अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अफवाहें फैला रहे एफएम चैनल

    दिनांक 10-अप्रैल-2020
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भारत में निजी एफ़एम चैनल गाने सुनाने और लोगों के मनोरंजन के लिए होते हैं। इन पर समाचारों या किसी राजनीतिक कार्यक्रम के प्रसारण की अनुमति नहीं दी गई है। अगर कोई निजी एफ़एम चैनल ऐसा करता है तो उसका लाइसेंस भी रद्द हो सकता है। यह नियम आज से नहीं, तब से है जब एफ़एम रेडियो की शुरुआत हुई थी। लेकिन इन दिनों देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी की हालत कुछ ऐसी है कि निजी एफ़एम रेडियो अब अफ़वाहें फैलाने का भी बड़ा ज़रिया बन चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का एफ़एम चैनल रेडियो मिर्ची अक्सर इस काम में आगे रहता है। रेडियो मिर्ची की एक आरजे ने ट्वीट किया है कि "तब्लीगी जमात के लोगों ने जो कुछ किया उसे मुद्दा बनाना ग़लत है और ये कोविड-19 वायरस से भी ज़्यादा ख़तरनाक है।" मतलब यह कि जो कुछ भी ख़बरें इस बारे में दिखाई जा रही हैं वो ग़लत हैं। साइमा नाम की इस आरजे पर कई बार यह आरोप लग चुका है कि वो अपने कार्यक्रम का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडे के लिए करती हैं। रेडियो पर वो ये काम बहुत बारीकी से करती हैं, जबकि अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म पर खुलकर अफ़वाहें उड़ाती हैं।
एक एफ़एम रेडियो की आरजे अगर यह बात कहती है कि तब्लीगी जमात के लोगों के थूकने या मलमूत्र करने की बातें झूठ हैं तो इसके पीछे की मंशा समझना कठिन नहीं है। कई लोग इसे रेडियो मिर्ची की तरफ़ से दी गई आधिकारिक जानकारी भी मान सकते हैं। इसी से उन अफ़वाहों को वैधता मिल जाती है जो कुछ शरारती तत्व फैलाने में जुटे हैं। ऐसे समय में जब तब्लीगी जमात के मौलवियों के ग़ैरज़िम्मेदार बर्ताव के कारण कोरोना वायरस का तेज़ी से प्रसार हो रहा है। एफ़एम रेडियो की आरजे का यह कहना कि ये सारी बातें झूठ हैं उस भ्रम को पैदा करता है जिसका शिकार बड़ी संख्या में लोगों को होना पड़ रहा है। समझना मुश्किल नहीं है कि इस आरजे के अपने राजनीतिक और मज़हबी एजेंडे हैं जिनके लिए वो अपने संस्थान का इस्तेमाल कर रही है।
रेडियो मिर्ची की यह आरजे पहले भी अफ़वाहें फैलाने के लिए कुख्यात रही है। जामिया विश्वविद्यालय में हिंसा के दिन इसने ट्विटर पर लोगों से अपील की थी कि वो बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुँचकर उसका घेराव करें, जबकि वहाँ पर धारा 144 लागू थी। उसके बाद भी इस आरजे को दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में रैलियाँ संबोधित करते देखा गया। आश्चर्य की बात है कि आरजे की इन हरकतों को टाइम्स समूह के अधिकारियों का मौन समर्थन भी है। जबकि निजी कंपनियों में काम करने वालों के साथ यह शर्त होती है कि वो किसी धरने-प्रदर्शन या राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे। फिर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में ऐसी छूट के पीछे मंशा क्या है? वहां यह छूट सभी विचारधाराओं के कर्मचारियों को मिलती हो ऐसा भी नहीं है।