चीन का कोरोना वायरस जैविक युद्ध की तैयारी तो नहीं !
   दिनांक 01-अप्रैल-2020
 ले. कर्नल (सेनि.) आदित्य प्रताप सिंह
अमेरिका सहित भारत में वामपंथी मीडिया चीन के प्रति अपनी स्वामी भक्ति दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। जहां एक ओर भारत के कथित पत्रकार कोरोना को चीनी वायरस कहने पर आपत्ति दर्ज कराते हैं कि ऐसा बोलना नस्लवादी और घृणित है तो वहीं पश्चिम जगत का मीडिया और वैश्विक संगठन चीन के सम्मुख नतमस्तक नजर आ रहे हैं।

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कोरोना वायरस की पहचान चीन के हूबेई प्रांत के वुहान शहर में दिसम्बर के शुरूआत में ही हो गई थी लेकिन चीनी सरकार ने इसे दुनिया से तब तक छिपा के रखा जब तक की यह एक असाध्य महामारी नहीं बन गई। यह चीन का पूरे विश्व के साथ विश्वासघात ही था। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के मीडिया का एक बड़ा भाग भी चीन के इस कुकृत्य में भागीदार रहा और इसे छिपाने में मदद करता रहा। इन दोनों समूहों को चीन के हितों को सुरक्षित रखने का अवश्य उचित मूल्य मिला होगा। भारत में भी ऐसा एक वर्ग है जो चीनी टुकड़ों पर पलता है और उसके हितों के अनुसार काम करता है। इसमें कथित पत्रकार से लेकर राजनीतिक दल तक शामिल हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 11 मार्च को जब कोरोना को महामारी घोषित किया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी। यकीनन यह गलती जानबूझकर चीन के इशारे पर की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि मार्च के अंत तक 200 देशों में लगभग 6 लाख से अधिक लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। इस महामारी से मरने वालों की संख्या लगभग 27000 से अधिक आंकी जा रही है। संक्रमित और मरने वालों की सांख्यिकी इन आधिकारिक आंकड़ो से कहीं अधिक भी हो सकती है। चीन के द्वारा प्रारम्भिक चरणों में इस महामारी को छिपाए रखना स्थिति को संदेहास्पद बनाता है। चीन और अमेरिका के इस कोरोना वायरस को फैलाने को लेकर आरोप-प्रत्यारोप विश्व राजनीतिक परिस्थितियों को और भी संकटपूर्ण बनाते दिख रहे हैं। विश्व के अनेक प्रतिष्ठित रक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों के प्रबुद्ध इसे जैविक युद्ध का आरंभ भी मान रहे हैं, क्योंकि कोरोना मानवता के लिए आज एक गंभीर संकट बन चुका है।
जिम्मेदार संस्थाओं की चुप्पी खड़े करती सवाल
संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न अंग और उनके पदाधिकारी चीन के विरुद्ध इस महामारी को फैलाने को लेकर चुप्पी साधकर बैठे हैं। यह चीन की आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य शक्ति का भय अथवा कोई और लालच है। भारत के विरुद्ध अनुच्देद-370 से लेकर सीएए पर बोलने वाले आज इतने बड़े नरसंहार पर शांत क्यूूं हैं ? आज सम्पूर्ण विश्व में चीन के विरुद्ध मात्र अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ही हैं जो खुलकर बोल पाने का साहस दिखा पा रहे हैं। वह अकेले व्यक्ति हैं जो इस महामारी के वायरस को चीनी वाइरस कहने का साहस कर रहे हैं। इस कथन के लिए उनकी उनके ही राष्ट्र के राजनीतिक और मीडिया समुदाय द्वारा आलोचना भी की जा रही है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इन आलोचनाओं से बेपरवाह हैं। तो दूसरी तरफ चीन है जो अमेरिका पर वायरस फैलाने का आरोप मढ़ रहा है। लेकिन अमेरिका का स्पष्ट कहना है कि सैन्य अभ्यास के दौरान चीन द्वारा उसके सैनिकों को संक्रमित कर यह वायरस अमेरिका भेजा गया है। ज्ञात हो कि इस वायरस के चपेट में आने से एक अमेरिकी सैनिक की नवम्बर में मौत भी हुई।
वामपंथी मीडिया लगा है नरैटिव बदलने
 
अमेरिका सहित भारत में वामपंथी मीडिया चीन के प्रति अपनी स्वामी भक्ति दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। जहां एक ओर भारत के कथित पत्रकार कोरोना को चीनी वायरस कहने पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहते हैं कि ऐसा बोलना नस्लवादी और घृणित है। तो वहीं पश्चिम जगत का मीडिया और वैश्विक संगठन चीन के सम्मुख नतमस्तक नजर आ रहे हैं। इससे एक बात यह जरूर साबित होती है कि विदेशी मीडिया मात्र कमजोर देशों को डराने के लिए ही है।
चीनी चाल का हिस्सा है वायरस ?
जहां पूरा विश्व इस महामारी से मरने वाले अपने नागरिकों के शवों को गिनने में लगा है तो चीन अपने औद्योगिक इकाइयों में कोरोना नियंत्रक स्वास्थ्य उपकरणों को तेजी से निर्मित कर रहा है। स्पेन जैसे राष्ट्रों ने चीन को लगभग 270 मिलियन डॉलर के इन उपकरणों के क्रय का सौदा भी कर लिया है। चीन के कोरोना व्यापार की यह शुरुआत भर है। चीन आज औषधि निर्माण के क्षेत्र में भी विश्व में एकाधिकार रखता है। भारत चीन से औषधि निर्माण में काम आने वाले सक्रिय फार्मा घटकों (एपीआई) का 70 फीसदी आयात करता है जिसका वार्षिक मूल्य लगभग 2. 4 अरब डॉलर है। इन सब चीजों को जोड़कर देखें तो चीन ने सुनियोजित ढंग से इस महामारी को छिपाकर रखा और इसे सम्पूर्ण विश्व में फैलने दिया ? क्या चीन ने बाजारवाद की लड़ाई में अपने मित्र और व्यावसायिक संबंधी इटली को भी नहीं छोड़ा ? इटली जी-7 राष्ट्रों इकलौता राष्ट्र है जो चीन के वन बेल्ट वन रोड परियोजना का भी भाग है। चीन और इटली के मध्य चमड़े संबंधित व्यापार बड़े स्तर पर होता है और यही वह क्षेत्र हैं जहां कोरोना महामारी का प्रकोप सबसे अधिक था। व्यापारिक कार्यों से बड़ी संख्या में इन नगरों से लोगों का नियमित आना-जाना है जिससे यह महामारी लोगों में बड़े स्तर पर फैलती चली गयी। इटली के फ्लोरेंस नगर के महापौर ने अति उत्साहित होकर चीनियों से गले मिलने की मूर्खतापूर्ण मुहिम तक चलायी जो राष्ट्र को एक निश्चित विनाश की ओर ले गया।
क्या चीनी चाल में फंसी दुनिया ?
अमेरिका में पूर्ण लॉक डाउन हो चुका है। न्यूयार्क में महामारी का सबसे अधिक प्रकोप है। चीनी वायरस ने अमेरिका की आर्थिक विकास की बढ़ती दर को पुनः विराम दे दिया है। चीन आज सुदृढ़ आर्थिक स्थिति में है जिसका लाभ उठाकर वह विश्व के आर्थिक तंत्र को अपने लाभ के लिए अधिकृत कर सकता है। चीन की राजधानी और अन्य महत्वपूर्ण व्यावसायिक महानगर चीनी वायरस से कैसे बच गए यह रहस्य दुनिया को अचंभित करने वाला है। इसका सीधा निष्कर्ष यह है कि चीन ने सुनियोजित रूप से इस वायरस के प्रसारित होने की दिशा और दशा इसके संभावित वाहकों के आवागमन से सुनिश्चित की। उसने वुहान नगर के केन्द्रित यातायात से यह तय किया कि संक्रमित वाहकों के अंतर्राष्ट्रीय मार्ग कैसे तैयार किए जाए। किस प्रकार से उन राष्ट्रों को चिन्हित किया जाए जहां से आसानी से यह महामारी विश्व के एक बड़े भू-भाग पर फैलाई जा सके ? क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इस महामारी का नियंत्रित प्रसार किया गया। यह नियंत्रित प्रसार ही इस महामारी को जैविक अस्त्र की श्रेणी में ला देता है। तो क्या चीन वैश्विक संगठनो और बड़े मीडिया घरानों को बांधकर अपने जैविक अस्त्रों का प्रयोग कर रहा है। कूटनीतिक स्तर पर भी वह अब अपने मित्रों और कुछ सहयोगी राष्ट्रों द्वारा विश्व में अपने समर्थन में एक सकारात्मक वातावरण तैयार करने का प्रयास कर रहा है। अनेक महामारी पीड़ित राष्ट्रों को औषधीय और आर्थिक सहायता देकर अपने पक्ष में करने को प्रयासरत है। क्या यह युद्ध के पश्चात आक्रमणकारी राष्ट्र द्वारा अपने लिए सहानुभूति बटोरने के प्रयास हैं ? क्यूं चीन इस वायरस को चीनी वायरस कहने पर आपत्ति जता रहा है, जबकि विगत दशकों में अनेक विषाणुओं और बीमारियों के नाम उनकी उत्पत्ति स्थल के नाम पर ही रखे गए। आखिर चीन इस बात से इतना परेशान क्यूं है? चीन की यह बातें ही लोगों के मस्तिष्क में शक पैदा कर रही हैं।