छत्तीसगढ़- लॉकडाउन के दौरान आते रहे तब्लीगी, सरकार संकट से मुंह फेर राजनीति में व्यस्त

    दिनांक 11-अप्रैल-2020
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रायपुर से पंकज झा
छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से संदिग्ध संक्रमित तब्लीगी बाहर आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब दो सौ किलोमीटर दूर कठघोरा नाम कस्बे से एक ही साथ 7 मरीज पॉजिटिव पाए गए। तब्लीगियों का लॉकडाउन के दौरान भी आगमन होता रहा जबकि प्रदेश सरकार उन्हें रोकने के बजाय इस बड़े संकट से मुंह फेरे राजनीति में व्यस्त है

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आजादी से लगभग पचास वर्ष तक भारत के पास अपना मात्र एक एम्स था। उसे हम देश की जीवन रेखा मानते रहे हैं। देश में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज ने देश के स्वास्थ्य सेवाओं को विस्तार देते हुए, एक साथ छह नए एम्स के स्थापना की घोषणा की। उन छह में एक अस्पताल शीघ्र ही नए राज्य बनने वाले छत्तीसगढ़ के रायपुर को भी मिलना था। कोरोना जैसी महामारी से संघर्ष में प्रदेश का अकेला यह अस्पताल है, जिसे अभी तक कोविड-19 के विरुद्ध संघर्ष में शत-प्रतिशत सफलता मिलती दिख रही थी। प्रदेश में 10 मरीज कोरोना संक्रमित पाए गए थे जिन सभी को ‘एम्स रायपुर’ के डॉक्टरों ने स्वस्थ कर वापस भेज दिया। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पहली खेप का अंतिम तब्लीगी मरीज भी डिस्चार्ज किया जा चुका है। कोरोना संकट में प्रदेश में आज यह अस्पताल सम्मान के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा स्थापना दिवस पर पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह ने भी ट्वीट कर अस्पताल को याद किया। डाॅ सिंह ने लिखा, “आज भाजपा के शीर्ष नेतृत्व स्मरण में आ गए। प्रदेश के निर्माता अटल जी से लेकर रायपुर में एम्स जैसे चिकित्सालय के निर्माण को समर्पित स्व. सुषमा जी ने प्रतिक्षण जनसेवा को प्राथमिकता दी है। इस समर्पण से ही प्रदेश कोविड-19 जैसी बीमारी से लड़ने में सक्षम साबित हुआ है।’’
इस तरह छत्तीसगढ़ कोरोना महामारी से लगभग जीत जाने का संतोष मना रहा था तब तक तबलीगी साम्प्रदायिकता के संक्रमण के आगे प्रदेश देखते ही देखते परास्त सा दिख रहा है। मुस्लिमों की न्यूनतम आबादी वाले इस प्रदेश में मानो तब्लीगी जमातियों ने शरण पाने का अड्डा जैसा बना लिया हो। प्रदेश के कोने-कोने से संदिग्ध संक्रमित तब्लीगी बाहर आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब दो सौ किलोमीटर दूर कठघोरा नाम के कस्बे से एक ही साथ 7 मरीज पॉजिटिव पाए गए। इस तरह प्रदेश भर में तब्लीगियों का लॉकडाउन के दौरान भी आगमन होता रहा जबकि प्रदेश की कांग्रेस सरकार उन्हें रोकने के बजाय इस बड़े संकट से मुंह फेरे राजनीति में व्यस्त रही।
तुष्टीकरण में लिप्त राज्य सरकार

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प्रदेश भर में विपक्षी राजनीतिक दल समेत अन्य सामाजिक संगठनों ने इस दौरान राहत से लेकर चिकित्सा कार्यों में सहयोग के अनगिनित प्रकल्प शुरू किए लेकिन, प्रदेश शासन का ध्यान मुख्यतः स्थानीय मीडिया में सुर्खियां पाने और राजनीतिक विरोध, सांप्रदायिक तुष्टिकरण तक ही सिमट कर रह गया है। स्थानीय समाचार माध्यमों में विरुदावली गाई जा रही थी लेकिन जमीन पर वैसा कुछ दिख नहीं रहा था। ऐन इस महामारी के संकट के बीच शासन का सबसे बड़ा काम हुआ सदन की बैठक को एक दिन के लिए बुलाकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्व. कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर स्थापित संस्थान का नाम बदल देने संबंधित ऐसे दर्जन भर विधेयक सदन से बिना चर्चा के पास करा लेना। या फिर प्रदेश के लोगों को यह समझाना कि प्रधानमंत्री ने दीये जलाने का आह्वान कर गलत किया है। दीप खुशी के मौके पर जलाए जाते हैं, आदि-आदि. (देखें सीएम का ट्वीट) या फिर इसे साबित करने में ताकत खपाने में लगे रहना कि राहुल गांधी के कथित निर्देश पर सारा काम मुख्यमंत्री ने पहले से ही सुचारू कर रखा था, आदि-आदि।
तब्लीगियों को पकड़ने के लिए न्यायालय को देनी पड़ी दखल
असल में हालात इतने खराब थे कि कुछ सामजिक समूहों को तब्लीगियों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करनी पड़ी। इस याचिका पर दिए आदेश में बिलासपुर उच्च न्यायालय ने तब्लीगी जमात मरकज से वापस लौटने वाले व्यक्तियों की तलाश के लिए गहन तलाशी अभियान शुरू करने का आदेश देना पड़ा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस गौतम भादुड़ी की पीठ ने गत दिनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई की। इस आदेश के बाद जैसा कि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विक्रम उसेंडी कहते हैं, ‘तब्लीगी जमात के 52 लोगों की तलाश करने के लिए उच्च न्यायालय को आदेश देना ही यह बताता है कि सरकार किस तरह इस गंभीर परिस्थियों में भी लापरवाह है।’ उसेंडी ने इस लापरवाही को महामारी जैसा ही ‘सियासी संक्रमण’ बताया। बहरहाल न्यायालय के आदेश के बाद आनन-फानन में कोरबा जिले के कठघोरा कस्बे को सील कर दिया गया है। यहां मौजूद सभी लोगों की जांच कराने की बात की जा रही है लेकिन, यहां भी सरकार लापरवाही के आरोप से बच नहीं पा रही है। सांसद सुनील सोनी कहते हैं कि मुख्यमंत्री बघेल को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे 80 हजार लोगों का परीक्षण कहां और कैसे करायेंगे ? सोनी के अनुसार एम्स के अलावा और कहीं इलाज की व्यवस्था नहीं है। प्रदेश की इस सरकार ने खुद के संसाधनों से एक मरीज के इलाज तक की व्यवस्था नहीं की है। सांसद सोनी के अनुसार एम्स के पास 450 संदिग्ध मरीजों के प्रतिदिन जांच की सुविधा है। अस्पताल कर्मी दिन-रात काम कर इतना कर सकते हैं लेकिन प्रदेश के स्तर पर ऐसी कोई व्यवस्था दिख नहीं रही है। बकौल सोनी, ‘यह शर्म की बात है कि राज्य शासन इतने दिनों के बाद भी न तो एक वार्ड बना पायी है और न ही एक लैब ही।’ यहां स्वास्थ्य को लेकर कितनी गंभीर है सरकार यह इससे भी समझिये कि स्वयं स्वास्थ्य मंत्री यह शिकायत कर रहे थे कि कोरोना से संबंधित बैठक में मुख्यमंत्री उन्हें नहीं बुला रहे। उसके बाद स्वास्थ्य मंत्री टी. एस. सिंहदेव मुंबई चले गए। काफी मुश्किलों के बाद वे विशेष शासकीय विमान से रायपुर लौटे और कोरेंटाईन में चले गए। बहरहाल इसी बीच एक और गंभीर मामला सामने आया जब बिलासपुर निवासी राष्ट्रीय महिला आयोग की सलाहकार सदस्य हर्षिता पाण्डेय ने राज्यपाल अनुसुइया उइके को पत्र लिख कर एक सरकारी गड़बड़झाला की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट किया है। हर्षिता के अनुसार, “कांग्रेस सरकार ने सभी पंचायतों को दो क्विंटल चावल देने की घोषणा की ताकि कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहे। वहां सच यह है कि इस चावल के बदले सरकार पंचायतों से छह हजार से अधिक रूपये वसूल रही है।’’ सोचिये जरा, छत्तीसगढ़ जैसा प्रदेश जिसकी चर्चा ही एक-दो रूपये किलो में प्रदेश के गरीबों को चावल देने के लिए दुनिया भर में होती हो। जहां सामान्य आय वर्ग को भी दस रूपये किलो चावल दिया जा रहा हो, सरकार के पास उपार्जित धान रखने तक की जगह नहीं है। ऐसे हालात में इस महामारी के बहाने पंचायतों से 35 रूपये तक चावल की कीमत वसूलना और इसकी वाहवाही भी लेना, कितना उचित है?
तो क्या वास्तव में शासन कुछ भी नहीं कर रहा है? हकीकत में देखें तो राज्य सरकार बहुत कम करते हुए राजनीति ज्यादा कर रही है। जैसा कि पिछले दिनों एक बयान में मुख्यमंत्री बघेल ने महामारी की रोकथाम में विफल होने का आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगाया। मुख्यमंत्री ने ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के बदले ‘फिजिकल डिस्टेंसिंग’ शब्द उपयोग करने को कहा। बकौल बघेल, ‘यह बदलाव उन भयजनित सामाजिक दूरियों को कम करेगा, जिनके शिकार पलायन से लौटे एवं काम पर आए मजदूर एवं नियमित छोटे कामगार हो सकते हैं।’ अब ऐसे संवेदनशील मौके पर आप हंस भी तो नहीं सकते न ?