले में हर्ष मंदर ने एक याचिका दायर की थी कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई इस मामले की सुनवाई न करें क्योंकि वे बायस्ड (पक्षपाती) हैं और उनकी जगह कोई और जज इसकी सुनवाई करे.
शरजील इमाम, 16 जनवरी

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ज़हर उगलते हुए जेएनयू के 31 वर्षीय छात्र शरजील ने कहा – “अगर 5 लाख लोग हों हमारे पास तो हम नॉर्थ ईस्ट को स्थायी रूप से काटकर अलग सकते हैं. स्थायी न भी सही, तो एक-आध महीने के लिए तो काट ही सकते हैं. असम को काटना हमारी ज़िम्मेदारी है, असम और इंडिया कट कर अलग हो जाएं तभी ये हमारी बात सुनेंगे... असम में लोगों को डिटेंशन सेंटर में डाला जा रहा है, वहां कत्लेआम चल रहा है. 6 महीने में पता चलेगा कि सारे बंगालियों को मार दिया गया है, हिंदू हो या मुसलमान. असम की मदद करने के लिए हमें फ़ौज और दूसरी सप्लाई का असम का रास्ता बंद करना होगा. और हम ये कर सकते हैं, क्योंकि चिकननेक मुसलमानों का इलाका है..."
“राष्ट्रवादी हमारे दुश्मन हैं... बाहर के लिए जो पर्दा रखना हो वो अलग बात है”-शरजील
“हम एक ऐसा मुस्लिम बुद्धिजीवियों का समूह बनाएं जिसमें आपस में ये बहस न हो कि हम नेशनलिस्ट हैं कि नहीं. बाहर के लिए जो पर्दा रखना हो वो अलग बात है, कि जैसे अभी हमें चुप रहना है, कि इंडिया सेक्युलर कंट्री है, या कहां बोलना, कहां नहीं बोलना, या आज हालात ठीक नहीं हैं, कल जब ठीक हो जाएंगे तो बोलेंगे. ये स्पष्टता उन बुद्धिजीवियों में हो कि हम हिंदुस्तान के निज़ाम (शासन) और आईन (संविधान) से परेशान हैं. .....लोगों को वापिस भेजा गया, मारा गया. साथ ही सुरक्षा बलों की बर्बरता के बारे में भी बताएं, चाहे कश्मीर हो, जामिया हो, अलीगढ हो, इनकी भी बात बताएं.
आवाम में जो ज्यादा नेशनलिज्म बोले वो हमारा दुश्मन है, ये साफ़ है. जो बुत की पूजा करने के लिए बार-बार हमें मजबूर कर रहा है, .....ये हम पर मुसल्लत किया गया है. और हमारी ज़िम्मेदारी है इसे तोड़ना, भले ही इसमें समय लगे. पर हमारी आवाम को समझ में आना चाहिए कि वो इस निज़ाम में फंसे हुए हैं...”
“मुसलमानों पर दुश्मन कौम मुसल्लत है..... गांधी सबसे बड़ा फासिस्ट.. गांधी और देश हमारे दुश्मन” -शरजील
1950 में मुस्लिमों को आज़ादी नहीं मिली थी. ...... मुसलमानों पर एक दुश्मन कौम मुसल्लत कर दी गयी. अंग्रेज़ हमारे कम दुश्मन थे. 1950 के बाद के साल ज्यादा कॉलोनियल ज्यादती के हैं अब जरूरत है कि हम बुद्धिजीवी लोगों का ऐसा सेल बनाएं जिसे गाँधी-देश जैसी चीज़ों से कोई लगाव न रहे, ये स्पष्टता हो, कि ये लोग हमारे दुश्मन हैं. 20वीं सदी का सबसे फासिस्ट नेता अगर कोई है तो वो है गांधी, ये हमें पता होना चाहिए; गोरक्षा कौन लाया, रामराज्य कौन लाया, कांग्रेस को हिंदू पार्टी किसने बनाया ?.."
“जहां खड़े हैं, वहीं नमाज़ पढेंगे... वही मस्जिद है... राष्ट्रीयता काबिल-ए-क़ुबूल नहीं हो सकती ” -शरजील
".... ऐसे मुस्लिम लेखक हैं जो देश और राष्ट्रीयता जैसी बातें करते हैं. ये बात कभी भी काबिल-ए-क़ुबूल नहीं हो सकती कि आप नेशन ऑफ़ इंडिया को सपोर्ट करें. हमें अपनी तारीख खुद लिखनी होगी और इसमें मेहनत लगती है....जहां मुसलमानों की आबादी 40 प्रतिशत के करीब हो वहां इन लोगों कि हिम्मत नहीं होती हमला करने की, स्टेट सपोर्ट के बिना.... नमाज़ और पूजा में अंतर है. नमाज़ हमारे शिड्यूल का हिस्सा है. हम जहां खड़े हैं, वहीं नमाज़ पढेंगे, वही मस्जिद है... “
शरजील इमाम की इन बातों को वामपंथी पत्रिकाओं और लेखकों ने “बचपना” बताया, और कहा कि इस 31 साल के "बच्चे" के खिलाफ बेवजह कार्रवाई हो रही है. शाहीन बाग़ के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने शरजील को अपने अनेक आयोजकों में से एक बताया. प्रतिक्रिया बेहद सोची-समझी और शरजील का समर्थन करते हुए मीडिया पर उंगली उठाने वाली थी. इस बयान में करीने से सजाए गए शब्दों में “सेक्युलर फैब्रिक ऑफ़ इंडिया” की दुहाई दी गई लेकिन शरजील के बयान की निंदा नहीं की, और कहा कि मीडिया में पेश किए जा रहे तोड़े-मरोड़े विमर्श को शाहीन बाग़ से जोड़ना अन्याय है. शाहीन बाग़ के बयान में कहा गया कि शाहीनबाग़ की आयोजक तो "हजारों महिलाएं" हैं. इस तरह भीड़ को सामने करके जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा जाता रहा. कितना अच्छा है न,.. भाषण होते हैं..सीटियां-तालियां बजती हैं. लेकिन जिम्मेदारी किसी की नहीं है. आयोजक कौन है ये भी आप तय नहीं कर सकते. आयोजक एक भीड़ है, इसलिए सड़क बंद रहेगी , माहौल खराब किया जाता रहेगा , क्योंकि भीड़ का कोई कुछ नहीं कर सकता.
इस बयान का जवाब देते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा “ कोई ‘एक आदमी’ नहीं, कोई ‘एक संगठन’ नहीं लेकिन बिरयानी समय पर पहुंच जाती है. तुमने सचमुच नया रास्ता दिखाया है “बिना मुखिया” के संगठन का.....”
21 जनवरी, अकबरुद्दीन ओवैसी

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हिंदुओं को 15 मिनट पुलिस हटाने की धमकी देने वाले अकबरुद्दीन ने कहा “ तू मेरे कागज़ देखना चाहता है, अरे 8 सौ साल तक मैंने इस मुल्क पर राज किया है. 8 सौ साल तक मेरे बाप-दादा ने इस मुल्क पर हुक्मरानी और जंगबाज़ी की है. ये मुल्क मेरा था, मेरा है, मेरा रहेगा. इस मुल्क के चप्पे-चप्पे पर मेरी अज़मत की निशानियां मौजूद हैं, मेरे पूर्वजों ने इस मुल्क को चार मीनार दिया, क़ुतुब मीनार दी, मक्का मस्जिद दी, जामा मस्जिद दिया,.... तेरे बाप-दादा ने क्या दिया? ..”
फैजुल हसन 21 जनवरी

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इस पूर्व अध्यक्ष ने यूनिवर्सिटी के छात्रों को भड़काया “..हिन्दुस्तानी मुसलमानों का सब्र देखिये, 1947 से 2020 कभी कोशिश नहीं कि कि हिन्दुस्तान टूटे वर्ना रोक नहीं पाएंगे. हम वो कौम से हैं जो बर्बाद करने पर आए तो छोड़ेंगे नहीं किसी भी देश को, बर्बाद कर देंगे. इतना गुस्सा है, इतने जज़्बात हैं... “
2 फरवरी, अमानतुल्लाह खान, आप विधायक

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: “वोट डालने से पहले ये सोच लेना कि ये लाइन चाहे कितनी भी लम्बी क्यों न हो, इसकी तकलीफ डिटेंशन कैंप की तकलीफ से कम है... आप ज़रिया बनेंगे आम आदमी पार्टी के 70 सीटें जीतने का...... अल्ल्लाह ने तय किया है कि इन जालिमों का खात्मा होगा ... हम शरिया बनेंगे.”
जब दिल्ली का दंगा शांत हो गया तो 1 मार्च को अमानतुल्लाह ने झूठा ट्वीट किया कि अंबे एन्क्लेव सोनिया विहार में एक गरीब और कमज़ोर के घर को दंगाइयों ने आग के हवाले कर दिया है. अग्निशमन विभाग ने बताया कि ये एक मामूली आग लगने की घटना थी जिसका दंगे से कोई लेना-देना नहीं था.
15 फरवरी, वारिस पठान, असदुद्दीन ओवैसी की मौजूदगी में

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“आज़ादी लेनी पड़ेगी, और जो चीज़ मांग कर नहीं मिलती उसे छीन कर लेना पड़ेगा.... 15 करोड़ हैं पर 100 करोड़ पर भारी हैं याद रख लेना... अभी तो शेरनियां बाहर निकली हैं तो तुम्हारी ये हालत है. यदि हम बाहर निकल पड़े तो... “
17 फरवरी, उमर खालिद

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23 फरवरी को दंगा भड़का. इसकी तैयारी पहले ही कर ली गई थी, इसकी गवाही देता है उमर खालिद का बयान. 17 फरवरी को अमरावती में जेएनयू देशद्रोह केस में आरोपी ने ऐलान किया था कि कैसे 24 तारीख को ट्रंप दौरे के दौरान दिल्ली में प्रदर्शन किए जाएंगे . खालिद ने कहा “जब 24 फरवरी को डोनाल्ड ट्रम्प हिंदुस्तान आएंगे तो हम उनको बताएंगे कि हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री और हिंदुस्तान की सरकार हिंदुस्तान को बांटने का काम कर रही है.... हिंदुस्तान की आवाम हिंदुस्तान के हुक्मरानों के खिलाफ लड़ रही है .... हम तमाम लोग सड़कों पर निकल कर आएंगे... ये लड़ाई बहुत लम्बी है कभी मायूस मत होइएगा. ”
साफ़ है कि आग लगाने वाले लोग कौन थे और कौन चाह रहा था कि बखेड़ा खड़ा हो जाए. ये बयान सब कुछ बयान कर रहे हैं. इन बयानों में अन्य छद्म सेकुलर नेताओं द्वारा देशभर में दिए गए भड़काऊ बयानों को शामिल नहीं किया गया है. सोशल मीडिया में चले दर्जनों उत्तेजक और खून-खराबे की धमकी वाले मुस्लिम नेताओं के बयानों का भी यहां उल्लेख नहीं किया है.