बौखलाए ट्रंप रोकेंगे डब्ल्यूएचओ का फंड!

    दिनांक 10-अप्रैल-2020   
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9 अप्रैल को दुनिया में सुर्खियों में रहने वाली खबरों में सबसे खास और मौजूदा वैश्विक कोरोना संकट से जुड़ी खबर है अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की डब्ल्यूएचओ को लेकर खुलेआम जाहिर की गई बौखलाहट। इसकी वजह जायज है और जिस तरह से दुनिया भर के विशेषज्ञों ने इस पर टिप्पणी की है उससे साफ है कि वजह व्यावहारिक और लंबे वक्त तक असर दिखाने वाली है

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यूं तो डब्ल्यूएचओ के वर्तमान मुखिया डॉ. तेद्रोस अधानॉम का कम्युनिस्ट झुकाव और उसके चलते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी नजदीकियां काफी समय से चर्चा में रही हैं। और इन नजदीकियों के चलते चीन की कोरोना वायरस की मारक क्षमता को छुपाने और उस बारे में दुनिया को बरगलाने की शरारत को डॉ. तेद्रोस के डब्ल्यूएचओ के आधिकारिक मंच से पुष्ट करना भी इंसानियत के मूल्यों में विश्वास करने वाले किसी राष्ट्रध्यक्ष को रास नहीं आया है। लेकिन राष्ट्रपति जिस तरह पिछले चार—पांच दिनों से लगातार ट्वीट और प्रेस वार्ताओं के जरिए इस मुद्दे पर अपना रोष जताते आ रहे हैं वह अभूतपूर्व है। चीन ने जनवरी 2020 में आधिकारिक घोषणा की थी कि कोरोना इंसान से इंसान में नहीं फैलता। डॉ. तेद्रोस ने फौरन प्रेस कांफ्रेंस करके इस गलत तथ्य को दुनिया में फैला दिया। इतना ही नहीं, कई मौकों पर चीन के 'कोरोना से निपटने के प्रयासों की तारीफ' भी की। लेकिन असलियत खुलते देर न लगी, चीन का झूठ पकड़ा गया और पकड़ी गई डॉ. तेद्रोस की चीन की फरमाबरदारी।
अमेरिकी नीतिकार और अन्य स्वास्थ्य एजेंसियां भांप गईं कि डब्ल्यूएचओ चीन का एजेंडा चला रहा है। उधर न्यूयार्क और अन्य राज्यों में कोरोना के बढ़ते कोप से चिंता में पड़े राष्ट्पति ट्ंप ने पहले दबे स्वरों में, फिर बेलाग तरीके से डब्ल्यूएचओ को लेकर खरी—खोटी सुनाई।
लेकिन 7 अप्रैल को व्हाइट हाउस में ट्ंप की बुलाई प्रेस वार्ता में और बाद में ट्वीट करके उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि डब्ल्यूएचओ को सबसे ज्यादा फंड अमेरिका ही देता है। लेकिन इस संस्था द्वारा हाल में दिखाए गए एकतरफा व्यवहार से सब रुष्ट हैं। ट्ंप ने कहा कि अब अमेरिका डब्ल्यूएचओ फंड नहीं देने पर​ बिखर कर रहा है। उल्लेखनीय है कि इस अंतरराष्ट्रीय संगठन को मिलने वाले कुछ फंड का सबसे अधिक हिस्सा अमेरिका से ही आता रहा है। 2018—19 के आंकड़े देखें तो संगठन के कुल फंड का 14.67 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से मिला था। यहां बता दें कि इस संगठन की फंडिग सिर्फ विभिन्न देशों से ही नहीं बल्कि गैर मुनाफे वाली संस्थाओं से भी होती है। माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख बिल गेट्स की संस्था बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने भी पिछले साल डब्ल्यूएचओ को काफी पैसा दिया था।
बहरहाल, ट्ंप के इस ट्वीट पर जहां सेकुलरों और कम्युनिस्टों ने आश्चर्य जताया और इसे जल्दबाजी में उठा कदम बताया है, वहीं तमाम निष्पक्ष नीतिकारों ने इस कदम को उचित ठहराया है।
चीन के अखबार चाइना डेली के ब्यूरो प्रमुख चेन वीहुआ ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा है कि अमेरिका का यह कदम सिर्फ और सिर्फ दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए है। अमेरिका कोरोना वायरस के व्याप को रोकने में असफल रहा है, और राष्ट्रपति ट्ंप के उठाए गए कदमों से ही अमेरिकी आहत हुए है। अगर अमेरिका समय रहते डब्ल्यूएचओ की चेतावनी को समझकर कदम उठाता तो आज उसे ये दिन नहीं देखने पड़ते। चीन के अखबार की ऐसी टिप्पणी समझी जा सकती है। पर एक बड़ी कंपनी के मुखिया ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति को ही आड़े हाथों लिया। कूल क्वाइट कंपनी के मुखिया यूगेन ने अपने ट्वीट में कहा कि डब्ल्यूएचओ ने झूठ नहीं बोला है, बल्कि झूठ तो राष्ट्रपति ट्रंप ने बोला है। अमेरिका ने चीन को भारी मात्रा में दवाएं और रक्षात्मक उपकरण भेज दिए। उसने अपने लिए कुछ क्यों नहीं बचाया। इसी वजह से अमेरिका के पास अब बचाव के संसाधन नहीं बचे हैं। यह भी सच है।
वहीं अमेरिका के एक जाने—माने अर्थविशेषज्ञ डेविड रुथचाइल्ड अमेरिका के गलत निर्णयों पर महामारी बढ़ने का ठीकरा फोड़ते हैं। ट्विटर पर वे लिखते हैं कि कोरोना वायरस के शुरू होने और यात्राओं पर रोक लगाए जाने के बीच चीन से 4 लाख से ज्यादा लोग अमेरिका में आए।
ट्रंप की इस घोषणा के समर्थन में अमेरिका के कई प्रमुख नेता और रक्षा विशेषज्ञ सामने आए हैं। ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन, फलोरिडा के रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट और रिपब्लिकन सांसद गे रीशेन्थालर ने डब्ल्यूएचओ को तब तक फंछ न दिए जाने की वकालत की है जब तक डॉ. तेद्रोस इस्तीफा नहीं देते। उन्होंने संगठन की जांच करके की मांग की है कि महामारी के संदर्भ में चीन के प्रति डब्ल्यूएचओ का ऐसा व्यवहार किन कारणों से देखने में आया।
मौजूदा घटनाक्रम और ट्रंप के तौर—तरीकों को देखते हुए यह टकराहट और बढ़ने के आसार हैं। महामारी की आड़ में दुनिया के बाजारों को अपने कब्जे में लेने को आतुर चीन और अपनी साख बचाने की जी—तोड़ कोशिश में लगे अमेरिका की नोक—झोंक आने वाले दिनों में क्या रंग दिखाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा।