हर्ष मंदर जैसे बुद्धिजीवियों का गठजोड़ देश के लिए घातक
   दिनांक 09-मार्च-2020
हर्ष मंदर एक तंत्र का नाम है. एक गठजोड़ का नाम है. इस गठजोड़ में विदेशी एनजीओ, मिशनरी संस्थाएं, कट्टरपंथी इस्लामी संगठन, कुछ मीडिया संस्थान, कांग्रेस और वामपंथी संगठन, शहरी नक्सली सब मिलकर काम करते हैं. जैसा कि सीएए के विरोध में देशभर में किए गए बवाल और फसाद से सामने आया

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किसी के बहुमुखी योगदान के बारे में बतलाना हो तो कहा जाता है कि वो व्यक्ति नहीं संस्था हैं. लेकिन यदि किसी के नकारात्मक कामों के सिलसिले और संबंधों की चर्चा करनी हो तो कहा जा सकता है कि वो अकेला आदमी नहीं बल्कि पूरा गिरोह है. हर्ष मंदर, को आप हर उस जगह पाएंगे, जहां देश या हिंदू समाज के बारे में कोई नकारात्मक बात हो रही हो. “बाबरी मस्जिद प्रमाणित तथ्य है, राम जन्मभूमि हिंदुओं का विश्वास मात्र है.” नवंबर 2019 में जब अदालत दशकों लंबी सुनवाई के बाद राम जन्मभूमि के पक्ष में फैसला सुना चुकी थी, हिंदुओं का दावा साबित हो चुका था तब अदालत में कुछ वामपंथी “एक्टिविस्ट” और “बुद्धिजीवी” उपरोक्त याचिका लेकर पहुंचे. इनमें थे हर्ष मंदर, इरफ़ान हबीब और नंदिनी सुन्दर. हर्ष मंदर वो व्यक्ति है, जो राम जन्मभूमि पर पेश किए गए पुरातात्विक साक्ष्यों, साहित्यिक और ऐतिहासिक तथ्यों और उनके आधार पर दिए गए अदालत के फैसले को मानने को तैयार नहीं हैं, और बाहर, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जाकर भाषण देते हैं कि अयोध्या मामले में न्यायालय ने सेकुलरिज्म की रक्षा नहीं की. हर्ष मंदर 370 हटाए जाने का विरोध करते हैं. हर्ष मंदर की सीएए के विरोध में दी गईं दलीलें हैरान करती हैं कि एक भूतपूर्व नौकरशाह इतनी सी बात नहीं समझ पा रहा है कि सीएए का भारत के किसी नागरिक से लेना-देना नहीं है और समानता का मतलब पीड़ित और पीड़क को एक तराजू में तोलना नहीं होता. मंदर के एनजीओ ‘कारवां ए मोहब्बत’ ने खुलकर शाहीन बाग़ का समर्थन किया, और अपने समर्थकों से शाहीनबाग़ धरने में शामिल होने की अपील की. मंदर ने 10 दिसम्बर 2019 को ट्वीट किया कि “यदि सीएए क़ानून बना तो मैं खुद को मुस्लिम लिखवाउंगा और एनआरसी के लिए कागज़ नहीं दिखाउंगा.” हर्ष मंदर को एनआरसी से ऐतराज है. हर्ष मंदर को छल-बल से होने वाले मतांतरण को रोकने वाले क़ानून पर ऐतराज है. इस क़ानून को समाप्त करना चाहिए इस तरह का माहौल बनाने का मंदर का प्रयास बरसों से जारी है.
सोनिया गांधी का साथ और वो बदनाम बिल 

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यूपीए सरकार के समय सोनिया गांधी की एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति हुआ करती थी, नेशनल एडवायज़री काउंसिल, जिसे सोनिया गांधी की किचिन कैबिनेट कहा जाता था. जिसमें जमाने भर से लाए गए वामपंथी हुआ करते थे, जो केंद्र सरकार के मंत्रीमंडल को दरकिनार करने की ताकत रखते थे. हर्ष मंदर उसी किचिन कैबिनेट के जगमगाते सितारे थे. हर्ष मंदर ने अपने इन्ही साथियों के साथ मिलकर कुख्यात सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा बिल का मसौदा तैयार किया था जो कि “अल्पसंख्यकों” को विशेषाधिकार या कहें सुपर पावर देता था कि वो बहुसंख्यक समाज को इस क़ानून के आधार पर प्रताड़ित कर सकता था. इस बिल के प्रावधान व्यावहारिकता के धरातल पर इतने खतरनाक होते कि “अल्पसंख्यक” और बहुसंख्यक में यदि राह चलते टक्कर हो जाए, यदि बहुसंख्यक किसी अल्पसंख्यक को अपना घर किराए से देने से मना कर दे, तो अल्पसंख्यक की मामूली सी शिकायत पर बहुसंख्यक पर क़ानून टूट पड़ता, उसे जेल जाना पड़ता. किसी गांव-कस्बे में हिंदू संगठन के किसी कार्यकर्ता पर कोई अल्पसंख्यक आरोप लगाता तो क़ानून उस संगठन के प्रादेशिक या राष्ट्रीय पदाधिकारी को भी गिरफ्त में ले सकता था. इस मसौदे के अनुसार यदि अल्पसंख्यक द्वारा किसी बहुसंख्यक वर्ग की महिला के साथ दुराचार किया जाए तो सामान्य क़ानून के हिसाब से कार्रवाई होती लेकिन यदि महिला अल्पसंख्यक और आरोपी बहुसंख्यक होता तो कठोर कार्रवाई- सजा होती और आरोपी की संपत्ति से उस महिला को मुआवजा दिया जाता. इस विधेयक के अनुसार बहुसंख्यक समाज के किसी आयोजन के बाद सांप्रदायिक तनाव फैलता तो पुलिस और प्रशासन की गलती मानी जाती, याने ये बिल पुलिस-प्रशासन को बहुसंख्यकों के आयोजनों पर सख्ती करने के लिए मजबूर करता था, जबकि दूसरे वर्ग को मौक़ा देता कि वो अवसर विशेष का लाभ उठाएं. यह विधेयक अल्पसंख्यक वर्ग के अपराधी की शिकायत पर उसके मामले को देख रहे पुलिस अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई का प्रावधान करता था. इस कुख्यात विधेयक के प्रमुख रचनाकार थे हर्ष मंदर. पूरे देश के प्रखर विरोध के बाद सोनिया गांधी और मनमोहन सरकार ने इस बदनाम विधेयक से अपने हाथ पीछे खींच लिए.
कसाब, अफजल गुरु और याकूब मेनन के रक्षक
एक तरफ देश के बहुसंख्यकों को कानूनी सूली लगाने को तैयार मंदर के मन में जिहादी आतंकियों के लिए बड़ी ममता रही है. देश को याद है कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन की फांसी रुकवाने को कुछ लोगों ने अदालत के चक्कर लगाए थे, हर्ष मंदर उन्ही लोगों में से एक हैं. कसाब की फांसी रोकने को जिन्होंने पसीना बहाया, मंदर उनमे से एक हैं. जिहादी आतंकी इशरत जहां के लिए आंसुओं की धार लगाने वालों में हर्ष मंदर का नाम प्रमुख है. संसद हमले के अपराधी अफजल गुरु की फांसी रुकवाने की याचिका लगाने वालों में एक याचिकाकर्ता हर्ष मंदर हैं.
झूठ पर झूठ

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मुसलमानों को भड़काने वाले, झूठ से भरे हुए लेख लिखने के चलते पाकिस्तानी पीएम इमरान खान करते हैं हर्ष मंदर के लेखों को साझा.
देश के मुसलमानों को भड़काने वाले, झूठ से भरे हुए लेख लिखने की मंदर की विशेष योग्यता है. 2018 में मंदर के एक लेख को इमरान खान ने सोशल मीडिया पर साझा किया जिसमें लिखा गया था कि “..(मोदी सरकार आने के बाद) भारत के मुसलमानों के लिए सबसे खराब समय चल रहा है. मुसलमानों ने इतना बुरा वक्त देश के विभाजन के समय भी नहीं देखा था. आज मुसलमान बहिष्कृत हैं, राजनीतिक रूप से अनाथ हैं...” इस प्रकार की भड़काऊ –झूठी बातें मंदर बेहिचक सार्वजनिक मंचों से, मुस्लिम आयोजनों में और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में कहते लिखते हैं. असम में एनआरसी को लेकर हर्ष मंदर ने एक भ्रमात्मक लेख, एक बड़े अंग्रेजी दैनिक के लिए लिखा था, जिसमें वामपंथी –मिशनरी एजेंडा तो था ही,अनेक बातें तथ्यों से परे भी थीं, जैसे कि सरकार के ऊपर जिम्मेदारी होगी कि वो इन लाखों लोगों को विदेशी साबित करे, जिस कारण प्रशासन पर बहुत बड़ा बोझ आएगा. यह असत्य है. वास्तव में व्यक्ति को स्वयं ही ये साबित करना होता है कि वो देश का नागरिक है. फॉरेनर एक्ट इस बारे में बिलकुल स्पष्ट है. एक अन्य झूठ जो इस लेख में लिखा गया कि लोग नागरिकता साबित करने के लिए वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं और मोटी फीस दे रहे हैं. यह भी झूठ है. वास्तव में एनआरसी की प्रक्रिया से वकीलों का कोई लेना-देना ही नहीं है. या तो आपके पास नागरिकता प्रमाणित करने वाले वांछित कागज़ हैं या नहीं हैं. इतना सीधा मामला है. यदि कागज़ किसी सरकारी कार्यालय से प्राप्त करने हैं तो वो भी आवेदक और संबंधित कार्यालय का मामला है. इस पूरे लेख में एनआरसी के समर्थन में उठ रही असम के लोगों की आवाज का जिक्र नहीं है जो कि अवैध घुसपैठ से परेशान हैं और अपने ही शहर-कस्बों में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं.
हिंदू विरोधी गिरोहों की श्रंखला
हर्ष मंदर ने शबनम हाशमी, और मार्क्सवादी इतिहासकार के एन पनिक्कर के साथ मिलकर अनहद नामक एनजीओ स्थापित किया. यह संस्था लगातार हिंदू विचार और हिंदू संगठनों के खिलाफ वामपंथी दुष्प्रचार का एजेंडा चला रही है. इटली के शक्तिशाली नेताओं और चर्च द्वारा स्थापित संगठन एपीआई से भी हर्ष मंदर जुड़े हैं. इस संस्था की स्थापना एक इतालवी अभिनेत्री ने की थी, और उद्घाटन रोम के मेयर ने किया. संस्था को इटली सरकार का सक्रिय सहयोग प्राप्त है. संस्था की वेबसाइट के अनुसार इसे इतालवी प्रधानमंत्री कार्यालय का वरदहस्त मिला हुआ है और यह इटली सरकार के विदेश विभाग के मार्गदर्शन में काम करती है. रायटर्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एपीआई इटली सरकार समर्थित एक संगठन है जो “कनफ्लिक्ट प्रिवेंशन एंड रेजोल्यूशन के लिए समर्पित” है.ये खुलासा कि, एक देश की सरकार द्वारा समर्थित संगठन जो कनफ्लिक्ट प्रिवेंशन याने संघर्ष रोकने की दिशा में काम करता है, इसकी जड़ें इटली के खुफिया संस्थान से जुड़ी होने की ओर इशारा करता है.
मोदी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़

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हंगेरियन-अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सॉरोस का एक संगठन है, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन. इस संगठन से जुड़े भारतीय ‘बुद्धिजीवी’ हैं – इंदिरा जयसिंह, प्रताप भानु मेहता, अमर्त्य सेन और हर्ष मंदर. जॉर्ज सॉरोस के जीवन का लक्ष्य है दुनिया से “राष्ट्रवाद” को ख़त्म करना. दुनिया में राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए सॉरोस ने 100 करोड़ डॉलर खर्च करने की बात की है. भारत के बारे में अधकचरी जानकारी भरे जॉर्ज सॉरोस के बयान आते रहते हैं. सॉरोस ने प्रधानमंत्री मोदी को और “हिंदू नेशनलिज्म” को बड़ा ख़तरा बताते हुए कहा है कि भारत में कश्मीर के लोगों पर अत्याचार हो रहा है, और मोदी सरकार द्वारा नए क़ानून लाकर भारत के मुसलमानों को भारत की नागरिकता से वंचित किया जा रहा है. जॉर्ज सॉरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन उससे जुड़े संगठनों को कानूनी लड़ाई लड़ने और मीडिया विमर्श को प्रभावित करने के लिए लाखों डॉलर उपलब्ध करवाता है. सॉरोस ने सार्वजनिक रूप से “मोदी सरकार और उसके राष्ट्रवाद” से लड़ने की घोषणा कर रखी है. सॉरोस से जुड़ी अनेक संस्थाएं भारत में काम कर रही हैं.
ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से सहायता पाने वाले संगठनों में प्रमुख हैं, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क और फ़्रांस का एनजीओ शेरपा. ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क ने इस्कॉन मंदिरों की निशुल्क भोजन सेवा ‘अक्षय पात्र’ को बंद करवाने की मुहिम चलाई. यह भारत के राजद्रोह क़ानून को समाप्त करने के लिए अभियान चला रहा है. शेरपा ने ही फ़्रांस में भारत से किए गए रफाएल सौदे के खिलाफ वहां की अदालत में याचिका दायर की थी. इन सबके मूल में जॉर्ज सॉरोस का जो ओपन सोसाइटी फाउंडेशन है, हर्ष मंदर उसके मानवाधिकार सलाहकार बोर्ड के चेयरमैन हैं. अरबपति जॉर्ज सॉरोस का अमेरिका के क्लिंटन परिवार और डेमोक्रेटिक पार्टी से भी गहरा संबंध है.
मुट्ठी में मीडिया 
जॉर्ज सॉरोस का अमेरिका के मीडिया पर भी बड़ा व्यापक प्रभाव है. साल 2003 के बाद से जॉर्ज सॉरोस ने मीडिया संस्थानों को विभिन्न रूपों में 48 मिलियन डॉलर की सहायता दी है. अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग को भी बड़ी धनराशि दी गई है. अमेरिका की मीडिया का विश्लेषण करने वाली संस्था ‘मीडिया रिसर्च सेंटर’ के अनुसार जॉर्ज सॉरोस की अमेरिका के 30 प्रमुख समाचार संस्थानों पर पकड़ है, जिनमें न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, सीएनएन , एनबीसी , एबीसी , हफिंग्टन पोस्ट और दि असोशिएट प्रेस शामिल हैं. इनमे से अनेक समाचार पत्रों में बरखा दत्त, सोमा बासु आदि ने दिल्ली दंगे के बारे में रिपोर्ट/लेख लिखे थे, जिनमें इस दंगे को हिंदू दंगा बताया गया था, और सिर्फ मुस्लिम मृतकों के नाम लिखे गए थे. एक भी हिंदू मृतक का नाम प्रकाशित नहीं किया गया .यहाँ तक कि जिहादियों के हाथों मारे गए आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, हेड कांस्टेबल रतनलाल और गंभीर रूप से घायल डीसीपी अमित शर्मा का भी जिक्र नहीं था. इसी सिलसिले में याद करें कि , 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के समय विदेशी मीडिया में किस प्रकार मोदी विरोधी लेख और विश्लेषण प्रकाशित किए गए थे.
हिंदू विरोधी “एक्टिविज्म”
दिल्ली दंगे के दौरान जब चंद “सेकुलर” पत्रकार विदेशी मीडिया में इसे “हिंदू दंगा” साबित करने और हिंदू मौतों को छिपाने में लगे हुए थे, तब हर्ष मंदर ने भी मुस्लिमों में कुंठा और आक्रोश जगाने में अपना भरपूर योगदान दिया. हर्ष मंदर को शाहीन बाग़ में “सड़क खाली करने” संबंधी कपिल मिश्रा का बयान इतना नागवार गुजरा कि वो इसे “हेट स्पीच” बतलाते हुए कपिल और अन्य कुछ लोगों पर कानूनी कार्रवाई की याचिका लेकर सर्वोच्च अदालत जा पहुंचे, लेकिन मंदर की याचिका में “15 करोड़ सौ करोड़ पर भारी हैं.. अभी तो शेरनियां निकली हैं, कहीं हम निकल पड़े तो ..” जैसी बकवास करने वाले वारिस पठान का नाम नहीं था. मंदर को अमानतुल्लाह के “शरिया लाएंगे..” वाले बयान से कोई दिक्कत नहीं. शरजील इमाम के देश तोड़ने वाले बयान से तकलीफ नहीं. तकलीफ है तो कपिल मिश्रा से, कि कपिल ने शाहीन बाग़ वालों से सड़क खाली करने को क्यों कहा. जब मंदर अदालत पहुँचे तो उसी समय मंदर का वो वीडियो सामने आ गया जिसमें वो मुस्लिमों को न्यायालय और संसद के खिलाफ भड़का रहे हैं. अदालत ने मंदर के वकील से पूछ लिया कि जब हमारे ऊपर भरोसा ही नहीं है तो यहां क्यों आए हो? जब अदालत ने वकील से पूछा कि याचिकाकर्ता (हर्ष मंदर) कहाँ है तो पता चला कि खुद को फँसते देख हर्ष मंदर अमेरिका रवाना हो गए हैं. जब अदालत मंदर की “हेट स्पीच” वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी तब मंदर अमेरिका जाने वाले जहाज में उड़ान भर रहे थे.
नफरत से भरा “कारवां ए मोहब्बत” -
देश-विदेश के अनेक मीडिया संस्थानों द्वारा जामिया मिलिया के छात्रों के द्वारा किए गए फसाद को भी पुलिस और राज्य सरकार का अत्याचार बताया गया जबकि मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शरजीलों और फैजुलों द्वारा दिए गए देशविरोधी भाषणों को छिपा लिया गया. सबको वो दृश्य याद हैं जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सीएए के विरोध में उत्पात मचाया गया था. जब हालात ज्यादा बिगड़ने लगे तो पुलिस ने स्थिति को संभाला. जो छद्म सेकुलर लोग जिहादी उत्पात देखकर चुपचाप बैठे थे, वो अब पुलिस कार्यवाही को “योगी की पुलिस की गुंडागर्दी” बतलाने लगे. कहा गया कि छात्र शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, पुलिस ने बेवजह लाठियाँ चलाईं. हर्ष मंदर अपनी “सेकुलर” फौज के साथ यहां भी आ धमके. मंदर और उनके “कारवां ए मोहब्बत” ने “जाँच” करके एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें कहा गया कि “छात्र शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे थे, पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स ने बेवजह परिसर में प्रवेश किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. विश्वविद्यालय परिसर को “युद्ध क्षेत्र” (वार ज़ोन) में बदल दिया.” बिना सबूत ये भी कह डाला कि छात्रों पर स्टन गन (बिजली का झटका देकर कुछ देर के लिए अचेत कर देने वाली गन) का प्रयोग किया गया. मंदर ने दावा किया कि पुलिस ने “जय श्रीराम” का नारा लगाकर छात्रों पर हमला किया. पत्थर चलाए. झूठ और फरेब से भरा मंदर का ये “मोहब्बत” का ख़त जारी होने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने जिहादी छात्रों के हिंसाचार के सीसीटीवी फुटेज जारी कर दिए. मंदर ने कन्नी काट ली और दूसरे मिशन में व्यस्त हो गए. मीडिया के एक वर्ग ने भी मंदर के दुष्प्रचार को महत्त्व दिया. पुलिस द्वारा जारी वीडियो फुटेज सामने आने के बाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया की वेबसाइट पर एक लेख आया, शीर्षक था “पुलिस द्वारा जारी सीसीटीवी फुटेज में एएमयू छात्र गेट तोड़ते, पत्थरबाजी करते दिखे.” टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने कुछ ही देर बाद ये लेख हटा दिया, और लिखा कि “गलत/अधूरी जानकारी के कारण ये लेख हटा दिया गया है”
मिशनरी जड़ें....
हर्ष मंदर की ईसाई मिशनरी तंत्र में गहरी पैठ है. हर्ष मंदर एक संस्था ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ चलाते हैं जिसका वित्तपोषक डैनचर्च ऐड है, जो कहता है कि हमारी जड़ें डैनिश नेशनल ईवान्जेलिकल लूथेरियन चर्च में हैं. दूसरा वित्तपोषक पार्टनरशिप फाउंडेशन है. जिसका परिचय है- ‘मिशनरी सिस्टर्स सर्वेन्ट्स ऑफ़ होली स्पिरिट.’ तीसरे वित्तपोषक आईडीआरसी के सीधे संबंध कनाडा विदेश विभाग से हैं. पत्रकार आनंद रंगनाथन ने इसका खुलासा किया है.
हर्ष मंदर उदाहरण हैं ऐसे हाई प्रोफाइल “एक्टिविस्ट” और “बुद्धिजीवियों” का, जिनके तार कांग्रेस पार्टी, वामपंथियों से लेकर, ईसाई मिशनरियों, इस्लामी एनजीओ, जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ से निकली ‘सेकुलर फौज’ और जॉर्ज सॉरोस जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहते हैं. ये लोग इन सबके साथ तालमेल बिठाकर अपना एजेंडा चलाते हैं. हर्ष मंदर का मामला ये सिद्ध करता है कि हिंदू चेतना के खिलाफ कैसे वो सब लोग मिलकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने इसे अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा मान लिया है.